दाऊद इब्राहिम का 'हैदराबाद गुटका प्रोजेक्ट', कैसे सज़ा हुई भारतीय बिजनेसमैन को

मुंबई में संगठित अपराध और बिज़नेस के नज़दीकी रिश्तों की बात पुरानी है. ऐसे ही एक चर्चित मामले में इस महीने एक अहम फ़ैसला आया है.

ये कहानी है गुटका बनाने वाली कंपनियों के मालिकों जगदीश प्रसाद मोहनलाल (जेएम) जोशी और रसिकलाल माणिकचंद धारीवाल के झगड़े की.

जाँच एजेंसी का कहना है कि दोनों के झगड़े में माफ़िया डॉन इब्राहिम ने अहम भूमिका निभाई और दाऊद के रिश्तेदारों की गवाही और दूसरे सबूतों के आधार पर जेएम जोशी को दस साल के कारावास की सज़ा सुनाई गई है.

मुंबई की एक विशेष अदालत ने जेएम जोशी को 10 साल की सज़ा सुनाई जबकि धारीवाल की मौत 2017 में हो चुकी है. इसके अलावा दो और लोगों को भी आईपीसी और मकोका की धाराओं के अंतर्गत 10-10 साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई है.

विशेष अदालत ने 242 पन्नों के अपने आदेश में कहा कि सुबूत दिखाते हैं कि जोशी और धारीवाल ने अपने झगड़े को खत्म करने के लिए अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद और उसके भाई अनीस इब्राहिम ने मध्यस्थता की, दोनों ने झगड़ा सुलझाने के बदले पैसे लिए.

इसके अलावा जेएम जोशी ने दाऊद इब्राहिम को पाकिस्तान के हैदराबाद में गुटका फ़ैक्ट्री की शुरुआत करने में मदद की और संगठित अपराध के लिए स्थाई आमदनी का ज़रिया मुहैया करवाया. जेएम जोशी के वकील सुदीप पसबोला ने कहा कि उन्हें फ़ैसला मान्य नहीं है और इस मामले में आदेश के खिलाफ़ हाईकोर्ट में अपील फाइल की जाएगी.

इस मामले में सरकारी वकील प्रदीप घरात के मुताबिक, ये आदेश बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि इससे मुंबई में अंडरवर्ल्ड का असर कम होगा, हालांकि "इस आदेश से और जिस तरह से पुलिस ने कदम उठाए हैं, उससे ये संदेश जाएगा कि अपराध पर रोक लग सकती है."

घरात के मुताबिक ये केस 2001 में रजिस्टर हुआ था और सीबीआई ने 2004 में जांच शुरू की.

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कंपनी में हिस्सेदारी का झगड़ा

गुटका
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लेकिन ये सब कैसे हुआ? आखिर जोशी और धारीवाल के बीच झगड़ा किस बात को लेकर था? इस कहानी में दाऊद इब्राहिम और भाई अनीस इब्राहिम की एंट्री कैसे हुई? और पाकिस्तान में गुटका फ़ैक्ट्री की शुरुआत का क्या माजरा है, और इसमें जेएम जोशी और धारीवाल कहां फिट होते हैं?

अभियोग पक्ष के मुताबिक, एक वक्त था जब जेएम जोशी और रसिकलाल माणिकचंद धारीवाल साल 1988 से एक ही कंपनी धारीवाल टोबैको प्रोडक्ट्स लिमिटेड का हिस्सा थे. जेएम जोशी कंपनी में डायरेक्टर थे और विभिन्न फ़्लेवरों को मिक्स करने में माहिर थे.

अदालती दस्तावेज़ों के मुताबिक शुरुआत में जेएम जोशी को अपने काम का मेहनताना मिलता था लेकिन उनका कहना है कि बाद में रसिकलाल माणिकचंद धारीवाल की ओर से उनसे वायदा किया गया कि उन्हें कंपनी का 10 प्रतिशत शेयर दिया जाएगा. बाद में ये 10 प्रतिशत शेयर का वायदा बढ़ाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया लेकिन ये वायदा पूरा नहीं किया गया.

दस्तावेज़ों के मुताबिक जेएम जोशी ने करीब 259 करोड़ रुपए पर अपना हक़ जताया और कहा कि कई कोशिशों के बाद उन्हें यह रक़म नहीं मिली. इसके बाद जेएम जोशी ने साल 1996 में कंपनी छोड़ दी.

