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दरभंगा: 300 तलाबों का शहर पानी के लिए क्यों तरस रहा था?

By प्रदीप कुमार

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बीते चार महीनों से जिस जल संकट के चलते दरभंगा और आसपास के जिले के लोगों का जन जीवन अस्त व्यस्त हो रखा था, वह संकट अब दूर हो चुका है. बूंद बूंद पानी को तरस रहे लोगों के सामने अब बाढ़ की चुनौती सामने है.

लेकिन महज एक सप्ताह पहले दरभंगा भीषण जल संकट के दौर से गुजर रहा था. बीते चार महीनों से दरभंगा के लोग पानी के लिए तरस रहे थे.

इस दौरान आम चुनाव की सरगर्मियां भी देखने को मिलीं, लेकिन दरभंगा में पानी की किल्लत कोई चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया.

चुनाव किसी उत्सव की भांति ही हुआ और भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार गोपाल ठाकुर एक बड़ी जीत हासिल करने में कामयाब रहे. शहर में उनके चुनावी प्रचार का केंद्र रहा दरभंगा का वीआईपी माना जाने वाला बलभद्रपुर.

इसी बलभद्रपुर में एक चापाकल के पास भरी दोपहरिया में पानी के लिए कुछ लोग जमा थे, इसकी वजह यह थी कि यह इंडियन मार्का चापाकल था और उसमें पानी आ रहा था.

कैमरे और माइक को देखती हुई कई महिलाएं भी घरों से बाहर निकल आईं और बताने लगीं कि पानी के लिए तरस रहे हैं और काम चलाने जितने पानी के लिए उन्हें घंटों टैंकरों के सामने संघर्ष करना पड़ रहा है.

यह दरभंगा के शहरी हिस्से के करीब हर कोने की तस्वीर थी. इसकी सबसे बड़ी वजह इलाके में भूजल के स्तर का अचानक से गिर जाना था.

जून महीने में दरभंगा के शहरी इलाकों में करीब 75 फीसदी घरों के चपाकल पानी नहीं दे रहे थे. कुछ चपाकलों में सुबह सुबह पानी जरूर रहा करता था जो दिन चढ़ने के साथ ही सूखने लगता था.

दरभंगा के लहेरियासराय स्टेशन के समीप बहादुरपुर मोहल्ले के मदन मोहन बताते हैं, "पांच सौ घरों के बीच एक ही चापाकल काम कर रहा है. पानी की विकट समस्या है."

यह चापाकल भी जिला प्रशासन की ओर खुदवाया गया इंडियन मार्का चापाकल है और एक चपाकल से आस पास के करीब पांच सौ परिवारों का गुजारा जैसे तैसे हो पाया.

दरभंगा नगर निगम के मुताबिक इंडियन मार्का -2 के करीब 720 चापाकल दरभंग के शहरी इलाकों में लगाए गए हैं. ऐसे एक चापाकल लगाने में सरकार करीब 50 हज़ार रुपये ख़र्च कर रही है.

जाहिर है दरभंगा शहर की तीन लाख आबादी के लिए इतने चापाकल पूरे नहीं हैं और पूरे जिले की आबादी तो 35 लाख से ज्यादा है. ग्रामीण इलाकों में भी पानी का संकट ऐसा ही था, हालांकि बारिश और आस पड़ोस में आयी बाढ़ के बाद स्थिति में काफी सुधार हुआ है.

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लेकिन इस सुधार से पहले सैकड़ों की संख्या में लोगों ने अपने अपने घरों पर समरसबिल पंप लगवाने पड़े. समरसबिल पंप लगाने के लिए तीन सौ फीट से ज्यादा की खुदाई करना पड़ता है और इस पंप को लगाने का औसत ख़र्च भी करीब एक लाख रुपये बैठता है.

बलभद्रपुर के निवासी वसीम अहमद काजमी बताते हैं, "हमारे चापाकल में पानी आ नहीं रहा था और टैंकरों के सामने घंटो खड़े रहना पड़ता था. आख़िरकार जैसे तैसे पैसों का इंतजाम करके 90 हज़ार रुपये में समरसिबल पंप लगवाया है, तब राहत मिली है."

