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कोरोना: जेलों से 'राजनीतिक' और विचाराधीन कैदियों की रिहाई होनी चाहिए?

By BBC News हिन्दी
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जेल, विचाराधीन कैदी, कोरोना महामारी
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जेल, विचाराधीन कैदी, कोरोना महामारी
  • पहली लहर के दौरान छोड़े गए बहुत सारे कैदियों को दोबारा बंद कर दिया गया है
  • सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से पिछले साल कुल 68 हज़ार कैदियों को रिहा किया गया था
  • कोरोना की दूसरी लहर में तीन हज़ार से अधिक कैदी और कर्मचारी संक्रमित हुए हैं
  • कश्मीर में बड़ी संख्या में लोग 'एहतियातन' जेलों में बंद हैं जिनकी रिहाई की माँग पूर्व मुख्यमंत्री ने की है

बीबीसी
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"मेरी माँ पिछले पांच महीनों से तिहाड़ जेल में हैं. अप्रैल में वो कोविड पॉज़िटिव हो गईं. बहुत कोशिश के बाद भी उन्हें बेल नहीं मिली. तीन हफ्ते तक जेल में ही आइसोलेशन में रखने के बाद वो वापस अपने बैरक में आ गई हैं. आखिरी बार जब मेरी उनसे बात हुई तो उन्हें यह नहीं पता था कि वो कोरोना नेगेटिव हो चुकी हैं या नहीं."

ये बताते वक़्त अंजलि के चेहरे पर चिंता साफ़ दिख रही थी. पिछले पांच महीने में दो मुलाक़ातों और चंद आधे-अधूरे फ़ोन कॉल्स के सहारे ही वो अपनी माँ का हाल जान पाई हैं.

उनकी माँ रुक्मिणी को दिसंबर 2020 में दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने गिरफ्तार किया था और तब से ही वो दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं. रुक्मिणी को एक आर्थिक अपराध के मामले में सह-अभियुक्त के तौर पर गिरफ्तार किया गया है. दोषी पाए जाने पर उन्हें 10 साल तक की सज़ा हो सकती है.

अंजलि कहती हैं कि कोरोना महामारी की वजह से वो अपनी माँ के लिए बहुत चिंतित हैं. वे कहती हैं, "जब मुझे अप्रैल में फ़ोन आया तो सिर्फ़ इतना बताया गया कि आपकी माँ को कोविड हो गया है. यह सुनकर मैं बहुत घबरा गई. जिन्होंने कॉल किया था उनके पास ज़्यादा जानकारी नहीं थी. उन्होंने कहा कि बीमारी के कुछ लक्षण दिख रहे हैं पर वो गंभीर नहीं हैं. माँ हाई रिस्क कैटेगरी में आती हैं क्योंकि उन्हें दमा है."

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अंजलि की चिंता का कारण यह भी था कि रुक्मिणी के कोविड पॉज़िटिव होने के दो हफ्ते पहले ही से उनके फ़ोन आने बंद हो गए थे. वे कहती हैं, "उस दौरान जेल में कोरोना के मामले बढ़ गए थे और उस वजह से क़ैदियों की फ़ोन कर पाने की सुविधा बंद हो गई थी."

मार्च के महीने में रुक्मिणी ने अंजलि से कहा था कि जेल में कोविड के मामले आने शुरू हो गए हैं. वे कहती हैं, "माँ ने मुझे कहा कि इस बात का पता लगाऊँ कि कोरोना के दौरान परिवार के लोगों को क़ैदियों से कैसे मिलवाया जाएगा. उन्हें आगे आने वाली स्थिति का पूर्वाभास हो गया था."

रुक्मिणी के कोरोना पॉज़िटिव होने के बाद अंजलि ने वकीलों से बात करके कोशिश की कि उनकी माँ को मेडिकल आधार पर ज़मानत मिल जाए. यह प्रकिया तीन हफ्ते तक चली पर अदालत ने ज़मानत नहीं दी.

कोविड संक्रमित होने के बाद रुक्मिणी को जेल में ही बनाए गए आइसोलेशन वार्ड में तीन हफ्ते तक रखा गया. अंजलि कहती हैं, "आइसोलेशन में रहने के दौरान माँ का तीन बार फ़ोन आया लेकिन हर बार एक मिनट से भी कम बात हो पाई. मैं उनसे ठीक से तबीयत का हाल पूछ भी नहीं पाती थी."

