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किसान बेहाल, मंदी से युवा परेशान, फिर भी मोदी पर मेहरबान: ग्राउंड रिपोर्ट

By दिलनवाज़ पाशा

मतदाता
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"चुनाव का मुद्दा सिर्फ़ मोदी है और कुछ नहीं है."

"कैन्डीडेट को वोट नहीं है, मोदी को वोट है. बीजेपी को भी वोट नहीं है, हमारी तरफ़ से तो मोदी को वोट है. चुनाव में बस मोदी ही मोदी है."

"हमें तो मोदी के सारे ही काम अच्छे लग रहे हैं. उसने नोटबंदी भी की तो हमें अच्छी लगी. हमारे देश को दुनिया में चौथे नंबर पर ले आया. हमें ये भी अच्छा लगा. अब ये मुल्ला कुछ भी गाये जाएं बस इन्हें ही अच्छा नहीं लग रहा. बाक़ी सबको अच्छा लग रहा है."

"काम का मंदा है. ऐसा लग रहा जैसे उद्योगपतियों ने काम में पैसा लगाना बंद कर दिया है, मुझे यही शक होता है."

ये राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से कुछ ही दूर दादरी के पास एक गांव के अगड़ी जाति के लोगों की राय है. ये इलाक़ा गौतमबुद्धनगर लोकसभा क्षेत्र में आता है.

ऋषिपाल ठाकुर भी इन लोगों में से एक हैं. उनके लिए इस चुनाव में राष्ट्रवाद सबसे बड़ा मद्दा है.

राष्ट्रवाद क्या है ये पूछने पर वो कहते हैं, "देश के प्रति प्रेम ही राष्ट्रवाद है. लोगों को मोदी ने ही जागरूक किया है. अभी तक लोग सोए हुए थे. मोदी ने सबको जगा दिया है. बच्चे बच्चे को बता दिया है कि राष्ट्रवाद क्या है और वोट का अधिकार क्या है. मुझे ख़ुद ये सब पता नहीं था."

वो कहते हैं, "इस समय सब जागरूक हैं, देश पर मरने मिटने को तैयार हैं, वो लोग ग़लत हैं जो भारतीय सेना पर, एयरस्ट्राइक पर सवाल उठा रहे हैं. पाकिस्तान माने न माने, विरोधी माने न मानें लेकिन देश को विश्वास है."

श्याम बाबू
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श्याम बाबू

पेशे से ड्राइवर ऋषिपाल ठाकुर इस समय काम की मंदी झेल रहे हैं. वो कहते हैं, "काम पहले से आधा है. मंदी के बावजूद घर चल रहा है लेकिन अगर ऐसा ही चलता रहा तो फिर बहुत दिक़्क़त होगी."

ऋषिपाल कहते हैं, "मेरे लिए बेरोज़गारी या काम की मंदी कोई मुद्दा नहीं है. कई बार बच्चों की फ़ीस भरने में भी दिक़्क़त हुई फिर भी मेरे लिए सिर्फ़ राष्ट्रवाद मुद्दा है. हम लोग ऐसी मंदी अगले पांच साल भी झेलने को तैयार हैं."

क्या हिंदुत्व चुनाव में मुद्दा है. ये पूछने पर वो कहते हैं, "यही मूल मुद्दा है. ये शरम की बात है कि आज़ादी के बाद से अब तक इस हिंदु बहुल देश को हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं किया गया. इसकी उम्मीद हमें मोदी से ही है. हमें राम मंदिर की भी ज़रूरत नहीं हैं. हमें हिंदू राष्ट्र चाहिए और जनसंख्या नियंत्रण क़ानून चाहिए."

हिंदू और राष्ट्रवाद की बात कर रहे इन लोगों ने पास ही टायर पंचर का काम कर रहे मुसलमान नौजवान मुनव्वर ख़ान पर कई बार पाकिस्तान जाने का तंज़ मारा. इस तंज़ में हास्य भी था और अपनापन भी.

मुनव्वर के लिए महंगाई और बेरोज़गारी बड़ा मुद्दा है और वो मोदी के विरोध में मतदान करना चाहते हैं. राष्ट्रवाद की बातें उन्हें शोर लगती हैं.

वो कहते हैं, "बेरोज़गारी ज़्यादा है, हम पर क्या बीत रही है ये तो हमारे जी को ही पता है."