दरभंगा के मशहूर कुशेश्वरस्थान में है घर है हृदय नारायण चौधरी का. चौधरी गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हैं और उनके काका (पिता के भाई) गिरीश्वर चौधरी बिहार के इकलौते ऐसे शख्स थे जो गांधी के दांडी यात्रा में उनके साथ चले थे.

हृदय नारायण चौधरी दरभंगा और आसपास के जिलों में नदियों को बचाने का अभियान चला रहे हैं. वे बताते हैं, "हमारे यहां तो 30 फीट नीचे कुओं में पानी मिल जाता था. नदी तलाबों में हम नहा लेते थे. आज स्थिति ये हो गई कि पत्नी एक दिन टैंकर से पानी लाते हुए गिर गई तो कर्जा लेकर समरसिबल पंप गड़वाया है. 80 हज़ार रुपये का ख़र्चा आया है."

समरसिबल पंप एक तरफ तो सुविधासंपन्न लोग लगा रहे हैं, लेकिन इससे नुकसान आस पड़ोस में रह रहे गरीबों को उठाना पड़ रहा है. समरसिबल पंप लगाए जाने के बाद आस पास के घरों के चापाकल का पानी आना बंद हो जाता है.

कैसे गहराया संकट

वैसे तो दरभंगा में जल संकट मार्च के बाद से ही गहराने लगा था. इसकी सबसे बड़ी वजह पिछले साल बारिश में हुई कमी मानी जा रही है. पिछले साल यानी 2018 में दरभंगा में औसत से 40-45 फीसदी कम बारिश हुई थी. लेकिन लोगों को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि आने वाले दिनों में पानी का संकट इतना बढ़ जाएगा.

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दरभंगा के जिला विकास आयुक्त कारी प्रसाद महतो कहते हैं, "दरभंगा में जल संकट की तीन प्रमुख वजहें हैं- बीते कुछ सालों से लगातार वर्षा कम हो रही है, हमारे जल स्रोत भी तेजी से सूखते जा रहे हैं, कहीं उसको भर लिया गया है तो कई जगहों पर उसका अतिक्रमण किया जा रहा है. इसके अलावा घरों में भी इस्तेमाल होने वाला पानी नालियों में बहकर बर्बाद हो रहा है, वह जमीन के नीचे तक नहीं पहुंचता है."

दरभंगा नगर निगम आयुक्त रवींद्रनाथ बताते हैं, "दरभंगा में बारिश के जल संचयन को लेकर जागरूकता का नितांत अभाव है, सरकार 2014 के बाद से कोशिश कर रही है कि रेन हार्वेस्टिंग की दिशा में प्रगति हो लेकिन वह नहीं हो रही है."

इत्तेफाक़ यह है कि जिले के जिलाधिकारी त्यागराजन एसएम भी इसी दौरान जिले में पदस्थापित हुए हैं. कह सकते हैं कि उनके लिए स्थिति सिर मुंडाते ही ओले पड़ने जैसी है, लेकिन 34 साल के त्यागराजन समस्या की गंभीरता को युद्धस्तर पर निपटने की कोशिश की.

उन्होंने ज्यादा संकट झेल रहे इलाकों में टैंकर और नल के जरिए पानी भेजने के लिए एक कंट्रोल रूम बनाकर उसकी खुद ही मानिटरिंग शुरू की. उनकी इस कोशिश की तारीफ़ ज़िले के आम लोग खूब कर रहे हैं.

त्यागराजन इससे पहले राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालांदा में नल जल योजना को सुचारू रूप से संचालित कर चुके हैं, लिहाजा उन्होंने इस काम को यहां भी युद्ध स्तर पर कराने की कोशिश की है, हालांकि अब उनके सामने जिले के अलग अलग हिस्सों में होने वाले जल जमाव को हटाने की भी हो गई है.

यह भी संयोग है कि राज्य के जल संसाधन मंत्रालय का ज़िम्मा दरभंगा क्षेत्र से ही आने वाले जनता दल यूनाइटेड के नेता संजय झा के जिम्मे है.

वे अपने इलाके में पानी के संकट को लोगों की आदतों से जोड़कर भी देखते हैं. वे कहते हैं, "किसने सोचा होगा कि हमेशा पानी से लबालब रहने वाले दरभंगा में लोग पानी के लिए तरसेंगे. हम लोगों ने मनमाने ढंग से पानी को बर्बाद किया है, अब हमें उसको सही ढंग से इस्तेमाल का तरीका सीखना होगा."

