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मायावती की जगह लेने को बेताब ‘रावण’, क्या कांशीराम की तरह बनेंगे दलितों के मसीहा?

‘रावण’, क्या कांशीराम की तरह बनेंगे दलितों के मसीहा?

नई दिल्ली। क्या उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति का अहम किरदार अब बदलने वाला है ? भीम आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद रावण ने 2022 में यूपी चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। उत्तर प्रदेश में अब तक मायावती ही दलित राजनीति का केन्द्र रही हैं। लेकिन अगर चंद्रशेखर ने चुनौती दी तो मायावती का एकाधिकार टूट सकता है। चंद्रशेखर अभी युवा हैं और दलित हितों के संरक्षक के रूप में तेजी से उभर रहे हैं। उन्हें दलित नौजवानों का भरपूर समर्थन मिल रहा है। मायावती मजबूत नेता हैं लेकिन वे चंद्रशेखर के बढ़ते प्रभाव से चिंतित हैं। यह सही है कि चंद्रेशखर को अभी चुनावी राजनीति का कोई अनुभव नहीं है। लेकिन वे दलित हितों के लिए इसी तरह संघर्षरत रहे तो एक दिन जरूर मायावती की जगह ले सकते हैं। ठीक उसी तरह जैसे कि मायावती ने 90 के दशक में दिग्गज नेताओं को दरकिनार कर अपने लिए जगह बनायी थी।

खुद की राह बनाने चले चंद्रशेखर

खुद की राह बनाने चले चंद्रशेखर

दलितों के उभरते नेता चंद्रशेखर पर कांग्रेस की भी नजर थी। 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले पहले प्रियंका गांधी ने उनसे अस्पताल में मुलाकात की थी। जब कांग्रेस और भीम आर्मी में गठबंधन की अटकलें लगने लगीं तो चंद्रशेखर को इसका खंडन करना पड़ा। चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बनारस से चुनाव लड़ने की घोषणा कर भी सुर्खियां बटोरी थीं। उस समय भी मायावती ने चंद्रशेखर को निशाने पर लिया था। मायावती ने कहा था कि चंद्रशेखर भाजपा के एजेंट हैं और दलित वोटों में बंटवारा के लिए चुनाव लड़ना चाहते हैं। इसके बाद चंद्रशेखर ने चुनाव लड़ने का विचार छोड़ दिया। वे चुनाव से तो हट गये लेकिन उसी समय अपने इरादे जाहिर कर दिया थे। अम्बेडकर जयंती पर एक समारोह में चंद्रशेखर ने कहा था कि देश के दलितों की हितैषी भीम आर्मी है न कि मायवती।

मायावती को चंद्रशेखर से परहेज

मायावती को चंद्रशेखर से परहेज

करीब पांच महीना पहले चंद्रशेखर ने मायावती को एक मंच पर आने के लिए प्रस्ताव भेजा था। मायावती को लिखे पत्र में उन्होंने कहा था कि जिस तरह से भाजपा का पूरे देश में विस्तार हो रहा है उसके रोकने के लिए हम दोनों को एक साथ होना चाहिए। भाजपा के शासन में बहुजन समाज पर अत्याचार बढ़ा है। ऐसे में बहुजन समाज को एकजुट होने की जरूरत है। लेकिन मायावती ने चंद्रशेखर के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। मायावती दलित राजनीति पर एकाधिकार बनाये रखना चाहती हैं। उन्होंने तत्काल चंद्रशेखर से पल्ला झाड़ लिया और उन्हें भाजपा की कठपुतली बता दिया।