हालांकि थोड़ा कुरेदने पर वो कहते हैं, "हम मोदी विरोधी हैं क्योंकि मोदी मुसलमानों के विरोधी हैं."

मोदी पोस्टर
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मोदी पोस्टर

दीपक शर्मा भी पेशे से ड्राइवर हैं. उनके लिए मोदी ने सबसे बड़ काम डाटा फ्री करके किया है.

वो कहते हैं, "मेरी नज़र में मोदी ने सबसे बड़ा काम ये किया है कि उन्होंने डाटा फ्री कर दिया है. पब्लिक जो जागरूक हुई है उसका मेन रीज़न है डाटा. आज की डेट में हमारे पास जो सेलफ़ोन है उससे हम कैसी भी ख़बर कहीं भी ले सकते हैं. चाहें फिर अनपढ़ हों या पढ़े लिखे. सबसे मेन चीज़ ये फ्री डाटा है."

श्याम बाबू यहीं की एक फ़ैक्ट्री में मज़दूरी करते हैं और इटावा के रहने वाले हैं. भारत सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उनके कच्चे मकान को पक्का बनवा दिया है.

श्याम बाबू कहते हैं, "मेरा मकान बन गया, मुझे और कुछ नहीं चाहिए. मेरे लिए मोदी ही सब कुछ हैं. मैं मोदी को विकास के लिए वोट दूंगा."

दादरी की बिसहाड़ा गांव
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दादरी की बिसहाड़ा गांव

दादरी क्षेत्र का बिसाहड़ा गांव यहां से कुछ ही दूर है. साल 2015 में अख़लाक़ की हिंसक भीड़ के हाथों हत्या के बाद ये चर्चा में आया था और इसी हत्याकांड के बाद भारत में अल्पसंख्यकों की लिंचिंग पर बहस शुरू हुई थी.

बीते कुछ सालों में गौरक्षा एक बड़ा मुद्दा बना है. प्रदेश की सरकार गौहत्या को लेकर बेहद सख़्त है और लोगों ने गायों को कहीं लाना-ले जाना तक बंद कर दिया है. इसका नतीजा ये हुआ कि किसान अपने पशुओं को जंगलों में छोड़ने पर मजबूर हो गए.

आवारा गायें और बछड़े फ़सलों को बर्बाद कर रहे थे जिससे किसानों में नाराज़गी थी. लेकिन अब यहां को लोगों को थोड़ा राहत है.

बीते कुछ महीनों में जगह-जगह गौशालाएं खुल गई हैं. ऐसी ही एक गौशाला बिसाहड़ा में भी ग्राम प्रधान के सौजन्य से खोली गई है जिसमें क़रीब तीन सौ आवारा पशु रह रहे हैं.

यहीं काम करने वाले विनोद ठाकुर कहते हैं, "गौशाला बनने की वजह से किसानों की नाराज़गी कुछ कम हुई है. अगर ये गायें यहां बंद न होती तो आसपास के इलाक़े में फ़सलें ही न हो पातीं."

विनोद के मुताबिक़ फ़िलहाल किसानों को राहत है. वो कहते हैं कि ये गौशाला निजी प्रयास से चल रही है और फ़सल कटने के बाद गायों को फिर से जंगल में छोड़ा जा सकता है.

विनोद कहते हैं, "आवारा पशुओं को लेकर किसानों में नाराज़गी तो है लेकिन इतनी नहीं कि वो बीजेपी के ख़िलाफ़ मतदान कर दें."

विनोद के मुताबिक़ चुनावों में मूल मुद्दा राष्ट्रवाद है और लोग मोदी के नाम पर वोट कर रहे हैं.

उत्तर प्रदेश चुनावी मुद्दे
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उत्तर प्रदेश चुनावी मुद्दे

दादरी के इस गांव से कुछ किलोमीटर आगे ही ग़ाज़ियाबाद लोकसभा क्षेत्र का निधावली गांव हैं. यहां सरकारी स्कूल पर लगे नीले बोर्ड पर लिखा है, "द ग्रेट जाटव ग्राम निधावली."

यहां अधिकतर दलित समुदाय के लोग रहते हैं. यहां के युवाओं में अपने आप के जाटव होने पर गर्व का नया भाव है.