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कुछ ही दिन पहले रुक्मिणी को वापस उनके बैरक में भेज दिया गया. अंजलि कहती हैं, "मैंने उनसे फ़ोन पर पूछा कि क्या वो कोविड नेगेटिव हो गई हैं. मां ने कहा कि उन्हें नहीं पता, किसी ने नहीं बताया."

अदालत के ज़रिए अंजलि को यह आश्वासन मिला है कि जेल प्रशासन उन्हें रुक्मिणी की सेहत सम्बंधित जानकारी देता रहेगा लेकिन कोरोना को लेकर बने हुए भयावह हालात के बीच अपनी माँ के जेल में होते हुए इस बेटी का चैन से बैठ पाना नामुमकिन-सा हो गया है. जेल प्रशासन के रवैये में पारदर्शिता की कमी अंजलि की चिंता बढ़ाती जा रही है.

कोरोना की दूसरी लहर के बीच देश भर की जेलों में क़ैदियों और जेल कर्मचारियों में 3,128 कोविड के मामले सामने आए हैं. इसमें से 551 मामले दिल्ली की जेलों में ही रिपोर्ट हुए हैं.

कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई) एक गैर-सरकारी संगठन है जो जेल सुधार के विषय पर राज्य सरकारों के साथ काम करता है. सीएचआरआई ने जेलों में क़ैदियों के कोविड संक्रमित होने की प्रकाशित खबरों के आधार पर एक सूची बनाई है जिससे इन आँकड़ों का खुलासा हुआ है.

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सलाखों के पीछे चर्चित चेहरे

पिछले दिनों छात्र नेता नताशा नरवाल की अंतरिम ज़मानत पर रिहाई चर्चा में रही. जेएनयू की छात्रा नताशा को उनके पिता की मौत के एक दिन बाद 10 मई को अंतरिम ज़मानत दे दी गई. ये ज़मानत उन्हें उनके पिता का अंतिम संस्कार करने के लिए दी गई. नताशा के पिता महावीर नरवाल की कोरोना वायरस की वजह से 9 मई को मौत हो गई थी.

साल 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े तथाकथित साज़िश के एक मामले में नताशा तकरीबन एक साल से जेल में बंद हैं और समय-समय पर यह माँग उठती रही है कि उन्हें और उनके जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों को कोरोना महामारी के कारण जेलों से रिहा कर दिया जाना चाहिए.

सात मई को पीडीपी अध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की कि वे बिगड़ती हुई कोविड की स्थिति के मद्देनजर जम्मू और कश्मीर की जेलों और राज्य से बाहर की जेलों में बंद सभी राजनीतिक बंदियों को तुरंत रिहा करें.

मुफ़्ती ने कहा कि सैकड़ों या शायद हज़ारों लोगों को अगस्त 2019 में गिरफ्तार करने के बाद से जेलों में बंद रखा गया है. अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने आर्टिकल 370 को ख़ारिज कर जम्मू और कश्मीर के विशेष दर्जे को ख़त्म कर दिया था और इसका विरोध करने वाले बहुत से लोगों को जेलों में डाल दिया गया था.

महबूबा मुफ़्ती ने यह भी कहा कि इनमे से ज़्यादातर लोगों को प्रिवेंटिव कानूनों के तहत हिरासत में रखा गया है और कई लोग तो ज़मानत मिलने के बाद भी जेल में ही हैं. मुफ़्ती ने जेल में बंद हुर्रियत नेता मोहम्मद अशरफ सेहराई की मौत का हवाला देते हुए कहा कि जेल में रहते हुए उन्हें कोविड संक्रमण हो गया और इलाज नहीं मिल सका जिससे उनकी मौत हो गई.

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केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन को भी उनकी गिरफ़्तारी के बाद मथुरा जेल में रहते हुए कोविड संक्रमण हो गया जिसके कारण उन्हें सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दिल्ली के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज में इलाज के लिए भर्ती करना पड़ा था.