अदालत के मुताबिक सुबूत साफ़ इशारा करते हैं कि धारीवाल के संबंध दाऊद इब्राहिम की एक फ्रंट कंपनी गोल्डन बॉक्स ट्रेडिंग कंपनी के साथ थे, और इस कंपनी का मालिक दाऊद इब्राहिम का रिश्तेदार था.

अभियोग पक्ष के मुताबिक अगस्त 1999 में जेएम जोशी को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) स्थित गोल्डन बॉक्स के दफ़्तर बुलाया गया जहाँ जोशी से कहा गया कि वो धारीवाल टोबैको लिमिटेड में उनके सभी शेयर को वापस कर दें और ज़्यादा शेयर न मांगें.

दस्तावेज़ों के मुताबिक अनीस इब्राहिम ने जेएम जोशी को धमकाया, थप्पड़ मारा और धारीवाल के साथ सहयोग करने को कहा.

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दाऊद इब्राहिम की मध्यस्थता

1998 के बॉम्बे की एक तस्वीर
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1998 के बॉम्बे की एक तस्वीर

अभियोजन पक्ष के मुताबिक इसके बाद जेएम जोशी ने अनीस इब्राहिम तक अपना पक्ष पहुंचाने के लिए अनीस के एक रिश्तेदार के बचपन के दोस्त से संपर्क किया. अभियोजन पक्ष के मुताबिक सितंबर 1999 को दुबई की बैठक में जेएम जोशी ने अपनी कहानी सुनाई कि कैसे जोशी को उनका हिस्सा नहीं दिया गया.

आखिरकार कराची में दाऊद इब्राहिम के दखल के बाद मामला सुलझा और जेएम जोशी को 259 करोड़ रुपए की जगह मात्र 11 करोड़ रुपए से ही संतोष करना पड़ा. लेकिन बात यहां नहीं रुकी.

अदालती दस्तावेज़ के मुताबिक़, जेएम जोशी ने दाऊद इब्राहिम और अनीस इब्राहिम के संगठित अपराध को तकनीकी, आर्थिक मदद दी और पाकिस्तान के हैदराबाद शहर में गुटका फ़ैक्ट्रियों की स्थापना में मदद की, जिसने दोनो को स्थाई आमदनी का ज़रिया मिला.

दस्तावेज़ों में बिना नाम दिए गए एक व्यक्ति (प्रोसेक्यूशन विटनेस 32/ अभियोग पक्ष के गवाह 32) का ज़िक्र है जिन्हें जुलाई साल 2000 में बैंकॉक में काम करने के बहाने दुबई के रास्ते कराची भेजा गया, जिसके बाद उन्हें सिंध प्रांत की राजधानी हैदराबाद ले जाया गया गया. गुटका फ़ैक्ट्री की शुरुआत करने के लिए भेजे गए इस व्यक्ति को हैदराबाद में एक सर्वेंट क्वार्टर में रखा गया और उन्हें अपने परिवार से बात करने की मनाही थी.

एक वक्त जेएम जोशी की कंपनी में काम करने वाले अभियोजन पक्ष के इस गवाह के मुताबिक, जब वो परिवार से मिलने भारत आते थे तो उन्हें धमकी दी जाती थी कि अगर वो पाकिस्तान वापस नहीं आए तो भारत में ही उनका एनकाउंटर करवा दिया जाएगा.

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गुटका पैक करने की मशीन भेजी

सरकारी वकील प्रदीप घरात
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सरकारी वकील प्रदीप घरात

पाकिस्तान में गुटका फ़ैक्ट्री की शुरुआत के इसी प्लान के अंतर्गत भारत से दो लाख 64 हज़ार की लागत वाली पांच गुटका पाउच पैकिंग मशीनों को दुबई के रास्ते पाकिस्तान भेजा गया.

अदालती आदेश में इस गवाह के पाकिस्तान में बिताए गए वक्त का ज़िक्र है. आदेश के मुताबिक वो 16 मार्च 2006 को भारत आए और तभी से अपने घर में रह रहे हैं लेकिन सुरक्षा कारणों से उनका नाम ज़ाहिर नहीं किया जा रहा है.

दस्तावेज़ के मुताबिक, इस गवाह के पास पाकिस्तान जाने का, वहां रहने का कोई कागज़ी सुबूत नहीं था, उनके पासपोर्ट पर पाकिस्तान जाने का या वहां से आने का कोई स्टैंप नहीं था. इस गवाह के मुताबिक जब वो पाकिस्तान जाते थे तो उनका टिकट और पासपोर्ट ले लिया जाता था और वहां से जाते वक्त उसे वापस दे दिया जाता था.

