क्या भारत में औरतों को मर्दों के बराबर अधिकार हैं?
मर्द ही नहीं, भारत में औरतें भी मानती हैं कि उन्हें बराबर अधिकार हासिल हैं.
बीबीसी ने देश के 14 राज्यों में 10,000 से ज़्यादा लोगों से जब ये सवाल पूछा तो 91 फ़ीसदी ने 'हां' में जवाब दिया.
सर्वे में हिस्सा लेनेवाले लोगों में से दो-तिहाई का मानना है कि पिछले दो दशक में बराबरी बढ़ी है और बड़ी संख्या में लोगों के मुताबिक़ औरतों की ज़िंदगी अब मर्दों जितनी ही अच्छी है.
ग्रामीण और कम समृद्ध लोगों के मुताबिक तो औरतों की ज़िंदगी अब मर्दों से बेहतर हो गई है.
ऐसा लगता है कि सभी लोग सैद्धांतिक तौर पर समान हकों के पक्ष में हैं और ऐसा महसूस करते हैं कि भारत में औरतों के लिए बहुत अच्छा समय है. पर ऐसा हुआ क्या?
#MeToo और युवाओं की लड़ाई
समानता की ये छवि बनने के पीछे कई वजहें हैं.
हाल में #MeToo जैसे आंदोलन जिसने ऊंचे पदों और ताकत के दुरुपयोग को चुनौती दी और ये ज़ाहिर किया कि यौन उत्पीड़न कितना व्यापक है.
पिछले कुछ दशक में महिला आंदोलनकारियों और नौजवानों ने सरकारों को बेहतर क़ानून लाने पर मजबूर किया है.
ये निजी ज़िंदगी से जुड़े क़ानून जैसे पैतृक संपत्ति में हक़, तलाक़, गोद लेने इत्यादि से लेकर क्रिमिनल लॉ जिसमें यौन हिंसा को बेहतर तरीके से परिभाषित किया गया है और न्याय प्रक्रिया की रफ़्तार तेज़ करने की कोशिश की गई है.
इन कोशिशों के बावजूद, औरतों की ज़िंदगी के अनुभव बताते हैं कि उन्हें मर्दों जैसे अधिकार नहीं हासिल हैं.
बीबीसी के सर्वे में पूछे गए सवालों के जवाबों से इस विरोधाभास की परतें खुलती हैं.
अब भी इतना सब कुछ झेलती हैं औरतें
भारत में लगातार गिरता बच्चों का लिंगानुपात ये ज़ाहिर करता है कि अब भी लड़कियों के मुकाबले लड़के की चाहत प्रबल है. साल 2011 के आंकड़ों के मुताबिक ये लिंगानुपात आज़ादी के बाद अपने सबसे कम स्तर पर आ गया है.
हमारी अदालतों पर काम का दबाव ज़्यादा है और क़ानून में बलात्कार के मामलों को फ़ास्ट-ट्राक अदालतों में चलाए जाने के प्रावधान के बावजूद सुनवाई तयशुदा व़क्त में पूरी नहीं होती है.
यौन उत्पीड़न के मामलों को साबित करना बहुत मुश्किल है और औरतों को इनकी सुनवाई के अलावा जवाब में किए गए मानहानि के मुकदमों से भी जूझना पड़ता है.
गर्भावस्था के दौरान ज़रूरी सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाओं की अब भी कमी है. यूनीसेफ़ (UNICEF) के मुताबिक दुनियाभर में रोज़ 800 औरतों की गर्भावस्था से ज़ुड़ी ऐसी बीमारियों से मौत होती हैं जो बेहतर सुविधाओं से रोकी जा सकती थीं. इनमें से 20 फ़ीसदी औरतें भारत से हैं.
वर्ल्ड बैंक के ताज़ा आंकड़ों के मुतबिक भारत में 15 साल से ज़्यादा की उम्र की औरतों में से सिर्फ़ एक-तिहाई ही कामकाजी हैं. ये दुनियाभर में कामकाजी औरतों की सबसे कम दरों में से है.
बराबरी का मतलब समझते हैं लोग?
बीबीसी के सर्वे में पूछे गए सवालों के जवाबों से ये साफ़ होता गया कि समान अधिकारों की चाहत तो है पर व्यावहारिक तौर पर उसका मतलब क्या है उसकी समझ नहीं है.
तीन-चौथाई से ज़्यादा लोगों ने ये माना कि औरतें अगर चाहें या उन्हें ज़रूरत हो तो उन्हें घर के बाहर काम करना चाहिए पर एक-तिहाई मानते हैं कि शादी के बाद औरतों का काम करना ठीक नहीं है.
सर्वे में पता चलता है कि औरतों के लिए बेहतर माने जानेवाले राज्य, जैसे तमिल नाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और मिज़ोरम में कामकाजी औरतों की दर ज़्यादा है, बिहार, उत्तर प्रदेश और गुजरात में काफ़ी कम.
सभी लोगों के जवाब देखें तो एक बहुत छोटी दर ही मानती है कि औरतें अपनी ख़्वाहिश से काम करती हैं. ज़्यादातर मानते हैं कि वो घर में पैसों की किल्लत को पूरा करने के लिए नौकरी करती हैं.
ज़्यादातर ये भी मानते हैं कि औरत की जगह घर के अंदर होती है. क्योंकि वो घर से बाहर निकलें तो घक के काम पर बुरा असर पड़ता है और सुरक्षा के लिहाज़ से चिंताएं बढ़ती हैं.
हिंसा से जुड़ी परेशान करने वाली राय
अगर नौकरियां कम हों, तो लोगों का मानना है कि मर्दों को पहला मौका देना चाहिए. महिलाएं तक ऐसा मानती हैं. जिससे ये ज़ाहिर होता है कि औरतों को घरेलू भूमिका में देखनेवाली सोच कितनी गहरी है.
लड़कियों के मुकाबले लड़के की चाहत से सर्वे में तो लोग इनकार करते हैं पर एक बड़ा तबका मानता है कि युनिवर्सिटी के स्तर पर शिक्षा पाने का हक़ लड़कियों से ज़्यादा लड़कों का है.
मणिपुर, जहां स्त्रियों को परिवार में प्रधान मानने का प्रचलन है, वहां के ज़्यादातर लोगों ने कहा कि उच्च शिक्षा पाने का हक़ बराबरी से मिलना चाहिए.
सर्वे में सबसे परेशान करने वाली राय औरतों के ख़िलाफ़ हिंसा से जुड़ी है. अधिकांश लोगों ये मानते हैं कि यौन हिंसा बढ़ी है (जो तथ्य है) पर ये भी कहते हैं कि औरतों को परिवार को साथ रखने के लिए हिंसा बर्दाश्त करनी चाहिए.
थोड़ा बदलाव है, थोड़े की ज़रूरत है
देश की एक झलक के तौर पर सर्वे बताता है कि औरतों के अधिकारों को समझने के तरीके में बदलाव आ रहा है.
औरतें परिवार और घर के बाहर अपनी भूमिका के दायरे बढ़ा रही हैं. पर उनके अपनी ज़िंदगियों पर इख़्तियार बढ़ाने के लिए औरों को अपना नियंत्रण कम करना होगा.
अधिकारों का यही लेन-देन समझना मुश्किल है और इसीलिए ज़िंदगी में उसका अमल धीमा. पर अगर समझने की कोशिश हो और रूढ़िवादी सोच को बदलने की चाहत, तो बदलाव आख़िरकार आएगा ज़रूर.
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