• search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

दिल्ली चुनाव : JNU के शेर आखिर चुनावी मैदान में क्यों हो जाते हैं ढेर ?

|

नई दिल्ली। दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय देश में वामपंथियों का सबसे मजबूत किला बन गया है। यहां के छात्र मुद्दा गढ़ते हैं, उससे खेलते हैं फिर सीपीएम , सीपीआइ के नेता उसे लपक कर देशभर में राजनीति चमकाते हैं। जो काम केरल कीवामपंथी सरकार नहीं कर पाती वो जेएनयू का छात्र संगठन चुटकियों में कर लेता है। यहां बवाल का बवंडर ऐसे उठता है कि उसके लेपेटे में पूरा देश आ जाता है। ऐसे में तो दिल्ली में वामपंथियों का दबदबा होना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं है। जेएनयू के होनहार क्रांतिकारियों के रहते हुए भी दिल्ली विधानसभा के चुनाव में आज तक सीपीआइ या सीपीएम का खाता भी नहीं खुल सका। कैंपस के सहारे राजनीति करने वाले येचुरी, करात या राजा जैसे नेता दिल्ली में अपनी पार्टी की मौजूदगी भी नहीं दर्ज करा सके। जेएनयू में समां बांधने वाले दल दिल्ली में जीरो हैं। जनता इनके बारे में सोचती तक नहीं। सीपीआइ इसी बात में मस्त हैं कि चलो हम न सही, भाजपा को जवाब देने के लिए केजरीवाल तो हैं न।

1993 के चुनाव में एक फीसदी भी वोट नहीं

1993 के चुनाव में एक फीसदी भी वोट नहीं

1993 में दिल्ली के पहले विधानसभा चुनाव में सीपीआइ और सीपीएम ने किस्मत आजमायी थी। लेकिन दोनों को एक पीसदी से भी कम वोट मिले। सीपीएम को 0.38 तो सीपीआइ को 0.21 फीसदी वोट मिले थे। दोनों ही दलों के बड़े नेता दिल्ली में ही रहते हैं, इनको खाद-पानी देने वाले लेफ्ट इंटेलेक्चुअल भी दिल्ली में ही रहते हैं । लेकिन इसके बाद भी ये शर्मनाक प्रदर्शन हैरान करने वाला है। यहां गौर करने वाली बात ये है कि उस समय बसपा जैसी नयी नवेली पार्टी ने 1.88 फीसदी वोट हासिल कर वामपंथी दलों को पछाड़ दिया था। दिल्ली की पढ़ी-लिखी जनता ने सीपीआइ, सीपीएम को पहले ही चुनाव में खारिज कर दिया था।

दूसरे विधानसभा चुनाव में भी दुर्गति

दूसरे विधानसभा चुनाव में भी दुर्गति

1998 के दूसरे विधानसभा चुनाव में भी वाम दलों की दुर्गति हो गयी। एक बानगी से इस बात को समझा जा सकता है। गोल मार्केट विधानसभा सीट पर कांग्रेस से सीएम पद की उम्मीदवार शीला दीक्षित चुनाव लड़ रही थीं। उनका मुकाबला भाजपा के मौजूदा विधायक कीर्ति आजाद से था। इस सीट पर सीपीआइ ने एम एम गोप को खड़ा किया था। शीला दीक्षित ने बड़े मार्जिन से इस चुनाव को जीता था जब कि एमएम गोप को केवल 831 वोट ही मिले थे। जेएनयू कैंपस में दहाड़ने वाले शेर चुनावी मैदान में कागजी साबित हुए थे। सीपीआइ या सीपीएम का प्रभाव दिनों दिन घट रहा है। पश्चिम बंगाल का किला कब का ढह गया। त्रिपुरा भी हाथ से निकल गया। एक केरल ही बचा है जहां साम्यवाद का दीया टिमटिमा रहा है। साम्यवादी अपने वजूद को जिंदा रखने के लिए अब जेएनयू पर निर्भर हो गये हैं। उनका मकसद है यहां हंगामा होगा तो पूरे देश में उनकी चर्चा होगी। चर्चा हो भी रही है। लेकिन इससे वोट नहीं मिलता।

2015 का एक दृश्य

2015 का एक दृश्य

सीपीएम का दफ्तर दिल्ली के गोल मार्केट में है। 2015 के विधानसभा चुनाव में एक मतगणना केन्द्र सीपीएम दफ्तर के पास ही बना था। इस चुनाव में सीपीएम ने आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया था। मतलब वह खुद चुनाव में खड़ा नहीं हुई थी। काउंटिंग सेंटर के आगे आप के सैकड़ों कार्यकर्ता हाथ में पोस्टर बैनर लिये जमा थे। जैसे-जैसे रुझान मिलते गये आप समर्थकों का उत्साह बढ़ते गया। उस दिन सीपीएम दफ्तर में भी खूब चहल पहल थी। सीपीएम के नेता दफ्तर बाहर निकलते और आप के कार्यकर्ताओं के जोश को देख इस तरह खुश होते जैसे उनकी अपनी जीत हो रही हो। रुझान जब प्रचंड जीत में बदलने लगे तो सीपीएम के नेता आप के लोगों को बधाई देने लगे। वे इस बात से खुश थे कि केजरीवाल ने उनके दुश्मन भाजपा को हरा दिया। उन्होंने ये सोचने की जहमत भी नहीं उठायी कि सिर्फ दो साल पुरानी पार्टी आप ने कैसे ये करिश्मा कैसे कर दिया ? 95 साल पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी आखिर क्यों दिल्ली में चुनाव लड़ने के काबिल भी न रही ? नाकारात्मक राजनीति से सीपीएम को क्या हासिल हुआ ? उसका वजूद खत्म होने के कगार पर है और वह भाजपा की चिंता में दुबली हो रही है। दिल्ली में दमदार हंगामा करने वाले वामपंथी आखिर वहां के विधानसभा चुनाव में क्यों घुटनों के बल बैठे हैं ?

जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
delhi assembly elections 2020: why left parties not have a strong impact in delhi
For Daily Alerts
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more