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आम तौर पर किसी को फ़ैक्ट्री की शुरुआत करने में मदद करना अपराध नहीं है लेकिन इस मामले में ये जानते-बूझते कि दाऊद इब्राहिम और अनीस इब्राहिम "ग्लोबल टेररिस्ट" हैं, दोनो व्यक्तियों की गुटका फ़ैक्ट्री की शुरुआत करने में मदद की गई और गुटके के उत्पादन का फ़ार्मूला उपलब्ध करवाया गया.

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जेएम जोशी का पक्ष

जेएम जोशी
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जेएम जोशी

अदालत के दस्तावेज़ों के मुताबिक, जेएम जोशी के वकील सुदीप पसबोला ने कहा कि उनका संगठित अपराध से कोई ताल्लुक नहीं है और दरअसल उन्हें धमकी दी गई कि वो कंपनी में अपने शेयर वापस कर दें और ज़्यादा शेयर की मांग न करें.

उनका कहना था कि अभियोजन पक्ष की इस दलील को अगर मान भी लिया जाए कि उन्होंने 259 करोड़ रुपए की जगह मात्र 11 करोड़ रुपए लिए, इससे यही इशारा मिलता है कि उन्होंने ऐसा अपनी मर्ज़ी से नहीं बल्कि धमकी और ज़बरदस्त दबाव के नतीजे में किया.

उनके मुताबिक ये कहना कि जेएम जोशी को हैदराबाद में गुटका फ़ैक्ट्री की शुरुआत करने के लिए ज़िम्मेदार नहीं माना जा सकता, ऐसा उन्होंने किसी दबाव में आकर किया, ऐसा माना जाना चाहिए कि उनसे ज़बरदस्ती ये काम करवाया गया.

पसबोला के मुताबिक जेएम जोशी परिस्थितियों का शिकार रहे और अनीस इब्राहिम की धमकियों की वजह से संगठित अपराथ के संपर्क में आए, और जेएम जोशी ने ऐसा अपनी जान बचाने के लिए किया.

अदालती दस्तावेज़ में वो कहते हैं, "जेएम जोशी एक इज़्ज़तदार बिज़नेसमैन हैं, उनकी कई इंडस्ट्री हैं, उन्होंने कई सौ लोगों को नौकरी दी है. अपने निर्यात के व्यापार से मूल्यवान विदेशी मुद्रा कमाई है."

सुदीप पसबोला ने अभियोग पक्ष के गवाह-32 पर भी सवाल उठाए, कहा कि उन्हें जाँच एजेंसियों ने कथित तौर पर बयान रटाया, उनके आने-जाने पर रोक नहीं थी, वो भारत से दुबई छह बार गए. उनके रिश्तेदार दुबई में हैं, इसलिए उनका कहना कि उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध हैदराबाद पाकिस्तान में कैद करके रखा गया, ये बिल्कुल विश्वास के लायक नहीं है.

वकील सुदीप पसबोला ने कहा कि ये व्यक्ति बिना वीज़ा के मुंबई हवाई अड्डे से कराची नहीं जा सकता था.

जेएम जोशी और धारीवालदो बार पाकिस्तान गए

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अदालत के आदेश पर पब्लिक प्रॉसेक्यूटर प्रदीप घरात कहते हैं, "जब आप किसी देश में रहते हैं, तो आपको सरकार पर विश्वास होना चाहिए. अगर आपको लगता है कि आपके जीवन को खतरा है, आप पुलिस के पास शिकायत दर्ज कीजिए. कानून इस बात की इजाज़त नहीं देता कि अगर आपके जान को खतरा है, तो आप हथियार रखिए."

वो कहते हैं, "जेएम जोशी और धारीवाल दो-दो बार पाकिस्तान गए. वो फ़ैक्ट्री के उद्घाटन के लिए मौजूद थे."

प्रदीप घरात के मुताबिक जेएम जोशी ने फ़ैक्ट्री के मशीनों की स्थापना से लेकर, स्टाफ़ की ट्रेनिंग, कच्चा माल उपलब्ध करवाने और गुटका का फॉर्मूला देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

पब्लिक प्रॉसेक्यूटर प्रदीप घरात के मुताबिक उन्हें अभी अपील की कॉपी नहीं मिली है, और अगर उच्च न्यायालय उनकी अपील स्वीकार लेती है तो जेएम जोशी ज़मानत के लिए अप्लाई कर सकते हैं.

अपने आदेश में अदालत ने एक जगह कहा कि इस मामले में ये महत्वपूर्ण है कि क्या संगठित अपराध के ग़ैर-कानूनी काम को बढ़ावा दिया गया या नहीं.

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