त्यागराजन यह मानते हैं कि मौजूदा समस्या का स्थायी हल भूजल का स्तर बढ़ाना ही है और इसके लिए कोशिश की जा रही है. उन्होंने बताया कि कई जगहों पर तलाब और नहर की खुदाई की जा रही है. इसके तहत अहिल्याबाई तलाब का जीर्णोद्वार कराया गया है.

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त्यागराजन के मुताबिक, "ज़िले में 217 तलाब हैं, जिनकी नापी कराई जा रही है, 26 तलाबों का अब तक नापी कराई गई है, इनमें पांच तलाबों में अतिक्रमण पाया है और अतिक्रमण करने वालों को नोटिस भेजा गया है."

दरभंगा का इतिहास

ऐतिहासिक तौर पर दरभंगा तलाबों, नदियों और नालों का शहर रहा है. पश्चिम में बागमती और पूर्व और उत्तर में कमला नदी के बीच में बसा है दरभंगा शहर, जिसके शहर के तौर पर स्थापित होने का प्रमाण 1150 ईस्वी में मिलता है.

तिरहुत के राजा गंगदेव सिंह के समय में इस शहर के निर्माण हुआ था. पौराणिक रूप से त्रेता युग में राम के मिथिला यात्रा में दरभंगा में उनके रात्रि विश्राम करने का उल्लेख भी मिलता है.

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लेकिन 12वीं सदी से लेकर 19वीं सदी तक बागमती और कमला नदी के बीचों बीच बसा दरभंगा, बिहार का एक प्रमुख राजनीतिक केंद्र बना रहा.

मिथिलांचल के इलाके को अगर भू विज्ञान की नजर से देखें तो यह हिस्सा ऐसा है जहां हिमालय से उतरने वाली कई नदियां सीधे उतरती है और फिर मैदान हिस्सों में सरपट भागती हुई आगे बढ़ती हैं.

ऐसे तिरहुत का यह इलाका डूबने और तैरने वाले लोगों का समाज था, जो नदियों के साथ रहने और जीने की कला सीख चुका था.

मौजूदा समय में उत्तर बिहार में आई बाढ़ को जिस तरह से आपदा बताया जा रहा है, वह यह भी बताता है कि हमारे योजनाकारों का स्वभाव, प्रकृति के नियमों को बदलने में ज्यादा विश्वास रखने वाला हो गया है.

एक समय था जब इस जिले में 15 से भी ज्यादा नदियां बहा करती थीं.

इन नदियों के नाम थे- जीबछ, बकिया, जमबाड़ी, नून, कदाना, व्या, खिरौदी, लकंडी, करेह, धमड़ा, जमुनी, कमला, बलान, बागमती, गंडक, कोसी, गंगा, कल्याणी, परावना, तिलयुगा.

इन नामों को देखें तो इनमें किसी के नाम में दुख या पीड़ा का बोध होने वाला पर्यायवाची शब्द नहीं मिलेगा. आज जिन नदियों को आपदा के तौर पर देखा जाता है उन्हें प्राचीन समाज आभूषणों के तौर पर देखता रहा था.

दरअसल, उत्तर बिहार की नदियां हिमालय से उतरते समय इधर-उधर सीदी बहने के बदले आड़ी-तिरछी गोल आकार में क्षेत्र को बांधती हुई चलती हैं, गांवों को लपेटती है और उन गांवों का आभूषणों से श्रृंगार किया करती है. प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र कहा करते थे कि उत्तरी बिहार के गांव नदियों के आभूषणों से ऐसे सजे हुए हैं कि बिना पैर धोए आप इन गांवों में प्रवेश नहीं कर सकते.

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खिरौदी नामक नदी का नामकरण ही क्षीर अर्थात दूध से हुआ है यानी इस नदी का पानी इतना साफ़ था.

लेकिन अब ये नदियां आपको दरभंगा में दिखाई नहीं देती हैं, क्योंकि बाढ़ की आशंका के चलते दरभंगा से पहले ही नदियों के पानी को रोक दिया गया है. कमला और बागमती की नदियों के पानी को भी बाढ़ की आशंका के चलते दरभंगा से पहले बांध के जरिए रोक दिया गया है, जिसके चलते इन नदियों के जल दरभंगा में निकलने वाले दूसरे चौर, आहर, पाइन जैसे परंपरागत स्रोत भी सूख गए हैं जिसका असर भूजल स्तर पर पड़ा है.