पिछले साल कोरोना महामारी शुरू होने के कुछ महीने बाद वाम दलों ने मांग की थी कि सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा किया जाए और उन्हें पर्याप्त चिकित्सा दी जाए. ये कहा गया कि जेलों में भीड़भाड़ होने की वजह से कई सामाजिक कार्यकर्ताओं को या तो कोरोना संक्रमण हो चुका था या होने का खतरा था.

इन दलों ने गौतम नवलखा, आनंद तेलतुम्बडे, सुधा भारद्वाज और शोमा सेन जैसे कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग की थी.

इसी बीच बॉम्बे हाई कोर्ट ने फरवरी में भीमा कोरेगांव मामले के आरोपी 81 वर्षीय वरावर राव को मेडिकल आधार पर जमानत दे दी. राव को भी जेल में रहते हुए कोविड संक्रमण हो गया था. अदालत ने जेल में अपर्याप्त सुविधाओं के मद्देनज़र राव को ज़मानत दी थी.

लेकिन कोरोना काल में यह बात सिर्फ चर्चित लोगों के जेल में होने तक सीमित नहीं है. भारत की ज़्यादातर जेलें क़ैदियों से खचाखच भरी हुई हैं और कोरोना संक्रमण के कारण हज़ारों क़ैदियों की जान पर बन आई है.

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कैद में कोविड का कहर

देश में जेलों की दशा पर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) की आखिरी रिपोर्ट 2019 में प्रकाशित हुई थी. इस रिपोर्ट के अनुसार भारतीय जेलों में तब 4.78 लाख कैदी थे, जो कि कुल क्षमता से 18.5 प्रतिशत अधिक थे. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुल क़ैदियों में से 69.05 प्रतिशत क़ैदी विचाराधीन थे.

इन अंडर ट्रायल या विचाराधीन क़ैदियों में से 16 प्रतिशत क़ैदी छह महीने से एक साल का समय जेलों में बिता चुके थे. इसी तरह 13 प्रतिशत अंडर ट्रायल क़ैदी एक से 2 साल का समय जेल में बिता चुके थे. एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार देश में जेलों का ऑक्यूपेंसी रेट औसतन 118.5 प्रतिशत था.

लेकिन यह राष्ट्रीय औसत है, देश के कई हिस्सों क्षमता से दोगुना अधिक कैदी रखे गए हैं.

सीएचआरआई के अनुसार इस वक़्त तकरीबन 5 लाख क़ैदी जेलों में हैं और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की जेलों में क़ैदियों की संख्या तय सीमा से दोगुनी से भी अधिक है.

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सीएचआरआई के जेल सुधार कार्यक्रम की प्रमुख मधुरिमा धानुका कहती हैं, "जेलों में भीड़-भाड़ है और यह माना जाता है कि भीड़-भाड़ वाली जगहों में वायरस जल्दी फैलता है. तो यह साफ़ है कि जेलें एक हॉटस्पॉट हैं जहाँ पर अगर एक मामला हुआ तो तुरंत सब में फैल जाएगा."

धानुका कहती हैं कि कोरोना की पहली लहर में 18 हज़ार से अधिक क़ैदियों और जेल कर्मचारियों को संक्रमण हुआ था.

पिछले साल देश भर से जेलों में क़ैदियों के कोविड संक्रमित होने की खबरें मीडिया में प्रकाशित होती रहीं. इन्हीं ख़बरों के आधार पर सीएचआरआई ने सूची बनायी जिससे यह पता चला की 27 मई 2020 से 14 दिसंबर 2020 तक देश भर में 18157 क़ैदियों और जेल कर्मचारियों को कोविड संक्रमण हुआ.

इस संकलन के मुताबिक केवल उत्तर प्रदेश की जेलों में पिछले साल लगभग 7000 कोविड के मामले सामने आए. महराष्ट्र की जेलों में 2752 और असम की जेलों में 2496 कोविड संक्रमण के मामले सामने आए. इसी संकलन में यह भी पाया गया कि पिछले साल मई से दिसंबर तक जेलों में कोविड की वजह से 17 लोगों की मौत भी हुई.

धानुका कहती हैं कि यह संख्या केवल उन कोविड मामलों की है जो मीडिया में रिपोर्ट हुए. उनके अनुसार ये आंकड़ा इससे कहीं ज़्यादा हो सकता है.

