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उत्तर प्रदेश चुनाव में महाराजा सुहेलदेव की चर्चा के क्या हैं मायने? - ग्राउंड रिपोर्ट

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नेपाल से सटे उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले में 27 फ़रवरी को मतदान होना है. इस हफ़्ते वहाँ चुनाव प्रचार ज़ोरों पर रहा. मंगलवार को बहराइच, गोंडा और नेपाल से सटे प्रदेश के दूसरे ज़िलों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिए चुनावी भाषणों में बार-बार महाराज सुहेलदेव का ज़िक्र आया.

Discussion of Maharaja Suheldev in Uttar Pradesh elections

बहराइच में दिए गए 44 मिनट के भाषण में प्रधानमंत्री ने कहा, 'जिस धरती पर हम हैं, यह धरती ही महाराजा सुहेलदेव के पराक्रम की महक लिए हुए है. पिछले वर्ष मुझे उनके स्मारक के शिलान्यास का सौभाग्य मिला. इस स्मारक में उनकी भव्य प्रतिमा भी लगाई जाएगी. सुहेलदेव की धरती के लोगों का एक-एक वोट देश को मज़बूती देगा.'

ऐसे में ये सवाल पूछना लाज़िमी हो जाता है कि महाराज सुहेलदेव आख़िर हैं कौन, जिनकी बातें प्रधानमंत्री से लेकर भारतीय जनता पार्टी के दूसरे नेता कर रहे हैं?

कौन थे सुहेलदेव महाराज?

लोक साहित्य में माना जाता है कि महाराजा सुहेलदेव ने 11वीं सदी में महमूद ग़ज़नवी के भतीजे ग़ाज़ी सैयद सालार मसूद को बहराइच के चित्तौरा की रणभूमि में परास्त कर मार गिराया था.

महमूद ग़ज़नवी ने हिंदुओं के प्रसिद्ध सोमनाथ के मंदिर को तोड़ा था.

चित्तौरा की रणभूमि की कहानी सुहेलदेव महाराज की शौर्यगाथा की आधारशिला है. प्रयागपुर तहसील की चित्तौरा में उनका स्मारक तैयार हो रहा है.

न्यास समिति के उपाध्यक्ष यशवेंद्र विक्रम बताते हैं, 'सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी अपनी फौज के साथ यहां हमला करने और क्षेत्र को क़ब्ज़ा में लेने आए थे. महाराज ने इलाक़े के दूसरे मातहत राजाओं और अन्य को संगठित कर महाराजा सुहेलदेव ने ग़ाज़ी से युद्ध लड़ा. श्रावस्ती में महाराजा सुहेलदेव का राज महल और रियासत हुआ करती थी. चित्तौरा में भीषण युद्ध हुआ और यहीं पर उन्होंने सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी को मारा. चित्तौरा जहां अभी स्मारक बन रहा है वहीं युद्ध भूमि थी.'

यशवेंद्र विक्रम के अनुसार मसूद ग़ाज़ी को बहराइच में दफ़नाया गया.

दलित मामलों के जानकार और लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रविकांत चौहान के अनुसार महाराजा सुहेलदेव का इतिहास लोक स्मृति में ही है. उसे राजनीतिक इतिहास के रूप में दर्ज नहीं किया गया.

https://www.youtube.com/watch?v=zrQZca5pg4g

लेकिन प्रोफेसर रविकांत साथ ही कहते हैं,"लोक इतिहास में हो सकता है वक़्त के साथ कुछ बदलाव होते हों लेकिन वो निराधार क़तई नहीं होता है. तो इसलिए सुहेलदेव कोई नायक रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है."

लेकिन कुछ इतिहासकार तथ्यों के अभाव की बात करते हैं.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास के विभाग प्रमुख हेरम्ब चतुर्वेदी कहते हैं,"मैं इस बात से इंकार नहीं कर रहा कि जंग हुई. सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी वहां गए. लेकिन कब गए? पहले के इतिहासकारों ने इसकी कोई तारीख नहीं दी है. जो नैरेटिव बन रहे हैं उपन्यास में तो चल सकते हैं लेकिन इतिहास में उन्हें प्रमाणित करने की ज़रुरत होती है जो सिक्कों, अभिलेख, शिलालेख या स्तम्भलेख से पुष्ट होते हैं."