तलाबों पर संकट

दरभंगा में हर कस्बे में एक तलाब हुआ करता था. लेकिन इसकी संख्या लगातार कम होती गई. जिले में तालाब बचाओ अभियान समिति चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता नारायण चौधरी बताते हैं, "ज़िला गजेटियर 1964 के मुताबिक ज़िले में 350 से 400 तलाबों का जिक्र है. 300 से इनकी संख्या कम होते होते कागजों में 200 तक रह गई है, जबकि हकीकत में ज़िले में 100 तलाब ही रह गए हैं."

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राज्य के जल संसाधन मंत्री संजय झा, "बहुत सारे तलाब को भर लिया गया है, एक-एक गांव में 10-15 तलाब थे. लेकिन अब वे कम होते जा रहे हैं जो हैं उनकी देखभाल नहीं हो रही है. बेहद डरावनी स्थिति है."

हालांकि दरभंगा के जिलाधिकारी एम त्यागराजन बताते हैं कि जिला प्रशासन के पास 217 तलाबों के रिकॉर्ड मौजूद हैं. हर तलाब की मापी हो रही है और अतिक्रमण करने वालों को हम लगातार नोटिस भेज रहे हैं, कार्रवाई कर रहे हैं.

हालांकि ऐसा कर पाने के लिए राज्य प्रशासन कितनी इच्छाशक्ति दिखाती है, ये सवाल बना हुआ है. तलाब भरने की एक समस्या की ओर इशारा करते हुए नारायण चौधरी बताते हैं, "असल में है क्या कि दरभंगा में ट्रेड कामर्स है नहीं, इंडस्ट्री है नहीं. ऐसे में भ्रष्ट नौकरशाह और नेता आपस में मिलकर एक तलाब भर लेते हैं और यह चार-पांच करोड़ का बिजनेस हो जाता है, सबमें पैसा बंट जाता है."

ऐसा भी नहीं है कि दरभंगा के तलाबों को लेकर एकदम चुप्पी व्याप्त रही है, पिछले कुछ सालों में कुछ तलाबों को भर लिए जाने के मामले स्थानीय तौर पर सुर्खियां भी बटोरते रहे हैं, लोगों की हत्याएं तक हो चुकी हैं लेकिन ज्यादातर मामलों में कुछ होता नहीं है.

तलाबों का अतिक्रमण और उसको भरा जाना ही एकलौता संकट नहीं है, जो तलाब मौजूद हैं, उनकी उड़ाही भी सालों से नहीं हो सकी है. जिसके चलते तलाब का तल, कूड़ा कचरा तलछट आदि से जम चुका है. जिसके चलते तलाबों का पानी भी सड़ने लगा है.

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विद्यानाथ झा बताते हैं, "तलाबों के पानी सड़ने से तलाबों के जीवों का जीवन भी नष्ट होता जा रहा है. एक समय दरभंगा में अलग अलग तरह के एक सौ से ज्यादा प्रजाति की मछलियां पाई जाती थीं. आज दरभंगा के तलाबों में इतना प्रदूषण है कि मछलियां मर जाती है."

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यह संकट अकेले दरभंगा का भी नहीं है. बिहार सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 1990 की शुरुआत तक बिहार में 2,50,000 तलाब हुआ करते थे लेकिन इनमें अब महज 93,000 तलाब बचे हैं.

उधर जुलाई महीने के पहले सप्ताह में सूखा एवं जल संकट के समाधान के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने घोषणा की है कि प्रदेश के सभी तलाबों और कुओं के अतिक्रमण मुक्त कराने का निर्देश दिया है. उन्होंने कहा कि पताल से भी खोजकर निकाल लेंगे सारे तलाब.

लेकिन पटना से लेकर दरभंगा तक जिन तलाबों पर अवैध निर्माण की विशाल इमारतें खड़ी हो चुकी हैं, उन तलाबों को कैसे निकाल पाएगी सरकार, ये सवाल बना हुआ है. दरभंगा के तलाबों पर कब्जे के कई मामलों में ज़िले में राजनतीति की संलिप्ता भी बताई जाती है.