एक स्थानीय युवा कहते हैं, "हम जाटव हैं, हमारा वोट मायावती का है और उन्हीं का रहेगा. हम अपनी जाति के लिए वोट करते हैं. इसके अलावा हमारे लिए कोई मुद्दा नहीं है. हम मर भी जाएंगे तब भी मायावती से अलग वोट नहीं देंगे."

यहां मैंने जितने भी युवाओं या बुज़ुर्गों से बात की सभी की भावना यही थी. बोर्ड के बारे में सवाल पूछने पर एक बुज़ुर्ग कहते हैं, "ये हमने अपने लिए लगाया है, किसी को अच्छा लगे या न लगे."

वो कहते हैं, "पहले हमसे मज़दूरी करवाकर पैसे नहीं देते थे. लेकिन अब जागरूकता आ गई है. अब हम डांट कर अपनी मज़दूरी का पैसा मांगते हैं."

ये दलित मतदाता मायावती के साथ मज़बूती से जुड़े हैं. एक बुज़ुर्ग दलित महिला कहती हैं, "देखो भैया हम तो मायावती को ही वोट देंगे. हम मायावती के ही हैं. चाहे कोई हमें लाख दो लाख रुपए दे दे लेकिन हम अपना वोट मायावती से अलग नहीं देंगे."

बिजनौर के आशीष बालियान
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बिजनौर के आशीष बालियान

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इलाक़ा अपनी बेहद उपजाऊ ज़मीन के लिए भी जाना जाता है. बिजनौर लोकसभा क्षेत्र के चुड़ियाली गांव में मेरी मुलाक़ात कुछ किसानों से हुई जो फ़सल के कम दामों से तो नाराज़ हैं लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर प्रधानमंत्री मोदी को एक बार फिर वोट देने का मन बना चुके हैं.

किसान हरजीत सिंह कहते हैं, "गन्ने का रेट न बढ़ने से किसान नाराज़ है जी. बीजेपी से उम्मीद थी कि कुछ करेगी लेकिन उसने भी कुछ नहीं किया. दूसरी पार्टियों की तरह ही रह गई फ़सल का दाम नहीं मिल रहा है. किसान का मनोबल टूटा हुआ है लेकिन फिर भी मोदी की वजह से बीजेपी को वोट दे रहे हैं."

हरजीत सिंह
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हरजीत सिंह

किसान रूपेंद्र सिंह कहते हैं, "बीजेपी ने किसानों के लिए कुछ ख़ास नहीं किया है. फ़सल के दाम वहीं हैं लेकिन दवाई, खाद और डाई के दाम बढ़ गए हैं. आवारा पशुओं ने जीना हराम कर दिया है. लेकिन फिर भी हम बीजेपी को वोट दे रहे हैं क्योंकि मोदी जी ने पुलवामा का बदला लिया है."

युवा किसान प्रमोद चौधरी ने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की है. वो दिल्ली के एक पांच सितारा होटल की नौकरी छोड़ने के बाद अब गांव में खेती कर रहे हैं. बेरोज़गारी उनके लिए बड़ा मुद्दा है.

वो कहते हैं, "आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख बढ़ रही है. हमें ऐसा ही नेता चाहिए जो दुनियाभर में हमारा क़द ऊंचा कर सके. मोदी जी ऐसा कर रहे हैं इसलिए मैं उनका समर्थन कर रहा हूं."

वो कहते हैं, "लेकिन ज़रूरी नहीं है कि हम लोग मोदी जी का समर्थन करते ही रहें. हमारी सीट पर बेहद ख़राब उम्मीदवार उतारा है. हर बार हम मोदी के नाम पर ही वोट नहीं दे सकते. अगर अबकी बार हालात नहीं बदले तो ये जनता है, मोदी को भी लात मार देगी."

अनंत चौधरी और आशीष बालियान
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अनंत चौधरी और आशीष बालियान

बिजनौर के ही एक गन्ना क्रय केंद्र पर मुझे युवा किसान अनंत चौधरी मिले. राष्ट्रीय लोक दल से जुड़े अनंत बीजेपी की नीतियों पर सवाल करते हुए कहते हैं, "हमने पिछले साल गन्ना बोया, अपनी जेब से लागत लगाई. इस साल हम गन्ना डाल रहे हैं लेकिन पेमेंट अगले साल मिलेगा. यानी दो साल का अंतर आ गया. हमने जो किसान क्रेडिट कार्ड लिया है उस पर तो हमें ब्याज देना पड़ता है लेकिन हमारे अपने पैसों पर हमें ब्याज नहीं मिलती. बेरोज़गारी और बैंकों का एनपीए बढ़ रहा है लेकिन सरकार इस पर कोई जबाव नहीं दे रही."

