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कश्मीर में मध्यस्थता के लिए इसलिए बार-बार राग अलाप रहे हैं राष्ट्रपति ट्रंप

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बेंगलुरू। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार भारत और पाकिस्तान के द्विपक्षीय मुद्दे कश्मीर पर आखिर मध्यस्थता का राग क्यों अलाप रहे हैं? यह सवाल बार-बार सभी के मन में कौंध रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप कश्मीर पर मध्यस्थता के बहाने आखिर कौन से अमेरिकी हित साधने की कोशिश में हैं। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद से पाकिस्तान लगातार दवाब में हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप भी अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी को लेकर दवाब में हैं।

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दरअसल, सही समझ रहे हैं आप? राष्ट्रपति ट्रंप जल्द से जल्द अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी सैनिकों को स्वदेश वापसी की कोशिश कर रहे हैं। ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अपने चुनावी कैंपेन में अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी सैनिकों की स्वदेश वापसी को मुद्दा बनाया था, लेकिन राष्ट्रपति बने उन्हें तीन वर्ष से अधिक हो चुका है और अगर सैनिकों की स्वदेशी वापसी नहीं हुईं तो उनका दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति चुना जाना लगभग असंभव हो जाएगा।

यही कारण है कि राष्ट्रपति ट्रंप अफगानिस्तान से सैनिकों की स्वदेश वापसी के लिए लगातार कश्मीर पर मध्यस्थता का राग अलाप रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जानते हैं कि पाकिस्तान की मदद के बिना अमेरिकी सैनिकों का स्वदेश लौटना मुश्किल हैं इसलिए पाकिस्तान को खुश करने के लिए ट्रंप लगातार दोनों देशों द्विपक्षीय मसलों पर मध्यस्थता को लेकर ऊल-जुलूल बयान देने को मजबूर हैं।

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पाकिस्तान ने ही अफगानिस्तान में तालिबान को खड़ा किया है और अगर पाकिस्तान नहीं चाहेगा तो अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से कभी नहीं लौट पाएंगे। यही कारण है कि पाकिस्तान के दवाब में आकर बार-बार कश्मीर का मुद्दा छेड़ रहे हैं ताकि अपने चुनावी वादों को पूरा कर सकें।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कश्मीर मसले पर मध्यस्थता का राग पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान के खान के अमेरिकी दौरे के दौरान एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेस में छेड़ी थी। उन्होंने सफेद झूठ बोलते हुए संयुक्त प्रेस कांफ्रेस में कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें कश्मीर मुद्दे के हल के लिए अमेरिका से मध्यस्थता करने की बात कही थी।

ट्रंप के बयान से भारत में खलबली मच गई और भारतीय विदेश मंत्रालय ने तुरंत बयान जारी कर मामले पर भारत का स्टैंड क्लियर कर दिया, जिससे राष्ट्रपति ट्रंप की पूरी दुनिया में खूब किरकिरी हुई, लेकिन ट्रंप को अपना निहितार्थ है, इसलिए पाकिस्तानी दवाब में राष्ट्रपति ट्रंप जब तब कश्मीर पर मध्यस्थता का राग छेड़ते रहते हैं।

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गौरतलब है डोनाल्‍ड ट्रंप के पूर्ववर्ती राष्‍ट्रपतियों ने पहले अफगानिस्‍तान और उसके बाद इराक के अलावा अन्‍य खाड़ी देशों में युद्ध की शुरुआत की, लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप उन देशों से अपने सैनिकों की वापसी चाहते हैं। राष्‍ट्रपति बनने से पहले डोनाल्‍ड ट्रंप ने जनता से यह वादा भी किया था कि दुनिया भर में जहां-जहां अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, वो उन्‍हें वापस बुलाएंगे।

इसी नीति पर काम करते हुए ट्रंप ने सीरिया से सैनिकों को वापस बुला लिया है, लेकिन तालिबान के हाथों लगभग लड़ाई हार चुका अमेरिका बिना पाकिस्तान की मदद के सैनिकों की वापसी नहीं कर सकता है। क्योंकि तालिबान को पालने-पोषने वाला पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे पर अमेरिकी हस्तक्षेप चाहता है।

अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से वापसी के लिए पाकिस्तान एक ही शर्त पर तैयार हो सकता है। पूरी तरह से चौपट हो चुकी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को आर्थिक मदद पहुंचा कर अमेरिका पाकिस्तान को इसके लिए पहले आसानी से तैयार कर सकता है, लेकिन कश्मीर मुद्दे पर पूरी दुनिया अकेला पड़ चुका पाकिस्तान अब मसले पर अमेरिकी हस्तक्षेप चाहता है। यही कारण है कि बार-बार फजीहत होने के बाद बाद भी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप कश्मीर पर अमेरिकी मध्यस्थ्ता करने का बयान देने से खुद को नहीं रोक पा रहे हैं।