सबसे बड़ा दलित नेता कौन? पहले भी हुई है जंग

सबसे बड़ा दलित नेता कौन? पहले भी हुई है जंग

कांशी राम ने सरकारी नौकरी छोड़ कर जब शिड्यूल्ड कास्ट को एकजुट करने का अभियान चलाया तो सबसे पहले उन्होंने उस समय के स्थापित दलित नेताओं को खारिज कर दिया था। 1982 में कांशीराम ने एक किताब लिखी थी- चमचा युग। इस किताब में कांशीराम जगजीवन राम और रामविलास पासवान जैसे नेताओं को चमचा की श्रेणी में डाल दिया था। कांशीराम ने जगजीवन राम और रामविलास पासवान को सवर्णों की कठपुतली बताया था। जगजीवन राम कांग्रेस के इशारे पर काम करते थे तो रामविलास पासवान लोकदल और जनता दल के लिए काम करते थे। ऐसे कठपुतली नेताओं की वजह से दलितों को वाजिब हक नहीं मिला। तब कांशीराम ने कहा था कि वास्तविक अधिकार पाने के लिए दलितों का अपना दल होना चाहिए। यह दल संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ कर अपने लोगों को हक दिलाएगा। कांशीराम दलित शब्द को नापसंद करते थे। इसलिए 1984 में जब उन्होंने नयी पार्टी बनायी तो उसका नाम बहुजन समाज पार्टी रखा। कांशीराम ने मायावती को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया। 11 साल बाद ही मायावती उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने में सफल हो गयीं। उन्होंने उस समय की दलित नेता मीरा कुमार (कांग्रेस) और रामविलास पासवान (जनता दल) को पछाड़ कर नम्बर एक का पायदान हासिल किया था। अब चंद्रशेखर भी मायावती को चुनौती देकर दलित राजनीति का नया अध्याय लिखना चाहते हैं।

कांशीराम के फॉर्मूले पर चल रहे चंद्रशेखर

कांशीराम के फॉर्मूले पर चल रहे चंद्रशेखर

चंद्रशेखर ने नम्बर 2019 में मायावती को जो चिट्ठी लिखी थी उसमें कांशीराम के विचारों का भी जिक्र था। चंद्रशेखर भी कांशीराम की तरह लड़- लड़ कर जीतना चाहते हैं। कांशीराम अपने कार्यकर्ताओं से कहते थे, पहला चुनाव हारने के लिए लड़ो, दूसरा चुनाव पहचान बनाने के लिए लड़ो और तीसरा चुनाव जीतने के लिए लड़ो। उन्होंने खुद इस पर अमल किया था। पार्टी गठन के कुछ महीने बाद ही 1984 में लोकसभा का चुनाव आ गया। नयी नवेली पार्टी की अभी कोई पहचान भी नहीं बनी थी। फिर भी कांशीराम ने चुनाव लड़ने का फैसला किया। कांशीराम छत्तीसगढ़ (तब मध्य प्रदेश) के जांजगीर चंपा से तो मायावती ने मुजफ्फर नगर के कैराना लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। लेकिन दोनों हार गये। इसके बाद कांशीराम ने मायावती को लगातार दो लोकसभा उप चुनावों में उतारा लेकिन उनकी हार होती रही। 1985 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ था। इस चुनाव में कांग्रेस से मीरा कुमार, जनता दल से रामविलास पासवान तो बसपा से मायावती चुनाव मैदान में थीं। दलित राजनीति के तीन प्रमुख नेताओं में जंग थी। बाजी मीरा कुमार के हाथ लगी। दूसरे स्थान पर पासवान रहे थे। मायावती तीसरे स्थान पर फिसल गयीं लेकिन विचलित नहीं हुईं।

लगे रहो, कामयाबी मिलेगी

लगे रहो, कामयाबी मिलेगी

1987 में हरिद्वार लोकसभा सीट पर चुनाव हुआ तो मायावती और राम विलास पासवान ने फिर किस्मत आजमायी। मायावती फिर हार गयीं और दूसरे स्थान पर रही। पासवान तीसरे स्थान पर फिसल गये। 1988 में कांशीराम ने इलाहाबाद उपचुनाव में वीपी सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा और हार गये। कांशीराम मानते थे कि हार से ही जीत का रास्ता निकलता है। उनका भरोसा सच साबित हुआ। 1989 के लोकसभा चुनाव में मायावती बिजनौर से जीत गयीं। दो और सांसद भी जीते। कांशीराम पूर्वी दिल्ली सीट पर चौथे स्थान पर रहे थे। कांशीराम 1996 में पहली बार होशियारपुर से सांसद बने। कई हार के बाद कांशीराम और मायावती राजनीति में स्थापित हुए थे। बाद में मायावती दलितों की सबसे मजबूत नेता के रूप में उभरीं। चंद्रशेखर भी मायावती की तर्ज पर आगे बढ़ना चाहते हैं। पहले के मठाधीश नेताओं को खारिज करो। खुद को बहुजन समाज का सच्चा हितैषी बताओ। चुनाव लड़ते रहो। नतीजा कुछ भी हो ईमानदारी से डटे रहो। एक दिन बहुजन समाज जरूर समर्थन देगा।

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