दरभंगा शहरी क्षेत्र के विधायक संजय सरावगी कहते हैं, "दरअसल यह प्रशासन की इच्छाशक्ति का मामला है, अगर प्रशासन सख्ती बरते तो तलाबों का अतिक्रमण नहीं हो सकता है. हमलोग विधायिका में हैं, यह अतिक्रमण रोकना प्रशासन का काम है, हम लोगों ने तलाबों के अतिक्रमण की बात को विधानसभा में भी उठाया है.हम प्रशासन का हर संभव सहयोग करने को भी तैयार हैं."

तलाब
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वहीं दरभंगा के बहादुरपुर विधानसभा से राष्ट्रीय जनता दल के विधायक भोला प्रसाद यादव कहते हैं, "सरकार में जो लोग हैं उनकी संलिप्ता की बदौलत कई तलाबों को भर कर लोगों ने घर बना लिया. तलाब आवासीय भूखंड के तौर पर विकसित हो गए. राज्य सरकार ने इसपर कोई सख्ती से ध्यान नहीं दिया. लोग मनमाने ढंग से तलाबों का अतिक्रमण कर रहे हैं."

नीतीश सरकार की नल जल योजना

दरभंगा और आसपास के लिए यह संकट भले नया हो लेकिन बिहार के पटना-गया-नालंदा जैसे जिलों में भी पानी का संकट बीते कई सालों से गर्मी के महीनों में गहराता रहा है.

इसी को ध्यान में रखते हुए बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने पिछले दिनों अपने सात निश्चय कार्यक्रम में हर घर को पीने के लिए नल का पानी मुहैया कराने की योजना बनाई है.

राज्य के जल संसाधन मंत्री संजय झा कहते हैं, "जल नल योजना नहीं होती तो दरभंगा में और भी भयानक स्थिति हो जाती है. लोगों की आधी जान इस योजना के चलते ही बची है. बिहार के नौ सौ गांवों तक नल जल योजना पहुंच चुकी है."

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इस नल जल योजना के शुरुआत की कहानी भी बेहद दिलचस्प है. राज्य सरकार ने इस योजना का पायलट चरण पटना से सटे पाली इलाके में किया था. इस योजना की शुरुआत जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि यह प्रयोग पाली गांव में पहले पहल 150 घरों तक पानी पहुंचाने के लिए किया गया और तीन चार दिन के बाद स्थिति यह थी कि वहां के लोगों की प्रतिक्रिया थी- नल जल से बेहतर अपना चापाकल.

हालांकि सरकार ने अपनी योजना जारी रखी और आज यह योजना राज्य के अलग अलग हिस्सों में शुरू हो चुकी है. दरभंगा में इस जल संकट के दौरान ही इस योजना को लागू किया गया है.

लेकिन कम समय को देखते हुए अभी बस्तियों के सामने तक ही नल लगा है, जहां पर पानी के लिए लोगों की भीड़ जमा हो जाती है क्योंकि पानी सुबह और शाम निर्धारित घंटों के लिए ही आता है.

दरभंगा के जिला विकास आयुक्त कारी प्रसाद महतो बताते हैं, "जल नल योजना को ठीक ढंग से लागू करने के लिए हमें हर घर तक पाइप पहुंचानी होगी, प्रशिक्षित प्लंबरों की कमी के चलते इस काम को तेज रफ्तार से करना संभव नहीं है."

हालांकि जिन इलाकों में भूजल की स्थिति पहले से ही खराब रही हो, उन इलाकों में नल के जरिए जल पहुंचाने का विचार अच्छा हो सकता है लेकिन दरभंगा जैसे जिलों में इस योजना को लागू करने का विरोध भी शुरू हो गया है.

दरभंगा के बहादुरपुर के विधायक भोला प्रसाद यादव कहते हैं, "यह पूरी तरह से फेल योजना है. यह पैसे का जबर्दस्त लूट है. डीप बोरिंग के चलते पानी तो है लेकिन उसका पाइप लाइन ठीक नहीं है, ठीक ढंग से कनेक्शन नहीं है, पानी आता है तो पूरा का पूरा सड़क पर बह जाता है. इससे बेहद कम पैसे में इंडियन मार्का चापाकल लगाया जा सकता है, लेकिन सरकार का ध्यान समस्या ख़त्म करने पर नहीं है."