इसी क्रय केंद्र पर गन्ना बेचने आए आशीष बालियान प्रधानमंत्री मोदी के पक्के समर्थक हैं. उन्हें भी गन्ने का पेमेंट नहीं मिल रहा है. क्रेडिट कार्ड का ब्याज वो नहीं दे पा रहे हैं. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के छप्पन इंच के सीने के लिए वो इन दिक़्क़तों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.

बालियान कहते हैं, "हमारा गन्ने का पेमेंट जब मिलेगा मिल ही जाएगा. क्रेडिट कार्ड पर ब्याज लग रहा है. बैंक वाले तीसरे दिन घर आ जाते हैं तो हम भी कह देते हैं जब गन्ने के पैसे मिल जाएंगे दे देंगे. भूखे तो हम मर नहीं रहे हैं."

वो कहते हैं, "राष्ट्रवाद के नाम पर वोट दे रहे हैं. हमारी सेना की ताक़त बढ़ रही है. सर्जिकल स्ट्राइक कर दी. पुलवामा का हमला हुआ, हमारे चालीस मरे तो हमने तीन सौ मार दिए. तो हमारा वोट तो मोदीजी के छप्पन इंच के सीने को है जो पूरे विश्व में भारत का परचम लहरा रहे हैं. मोदी जी की योजना भारत को विश्वगुरू बनाने की है."

मोदी का पोस्टर
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मोदी का पोस्टर

मुज़फ़्फ़रनगर के खतौली इलाक़े के बस स्टॉप पर बैठी सावित्री देवी कहती हैं कि सबसे बड़ा मुद्दा रोज़गार का है. वो कहती हैं, "ये बच्चे ख़ाली फिर रहे हैं, इन्हें हिल्ला मिलना चाहिए. ये अपना रोज़गार पर लग जाएं. चाहें मोदी आएं या कोई और आएं."

यहां खड़े कुछ दलित युवा उनकी हां में हां मिलाते हुए कहते हैं कि सरकारें नौकरियां ही नहीं निकाल रही हैं. चुनाव का समय आया तो वैकेंसी ओपन कर दीं. लेकिन बीते चार साढ़े चार साल से कुछ नहीं किया.

इनमें से एक दलित युवा ने पिछले चुनाव में नरेंद्र मोदी के वादों में भरोसा जताते हुए उनकी पार्टी को वोट किया था लेकिन इस बार उनका मन बदल गया है.

वो कहते हैं, "बेरोज़गारी ही सबसे बड़ा मुद्दा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रोज़गार पैदा करने में नाकाम रहे हैं इसलिए मैं इस बार गठबंधन को वोट कर रहा हूं."

प्रदीप कुमार कई सालों से सरकारी नौकरी के लिए तैयारी कर रहे हैं. उन्होंने कई विभागों में फॉर्म भरे लेकिन कामयाबी नहीं मिल सकी. वो कहते हैं, "हम जैसे दलित समुदाय के युवाओं को काम ही नहीं मिल रहा है. जब रोज़गार ही नहीं होगा तो हम आगे कैसे बढ़ेंगे."

रोहित कुमार ने पिछली बार बीजेपी को वोट दिया था. लेकिन बेरोज़गारी के मुद्दे पर वो अब प्रधानमंत्री से नाराज़ हैं. वो कहते हैं, "सरकार बनने के छह माह बाद प्रधानमंत्री मोदी ने हर साल दो करोड़ नए रोज़गार पैदा करने का वादा किया था जो पूरा नहीं किया. अब जब चुनाव का समय आया है तो कुछ वैकेंसी निकाली हैं लेकिन दलित छात्रों की फ़ीस जो वापस मिलनी थी वो वापस नहीं मिली है."

नौकरी की तैयारी कर रहे छात्र
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नौकरी की तैयारी कर रहे छात्र

इसी बस स्टॉप पर खड़ी शिक्षिका आयुषि कहती हैं, "रोज़गार और विकास की दिशा में बीजेपी ने काम किया है लेकिन हम सबसे ज़्यादा ख़ुशी पाकिस्तान पर कार्रवाई से हैं. जब हमने पाकिस्तान पर एयरस्ट्राइक की तो मुझे गर्व की अनुभूति हुई."