जाति पर भी प्रश्न चिह्न?

हेरम्ब चतुर्वेदी कहते हैं कि ये एक जटिल पहेली है कि वो राजभर थे या पासी.

चतुर्वेदी कहते हैं,"अगर वो राजा थे तो मेरा तो एक विनम्र सुझाव है कि अवश्य भर होंगे. क्योंकि इस पूरे इलाक़े में भरों का राज्य मिल रहा है. तो इस दृष्टिकोण से राजभर होने चाहिये."

प्रोफेसर रविकांत चौहान कहते हैं,"इसमें कोई शक नहीं कि वो बहुजन ही हैं. पासी उन्हें अपना नायक मानते हैं, राजभर उन्हें अपना."

प्रोफेसर चौहान के मुताबिक़ आरएसएस की कोशिश रही है कि वो इस दलित नायक का, 'क्षत्रियकरण' करें.

वो कहते हैं, "आप देखेंगे कि बहराइच में जो मूर्ति है, उसकी जो काया है वो महाराणा प्रताप की तरह दिखती है. उनकी कल्पना को एक ख़ास आकृति में गढ़ने की ये कोशिश है."

यशवेंद्र विक्रम बताते हैं कि महाराजा सुहेलदेव की जाति की कोई औपचारिक पुष्टि नहीं हो पा रही है. उनके मुताबिक़ राजभर अपनी वंशावली लेकर आता है, राजपूतों में उनको लेकर अपनी वंशावली बनी हुई है, बाक़ी समाज के लोग भी कहते हैं कि हमारे समाज से थे.

समिति का पक्ष रखते हुए वो कहते हैं कि समिति ने उनकी जाति को लेकर कभी किसी चीज़ को बढ़ावा नहीं दिया.

वे कहते हैं,"एक महापुरुष को जाति धर्म में बांध के उसका विवाद बनाना, हम समझते हैं कि एक महापुरुष के सम्मान के ख़िलाफ़ है."

चित्तौरा में बने सुहेलदेव मंदिर के पुजारी शोभाराम दास कहते हैं, "हम यह जानते हैं कि वो हिंदू हैं और उन्होंने हिंदू का धर्म निभाया, धर्म की रक्षा की. पहले उन्हें क्षत्रिय, बाद में वैश्य, फिर राजभर और पासी बताए गए. हम ये कहेंगे वो हिंदू थे, हमारे पूज्य हैं, और हमारे धर्म की रक्षा के लिए खड़े हुए."

सपा-सुभासपा के गठबंधन का असर?

22 फ़रवरी के अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "बहराइच की यह धरती हमेशा से आक्रमणकारियों के मंसूबों को ध्वस्त करती रही है. देश के ख़िलाफ़ जाने वालों को यह मिट्टी माफ़ नहीं करती है. लेकिन इसी मिट्टी ने देखा है कि कैसे इन परिवारवादियों ने आतंकी हमला करने वालों पर अपना प्यार उड़ेला. जिन लोगों पर एक नहीं, कई-कई बम धमाकों का आरोप था, यह लोग, उन आतंकवादियों को, जेल से रिहा करने पर पक्का निर्णय करके बैठे थे. साज़िश कर रहे थे. यह उन पर मुक़दमा नहीं चलवाना चाहते थे."

फिर उन्होंने समाजवादी पार्टी को सीधा नाम लेकर निशाने पर लिया और कहा,"समाजवादी सरकार आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध लगवाने तक ख़िलाफ़ थी. इसलिए मैं कहता हूँ, जो लोग देश की नहीं सोच सकते, देश की सुरक्षा को ताक़ पर रखते हैं. वो यूपी का कभी भला नहीं कर सकते."

ऐसे बयानों से यह सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा इस मामले को उठाकर जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है?

प्रोफेसर रविकांत चौहान कहते हैं,"आरएसएस ने उन्हें एंटी-मुस्लिम के तौर पर पेश करने की कोशिश की है, लेकिन उस समय शायद ऐसी बात न रही हो. उसका एक प्रमाण ये भी है कि ग़ाज़ी मियां की जो दरगाह है, वहां पर हिंदू ज़्यादा जाते हैं मुसलमानों की अपेक्षा. जो मेला वहां लगता है, उसमें हिन्दुओं की तादाद बहुत ज़्यादा होती है."