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कोविड के चलते क़ैदियों की रिहाई

इसी खतरे की गंभीरता को पहचानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल मार्च में राज्यों को आदेश दिया था कि वे अंतरिम ज़मानत पर क़ैदियों को रिहा करके जेलों की भीड़-भाड़ घटाएं.

इस काम को करने के लिए राज्यों में हाई पावर्ड समितियों का गठन किया गया और उन्हें कुछ श्रेणियों के क़ैदियों को रिहा करने का काम सौंपा गया.

इन समितियों को यह अधिकार दिया गया कि वे कैदियों की श्रेणी निर्धारित करके उन्हें रिहा करने की सिफारिश करें. अपराध की प्रकृति, जेल की सज़ा और अपराध की गंभीरता कुछ श्रेणियां थीं जिनके तहत क़ैदियों को रिहा करने की कार्रवाई शुरू हुई और इसके चलते पिछले साल पूरे देश में 68 हज़ार से अधिक क़ैदियों को रिहा किया गया.

जहां उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 12055 क़ैदियों को रिहा किया गया, महाराष्ट्र, पंजाब, मध्य प्रदेश और राजस्थान का नंबर इसी क्रम में रहा.

धानुका कहती हैं कि उन्होंने पाया कि पिछले साल 1 अप्रैल और 30 जून के बीच जेलों में रह रहे लोगों की तादाद में तकरीबन 10 प्रतिशत की गिरावट आई.

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वे कहती हैं, "जेलों में कैदियों की तादाद कम करने करने की ये कोशिशें कामयाब तो हुईं पर यह कोशिशें अस्थायी ही थीं. जो भी क़ैदी छोड़े गए उन्हें 2020 के ख़त्म होते होते वापस बुला लिया गया तो जेलों में भीड़-भाड़ उतनी ही बढ़ गई."

तो जहाँ पिछले साल जेलों की भीड़ कुछ हद तक घट पाई थी, इस साल के शुरू होते-होते रिहा किए गए क़ैदियों के वापस जेलों में आ जाने से वो फिर से बढ़ने लगी. कोरोना की इतनी बड़ी दूसरी लहर के बारे में शायद किसी ने नहीं सोचा था.

धानुका के अनुसार कोरोना की दूसरी लहर आने के बाद से जेलों में कोरोना के 3100 से ज़्यादा मामले सामने आ चुके हैं.

अमृता पॉल भी सीएचआरआई के जेल सुधार कार्यक्रम में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी के तौर पर काम करती हैं. पॉल के अनुसार, ज़रूरी बात यह है कि सरकार ने नहीं सोचा था कि कोरोना की दूसरी लहर आ रही है और उसने न्यायिक क्षेत्र को भी सूचित नहीं किया.

वे कहती हैं, "हो सकता है कि देश ने अपने चिकित्सा ढांचे को सुदृढ़ कर लिया हो लेकिन जेलों की तैयारियां नहीं हुई हैं. लोग सोचते हैं कि क़ैदी समाज से बाहर हैं और हमें उनकी देखभाल करने की ज़रूरत नहीं है."

पॉल के अनुसार टीकाकरण रणनीति बनाते वक़्त भी क़ैदियों के बारे में नहीं सोचा गया. वे कहती हैं, "कई देशों ने टीकाकरण की योजना बनाते वक़्त ये ख़्याल रखा कि कैदियों को भी उसमे शामिल किया जाए. कई देशों में क़ैदियों को टीकाकरण का शुरुआत से हिस्सा बनाया गया."

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सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर इस मामले में हस्तक्षेप किया है. 8 मई को सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस एनवी रमन्ना की खंडपीठ ने जेलों में भीड़-भाड़ को कम करने के लिए पुलिस को गिरफ्तारियों को सीमित करने को कहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही ये भी कहा कि सात साल तक की कैद की सजा वाले मामलों में मैकेनिकल तरीके से गिरफ्तारियां न की जाएं. अदालत ने कहा है कि जिन क़ैदियों को 2020 में अंतरिम ज़मानत पर रिहा कर दिया गया था उन्हें फिर से रिहा कर दिया जाए. पिछले साल रिहा किए गए क़ैदियों में से 90 प्रतिशत इस साल फरवरी और मार्च में वापस जेलों में लौट आए थे.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जिन कैदियों को 2020 में पैरोल दी गई थी, उन्हें 90 दिनों की पैरोल पर फिर से रिहा किया जाना चाहिए ताकि जेलों के भीतर संक्रमण को नियंत्रित किया जा सके.

अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी को सीमित करने से लेकर कोविड रोगियों की देखभाल करने तक जेलों में महामारी के प्रभावी प्रबंधन की ज़रूरत है ताकि इस घातक वायरस को हराया जा सके.

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लेकिन कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जहाँ अंतरिम ज़मानत या पैरोल पर रिहा होने के योग्य होने पर भी कुछ क़ैदी इस डर से रिहा नहीं होना चाहते कि वे जेल से बहार जाकर संक्रमित हो सकते हैं. ऐसे मामलों के लिए अदालत ने कैदियों और जेल कर्मचारियों के लिए उचित चिकित्सा सुविधा, तत्काल उपचार और नियमित परीक्षण का आदेश दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को ये आदेश भी दिया है कि रिहा किए गए कैदियों को उनके घरों तक पहुँचाया जाए ताकि उन्हें किसी भी कर्फ्यू या तालाबंदी के मद्देनज़र कोई परेशानी न हो.

उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह का मानना है कि देश की जेलें आज सुपर स्प्रेडर्स बन गयी हैं और जल्द ही प्रभावी कदम उठाने की ज़रूरत है. सिंह कहते हैं, "हमारी जेलें आज सुपर स्प्रेडर्स बन गयी हैं. जेलों में कैदियों की जितनी अनुमानित संख्या है वो जेलों में उपलब्ध जगह के मुक़ाबले दोगुनी या तिगुनी से भी कहीं अधिक है. जेलों की स्थिति भयावह बनी हुई है."

वे कहते हैं कि जो लोग प्रिवेंटिव कस्टडी यानी एहतियातन कैद में हैं उन्हें तत्काल छोड़ा जा सकता है. वे कहते है, "70 साल से ऊपर, शारीरिक रूप से जो अब अपराध करने में समर्थ नहीं हैं, जो कैंसर या एड्स जैसी जानलेवा बीमारी से ग्रस्त हैं, उन्हें छोड़ा जा सकता है. कोविड का भी बड़ा संक्रमण जेलों में है और शायद ही कोई ऐसा जेल हो जहाँ कम से कम 5 प्रतिशत क़ैदी संक्रमित न हों. अगर इनको ही पैरोल दे दें तो वे अपना इलाज बहार करा सकेंगे, क्योंकि जेल में वह व्यवस्था नहीं है."

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विक्रम सिंह के अनुसार अगर केवल प्रिवेंटिव अरेस्ट और ज़मानती अपराध वाले लोगों को रिहा कर दिया जाए तो जेलों की भीड़ में 30 से 40 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है.

हरियाणा के पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (जेल) केके मिश्रा से बीबीसी ने बात की. वे कहते हैं, "जेलों में बंद अधिकतर लोग अंडर ट्रायल होते हैं. हरियाणा का ही उदहारण लें तो सज़ायाफ़्ता दोषियों की संख्या लगभग 20 प्रतिशत है, बाकी 80 प्रतिशत अंडर ट्रायल ही हैं और अंडर ट्रायल लोगों में भी अधिकतर लोग छोटे-मोटे अपराधों के लिए जेलों में बंद हैं. इनमें से एक बड़ी संख्या के लोगों को बेल पर छोड़ने में किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती. एक नीतिगत निर्णय लेकर इन लोगों को रिहा कर देना चाहिए."

मिश्रा का कहना है कि जिन अपराधों के लिए सज़ा का प्रावधान 5 साल से कम है, ऐसे अपराधों के लिए जेल में बंद लोगों को तुरंत बेल पर रिहा कर देना चाहिए. वे कहते हैं, "ऐसा करने से जेलों में लगी भीड़ आधी हो जाएगी. राज्य सरकारों के पास शक्तियां हैं कि वे अपने स्तर पर ये फैसला ले सकती हैं."

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English summary
demand to release agitators and human rights activists from jail after Kerala journalist Siddique found covid positive
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