आयुषि कहती हैं, "एयरस्ट्राइक की ख़बर देखकर मुझे अच्छा लगा कि हमने पुलवामा का बदला लिया. रोज़गार के लिए काम हुआ है, अगर सरकार दोबारा आई तो और अधिक काम होगा."

शोभा रानी भी कई सालों से सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही हैं लेकिन उन्हें अभी तक कोई मौक़ा नहीं मिल सका है. वो कहती हैं, "हमें ऐसी सरकार चाहिए जो रोज़गार दे. चाहें सरकार किसी की भी हो. हमारी उम्र निकल रही है लेकिन नौकरियां नहीं निकल रही हैं."

रोहित कहते हैं, "हमें नहीं लगता कि पाकिस्तान पर हमला कोई मुद्दा है. हमने यूट्यूब पर ऐसे भी वीडियो देखे हैं जिन्होंने इस हमले पर सवाल उठाए हैं."

मतदाता
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मतदाता

नोयडा से निकलकर सहारनपुर पहुंचते-पहुंचते ये अहसास हो जाता है कि पश्चिमी यूपी में इस बार मतदाता स्पष्ट रूप से धर्म और जाति के आधार पर बंटे हुए हैं.

देवबंद के एक मुस्लिम मतदाता कहते हैं, "मोदी के राज में किसी को कुछ नहीं मिला, सिवाए मुसीबत के अलावा ग़रीब आदमी को. हम किसान तो हैं नहीं, किसानों के तो लाख-दो लाख रुपए माफ़ कर दिए लेकिन हम जैसे ग़रीब मज़दूरों का किसी ने कुछ नहीं सोचा."

यहां के अधिकतर मुसलमान भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ मतदान कर रहे हैं. शिक्षा, रोज़गार या बेहतर सड़क उनके मुद्दे नहीं हैं. वो सिर्फ़ मोदी हराओ नारे के इर्द-गिर्द गोलबंद हो रहे हैं.

यहां एक तरफ़ मोदी के राष्ट्रवाद से प्रेरित अगड़ी जातियां हैं जो अपनी तंगहाली को भुलाकर मोदी के पीछे खड़ी हैं तो दूसरी ओर वंचित मुसलमान, दलितों और पिछड़ों का गठजोड़ है जो अपनी खोई हुई राजनीतिक ज़मीन वापस पाने के लिए पूरा ज़ोर लगाए हुए हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरठ और सहारनपुर में रैलियां की हैं. मुख्यमत्री योगी आदित्यनाथ ने भी छह रैलियां की हैं. वहीं समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल ने भी देवबंद में विशाल रैली करके अपनी ताक़त दिखा दी है.

जातीय समीकरण बाग़पत और मुज़फ़्फ़रनगर जैसी सीटों पर गठबंधन को थोड़ा आगे दिखाते हैं लेकिन बाक़ी सीटों पर मुक़ाबला बेहद कड़ा है. इस मुक़ाबले में स्थानीय मुद्दे दिखाई नहीं देते.

एक युवा मोहम्मद अरशद कहते हैं, "जनता से वोट शिक्षा, सड़क या रोज़गार के मुद्दे पर नहीं मांगे जा रहे हैं. कोई जाति की बात कर रहा है, कोई हिंदू की तो कोई सिर्फ़ मुसलमान की."

वो कहते हैं, "बीजेपी वाले वोटरों से कह रहे हैं कि कोई मुसलमान न जीत जाए. गठबंधन वाले कह रहे हैं कि बीजेपी न जीत जाए. कोई जनता के मुद्दों की बात कर ही नहीं रहा है. हमारा सबसे बड़ा मुद्दा शिक्षा है, जब शिक्षा होगी तो हमें रोज़गार भी मिलेगा. रोज़गार होगा तो सामाजिक सुरक्षा भी आएगी लेकिन कोई इसकी तो बात कर ही नहीं रहा है."

अरशद कहते हैं, "और नेता ही क्या जनता भी तो सवाल नहीं कर रही है. बस धर्म-जात देख रही है. अब वोटर अपने-अपने धर्म जात पर मर रहे हैं. बाद में जीतने वाले नेता कह देंगे कि पहले धर्म पर मरे थे, अब मरते रहो."

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English summary
Farmer suffered youth worried by recession Still thankful to Modi Ground report
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