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बाबरी विध्‍वंस: मंदिर या मस्जिद के नाम पर दंगो से कहीं आगे बढ़ चुका है देश

By Vicky Nanjappa
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नयी दिल्‍ली। भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्‍या में बाबरी मस्जिद विध्‍वंस की आज 22वीं बरसी है। आज ही के दिन 6 दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया था। आज अयोध्‍या में सुरक्षा के कड़े इंतजाम है। शहर में हजारों पुलिसकर्मी मुस्‍तैद दिखाई दे रहे हैं। स्थानीय पुलिस की खुफिया ईकाई की नजर हर व्यक्ति पर पैनी निगाह रख रही है। अयोध्या में चौराहों पर तलाशी अभियान चलाया जा रहा है और सुरक्षा और कड़ी कर दी गई है। 6 दिसंबर 1992 और 6 दिसंबर 2014 के बीच बहुत कुछ बदल चुका है। सीधे शब्‍दों में यह कहना सही होगा कि देश अब आगे बढ़ चुका है।

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अगर बाबरी विध्‍वंस को याद करूं तो उस वक्‍त मैं स्‍कूल में था। मैं मैंगलोर में था और जब दंगे फैल रहे थे तो स्‍कूल से वापस आने के अलावा और कोई रास्‍ता नहीं था। 48 घंटे बीतने के बाद मैं किसी तरह बैंगलोर जाने वाली खचाखच भरी ट्रेन में घुस गया और ट्रेन के फर्श पर बैठकर 24 घटे में बैंगलोर पहुंचा। आप में से कई लोग ऐसे होंगे जिन्‍हें वो मंजर याद होगा कि किस तरह पूरा देश दंगे की आगोश में समा गया था।

इस घटना के 18 साल बाद 23 सितंबर 2010 को इसके ऐतिहासिक फैसले को कवर करने के लिए मैं लखनऊ पहुंचा। मैं कोर्ट के लिए जा रहा था तबतक खबर आई कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसला 30 सितंबर 2010 तक के लिए टाल दिया है। मैं लखनऊ से वापस बैंगलोर आ गया। अगली सुनवाई पर मैं फिर लखनऊ आया। पूरा लखनऊ किला में तब्‍दील हो चुका था। लगभग 10 हजार पुलिसकर्मी और अन्‍य सुरक्षा बल के जवानों ने लखनऊ के चप्‍पे-चप्‍पे को घेर रखा था। फैसला दोपहर 2 बजे आने वाला था और चारों तरफ टेंशन का माहौल था। जिला प्रशासन के आदेश पर सभी दुकाने बंद कर दी गईं थी।

मैं अपने एक पत्रकार मित्र के साथ था जो मुझे हाईकोर्ट के पास ही एक होटल में ले गया। मैंने अपने मित्र से कहा कि ज्‍यादा अच्‍छा होगा कि तीन वक्‍त का खाना एक बार में ही ले लें क्‍योंकि पता नहीं फैसले के बाद खाने को कुछ मिले या ना मिले। हम सभी इस बात से वाकिफ थे कि फैसला आने के बाद दंगा भड़कना तय है। हाईकोर्ट से लगभग 500 मीटर की दूरी पर मीडिया सेंटर बनाया गया था जहां फैसला आने के बाद कांफ्रेस के माध्‍यम से बताया जाता। हम बाबरी विध्‍वंस की बात कर रहे थे और महसूस कर रहे थे कि इस फैसले के बाद दंगा होगा क्‍योंकि एक पक्ष इस फैसले से अपसेट होगा।

फिर आया वो ऐतिहासिक पल

लगभग 2 बजकर 30 मिनट हुए थे और खबर आई है कि फैसला आ गया है। अब इंतजार खत्‍म हो चुका था क्‍योंकि सही फैसला सामने आने वाला था। हमने देखा कुछ वकील मीडिया सेंटर की तरफ तेजी से आ रहे हैं। उन्‍होंने हाथ की अंगुलियों से विक्‍टरी सिंबल बनाया हुआ था। वो वकील विश्‍व हिंदू परिषद से थे और चिल्‍ला रहे थे कि फैसला हमारे पक्ष में हुआ है। उस पल हमारे दिमाग में दंगा भड़कने की बात ही नहीं आई क्‍योंकि हर शख्‍स न्‍यूज ब्रेक करने में व्‍यस्‍त था।

इस ऐतिहासिक फैसले को कवर करने के बाद दिमाग फिर दंगे की तरफ घूमा और ऐसा महसूस होने लगा कि कहीं दंगा ना हो जाये। मुझे उम्‍मीद थी कि मेरी इस स्‍टोरी पर रिकॉर्डतोड़ मैसेज आएंगे। मैंने अपने मित्र से कहा कि कम से कम 12000 मैसेज तो फिक्‍स हैं। जो भी हो लेकिन जब मैंने स्‍टोरी देखी तो सिर्फ 1500 मैसेज थे जिसके बाद मैंने खुद से कहा ''देश अब आगे बढ़ चुका है।'' हम मीडिया सेंटर से जब बाहर आए तो हमने देखा कि लखनऊ की लगभग सभी दुकाने खुल गई हैं।

जिंदगी समान्‍य तौर पर सड़कों पर दिख रही थीं और उसे देखना बहुत सकून महसूस करा रहा था। 1992 में खचाखच भरी ट्रेन में सफर की याद मेरे दिमाग में घूमने लगी और मैं सोच रहा था कि सब कुछ कैसे बदल गया है। देश के किसी कोने से भी हिंसा की एक छोटी खबर भी नहीं आई। फैसला खत्‍म होने के बाद अब समय था फैसले पर रिएक्‍शन को कवर करने का। जब वकील और याचिकाकर्ता इस पूरे मामले पर बहुत कुछ कह रहे थे उस वक्‍त लोगों में कोई रूचि नहीं थी। दोनो समुदाय (हिंदू और मुस्लिम) के लोग आपस में बात कर रहे थे कि अब ये बीती बातें हो चुकी हैं और हमें अब इसे याद करने की आवश्‍यक्‍ता नहीं।

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English summary
So much has changed between December 6th 1992 and December 6th 2014. This is a day that is remembered for the demolition of the Babri Masjid and although it will remain in the memories of many for a long time, it would be safe to say that the nation has moved on.
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