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कश्मीर पर मध्यस्थता पर दिया गया अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ताजा बयान के पीछे तालिबान हैं। क्योंकि काबुल में हालिया बम धमाके में एक अमेरिकी सैनिकों समेत 19 लोगों की मौत हो गई। तालिबानी लड़ाकों द्वारा अंजाम दिए गए बम धमाकों के बाद अमेरिका ने तालिबान के साथ जारी बातचीत को स्थगित कर दिया।

इससे पहले भी अमेरिका कुवैत में तालिबान के साथ कई दौर की बातचीत कर चुका है, लेकिन सहमति नहीं बनी थी। तालिबान के साथ वार्ता बंद होने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा एक बार फिर कश्मीर पर मध्यस्थता का राग अलापने के पीछे एक ही उद्देश्य है कि वह पाकिस्तान को खुश करना चाहता है, जो उसे अफगानिस्तान से निकलने में मदद कर सकता है।

हालांकि इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के लिए भारत और पाकिस्तान दोनों को अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ सैन्य मोर्चा संभालने की अपील की थी, लेकिन ने अफगानिस्तान में सैनिक कार्रवाई से इनकार कर दिया और पाकिस्तान भला क्यों स्वपोषित तालिबान के खिलाफ कार्रवाई को तैयार होगा। अफगानिस्तान में भारत के सैन्य कार्रवाई करने से इनकार भी ट्रंप को पंसद नहीं आया। यही कारण है कि अमेरिकी राष्ट्रपति व्यंगात्मक लहजे में कहा कि भारत अफगानिस्‍तान में एक लाइब्रेरी खोलकर वहां बड़ी मदद करने जा रहा है।

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उल्लेखनीय है भारत नहीं चाहता कि अफगानिस्‍तान से अमेरिकी सैनिक वापस जाएं, क्योंकि ऐसा होते ही अफगानिस्तान की सत्ता पर वापस तलिबानी लौट आएंगे। अफगानिस्‍तान में करीब 5 अरब डॉलर का निवेश किया है। चूंकि पाकिस्तान पोषित तालिबानी भारत का विरोधी है और सत्ता में वापस लौटते ही वह सभी भारतीय प्रोजेक्‍ट्स पर रोड़ें अटकाएगा।

इतना नहीं नहीं, अमेरिकी सैनिकों के वहां लौटते ही अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान लौट आने से भारत को कश्मीर में आतंकवाद खतरा बढ़ जाएगा। शायद यही कारण है कि भारत सधी हुई भाषा में अमेरिका और पाकिस्तान के हरकतों और बयानों पर नज़र बनाए हुए है और हर उस जगह पर दोनों को मात देने की कोशिश की है जहां दोनों देशों के द्विपक्षीय मुद्दों का अंतर्राष्ट्रीयकरण की कोशिश अब तक की गई है।

इतिहास गवाह है कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 हटाए जाने से पूर्व पाकिस्तान कभी भी किसी अमेरिकी राष्ट्रपति पर इतना दवाब बना पाया होगा। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की मजबूरी ही कहेंगे कि जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर दवाब बनाने के लिए कंगाली के दौर से गुजर रही पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था से समझौता करने को तैयार हो गई है। वरना आर्थिक मदद के नाम पर पिछली पाकिस्तानी सरकारों और वहां शासनाध्‍यक्ष का इतिहास खंगाला जा सकता है।

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पाकिस्तानी शासनाध्यक्ष ज़िया उल हक ने सोवियत संघ से लड़ने के लिए तालिबान बनाने को तैयार हो गई थी, जिसके लिए जिया उल हक ने अमेरिका से 25 अरब डॉलर और F16 विमान लिया था। इसके बाद वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद अल-कायदा के खिलाफ कार्रवाई के लिए तत्कालीन राष्‍ट्रपति मुशर्रफ ने अमेरिका से 34 अरब डॉलर लिए थे जबकि पूरी दुनिया जानती है कि अल-कायदा के सरगना ओसामा-बिन-लादेन को पाकिस्‍तान ने ही पनाह दे रखी थी।

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English summary
USA President Donald trump again and again giving statement on Kashmir Mediation which is bilateral issue of both India and Pakistan but Trump has their own game behind?
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