ग़ाज़ी मियां की बहराइच में मज़ार है, जहां सालाना उर्स और मेला लगता है जिसमें लोग दूर-दूर से आते हैं.

यशवेंद्र विक्रम का कहना है कि चित्तौरा में भी पिछले 25-30 सालों से मेले का आयोजन हो रहा है, जिसमें आरएसएस के लोग भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे हैं.

यशवेंद्र विक्रम कहते हैं, "मेले में राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री रहते हुए, योगी आदित्यनाथ अपने संसदीय कार्यकाल में आए. लेकिन हमने जाति-धर्म के आधार पर वर्गीकरण नहीं होने दिया. हमारा ध्यान रहा कि हिंदू आएं या मुसलमान किसी को किसी तरह की असुविधा ना हो. ऐसा कोई संदेश समाज में ना जाए कि लोगों में बंटवारा किया जा रहा है."

बहराइच के वरिष्ठ पत्रकार हेमंत मिश्र कहते हैं,"1992 राम जन्म भूमि आंदोलन के समय भी आरएसएस से जुड़े संगठनों ने महाराजा सुहेलदेव के महिमामंडन की कोशिश की थी. तमाम कार्यक्रम करवाए गए थे. हिन्दू युवा वाहिनी के नेता के तौर पर योगी आदित्यनाथ कई बार आए. लेकिन महाराजा सुहेलदेव के नाम पर जो सियासी लाभ मिलना चाहिए था, वो उन्हें उस तरह से नहीं मिल सका."

वो कहते हैं, "मसूद ग़ाज़ी के मौत को हिंदू के हाथों मुसलमान के वध की कहानी चलाने के बावजूद राजभर वोटर अभी भी अपने जातीय नेताओं के बीच ही फंसा हुआ है."

क्या कहती है सुभासपा?

चुनाव के पहले ओम प्रकाश राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्या, दारा सिंह चौहान, राम अचल राजभर जैसे नेताओं के जाने से कहा जा रहा है कि बीजेपी को बड़ा झटका लगा है.

बीजेपी की पिछड़ी राजनीति को एक और चोट तब लगी, जब ये लोग एसपी के साथ हो लिए. इससे यह संकेत गया है कि यादवों के अलावा अन्य पिछड़ी जातियां भी सपा के पक्ष में गोलबंद होने लगी है.

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रवक्ता अरुण राजभर का आरोप है कि भाजपा सुहेलदेव महाराज का अलग-अलग जातियों को जोड़ने के लिए इस्तेमाल कर रही है.

अरुण राजभर कहते हैं, "राजभर वोट लेना होता है तो कहते हैं, महाराजा सुहेलदेव राजभर हैं. पासी का वोट लेना होता है, तो उन्हें पासी बताते हैं. क्षत्रियों में जाते हैं तो कहते हैं कि वो क्षत्रिय हैं. मतलब यह की उनके महान व्यक्तित्व को जातियों में बाँट देते हैं."

वो विश्व हिन्दू परिषद पर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में महाराजा की जाति बदल-बदल कर उनके इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए कहते हैं,"जैसे अमेठी है, रायबरेली है, लखनऊ है, सीतापुर है, लखीमपुर है, इमने उन्हें पासी कह दिया. और इधर बहराइच से लेकर भदोही तक राजभर बना दिया. भाजपा ने बांटने के राजनीति और बांट कर उन्हें अपमानित करने का काम किया है."

अरुण राजभर ये आरोप भी लगाते हैं कि 'अगर हम भगवान राम को क्षत्रिय मानते हैं, तो फिर महाराजा सुहेलदेव 'राजभर' बोलने में भाजपा को पीड़ा क्यों होती है? इन्हीं का नाम लेकर वो दूसरी जातियों तक पहुंचना चाहते हैं.'

कौन है राजभर और पासियों की पसंद?

उत्तर प्रदेश के दलितों में लगभग 16 प्रतिशत पासी हैं. लेकिन पूरे प्रदेश में उनका कोई भी नेता नहीं है जिसके बैनर तले वो संगठित होकर अपना दल बना कर राजनीतिक दबाव डाल सकें.

प्रदेश में राजभरों की अनुमानित संख्या सिर्फ दो प्रतिशत है लेकिन वो पूर्वांचल की 60 सीटों में नतीजों को प्रभावित करने का माद्दा रखते है. अपना ओबीसी जनाधार बढ़ाने के मकसद से अखिलेश यादव ने ओम प्रकाश राजभर के साथ गठबंधन किया जिनकी पार्टी से 2017 में चार विधायक चुन कर आये थे.

भाजपा ने दिसंबर 2018 में महाराज सुहेलदेव के नाम का एक डाक टिकट जारी किया था. आनंद विहार से ग़ाज़ीपुर के बीच चलने वाली एक ट्रेन का नाम सुहेलदेव एक्सप्रेस रखा गया और अब चित्तौरा में स्मारक.

लेकिन सवाल यह है कि महाराजा सुहेलदेव की शख्सियत का कितना राजनीतिक असर हो रहा है? और क्या राजभर और पासी बिरादरी के लोग इन कोशिशों से प्रभावित होकर भाजपा से जुड़ रहे हैं?

बहराइच के बभनिया फाटा गांव के निवासी जय किशोर राजभर कहते हैं, "जो भाजपा धर्म स्थल के लिए कर रही है वो ठीक हैं. लेकिन वो धर्म स्थल है और राजनीति अलग है. ओम प्रकाश राजभर शक्तिशाली नेता हैं, और उनके बातों में दम रहता है. तो इसीलिए वो जो निर्णय लेते हैं बड़ा सोच समझ कर लेते हैं. तो राजभरों का झुकाव उनके प्रति रहता है. जो इशारा वो करते हैं राजभर समाज के लोग ज़्यादा मानते हैं."

दूधनाथ राजभर कहते हैं, "जब इलेक्शन आएगा तो यह कहेंगे कि हम महाराजा सुहेलदेव की स्मारक लगवाएँगे. पार्क बनवाएँगे, मूर्ति लगवाएँगे. स्मारक बनाने के पीछे एक बात है, कि महाराजा सुहेलदेव राजभर हैं. मगर राजभर टाइटल लिखने से बचते हैं. अगर हमारे महाराजा सुहेलदेव राजभर हैं, तो राजभर लिखना चाहिए. उसकी जाति वाली टाइटल दीजिए. इसलिए हम लोग उसको जुमला समझते हैं."

पास खड़े बाबूराम बताते हैं कि वो पासी बिरादरी से हैं और कहते है, "मैं झूठ नहीं बोलता, मैं तो भाजपा से जुड़ा हूँ. मोदी जी सबको मानते हैं. आंबेडकर जी को भी उन्होंने माना. कितनी जगह अंबेडकर पार्क बना हुआ है. हमे जातीयता नहीं, एकता चाहिए. हम एकता पर हैं. प्रेम पर हैं, भाईचारा पर हैं."

लेकिन ग़ौर करने की बात है कि अगर महाराजा सुहेलदेव की तस्वीर बहराइच के बाज़ार में महापुरुषों की तस्वीर बेचने वालों की दुकान पर ढूंढने की कोशिश करेंगे तो शायद वो आपको न मिले.

ओम प्रकाश राजभर का झंडा घर पर लगा हुआ देखकर हमने नई बस्ती के रहने वाले अनर्जित से पूछा कि क्या उनके पास महाराजा सुहेलदेव की कोई तस्वीर है, तो उन्होंने कहा,"हम उन्हें पूजते तो नहीं हैं, लेकिन मानते हैं कि वो हमारी जाति के हैं. हमारे बिरादर है, लेकिन घर में कोई तस्वीर नहीं है."

पासी भले ही भाजपा को वोट दें लेकिन क्या महाराजा सुहेलदेव का मान-सम्मान उनके समर्थन की बड़ी वजह है?

इस बारे में पूछने पर मिहींपुरवा के राजू कुमार कहते हैं, "सुहेलदेव महाराज के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है. जिसके बारे में हम नहीं जानते, उनके बारे में कैसे बोल सकते हैं."

सरकार किसकी बनेगी, इस पर वो कहते हैं, "हवा तो बहुत उड़ रही है, लेकिन सरकार भाजपा की ही होगी, क्योंकि वो सुरक्षित और ख़ुशी महसूस करते हैं कि दंगा-फसाद नहीं हो रहा."

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