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पूर्व राष्ट्रपति एपीजे डब्ल्यू कलाम के सहयोगी और तेजस को विकसित करने वाले वैज्ञानिक टीम में शामिल रहे मानस बिहारी वर्मा दरभंगा में ही रहते हैं. वे बताते हैं कि राज्य सरकार की नल जल योजना एक्सपर्ट और विभिन्न साझेदारों की सलाह के बिना आनन फानन में तैयार की गई थी.

यह भी जाहिर होता है कि सरकार इस योजना को आनन फानन में लागू भी कर रही है. वैसे नल के जरिए पीने का पानी पहुंचाने से लोगों को सुविधाएं जरूर मिलती हैं, लेकिन यह समस्या कोई स्थायी समाधान नहीं है.

चर्चित पुस्तक जल-थल-मल के लेखक और पर्यावरण से जुड़े मसलों पर गंभीरता से काम करने वाले पत्रकार सोपान जोशी बताते हैं, "हमारे देश की जलवायु बाकी दुनिया से अलग है, हमारा देश-समाज-इतिहास सब-का-सब चौमासे से बना है, यानी मॉनसून से. हमारी जल व्यवस्था अपने मिट्टी-पानी के स्वभाव से बनी थी. हर कोई बारिश के पानी को संजो के ज़मीन में रोकने के जतन करता था. गुलामी के 200 साल में इन पुराने तरीकों को तोड़ के पानी की लूट पर आधारित एक नयी व्यवस्था खड़ी की गयी."

वर्ल्ड बैंक के निर्देशों पर मानवीय सूचकांकों का हवाला देकर सरकारें नल जल योजना को लागू करने पर जोर देती रहती हैं और भारत के तमाम महानगरों में यह व्यवस्था दिखाई देती है.

लेकिन इसके योजनाकार ये बात भूल जाते हैं कि शहरों में बड़े बड़े पाइपों के जरिए ग्रामीण इलाकों से पानी खींचकर लाया जाता है और फिर उसे घर-घर तक पहुंचाया जाता है. दिल्ली में जहां पीने का पानी यमुना के जरिए लाया जा रहा है वहीं इसके एनसीआर रीजनल में गंगा का पानी खींचकर लाया जा रहा है.

लेकिन जब यह सिलसिला छोटे शहरों और कस्बों में अपनाया जाना लगा, तो सबसे बड़ी समस्या ये उत्पन्न होगी कि उन हिस्सों के लिए पानी किन लोगों के हक को मारकर लाया जाएगा.

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इतना ही नहीं, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की नजर में पानी की उपलब्धता और उसके उपयोग को राशनिंग करना, पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे के बड़े खेल का हिस्सा भर है.

यह माना जाता है कि नल के जरिए जल आने पर एक तो प्रत्येक घर को इसके लिए कीमत देनी होगी. और आगे चलकर पानी की उपलब्धता कुछ लीटर और कुछ घंटे तक सीमित कर दिया जाएगा.

यानी जल जैसे प्राकृतिक संसाधन का मामूली हिस्से पर आम लोग निर्भर बनाए जाएंगे जबकि वहीं दूसरी ओर बोतलबंद पानी का कारोबार करने वाले कारपोरेट समूह जमीन के नीचे के पानी का अंधाधुंध दोहन करते रहेंगे.

सोपान जोशी इस मुद्दे पर कहते हैं, "आज़ादी के बाद हमारे पढ़े-लिखे समाज और उसकी राजनीति ने पानी की इसी लूट को आदर्श मान लिया, इसे विकास का नाम दे दिया. हमारी सरकारें इस विकास के बोरवेल से हमारे समाज के पानी का दोहन कर रही हैं. हर राजनीतिक दल लूटे हुए पानी को बाँट के वोट बटोरना चाहता है. इसमें हर तरह के राजनीतिक नारे भी खप जाते हैं.अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय व्यापार भी इस लूट से मुनाफ़ा कमाने के लिए तैयार हैं. इस लूट की मानसिकता में राष्ट्रीयता से कोई अंतर नहीं पड़ता, राष्ट्रवाद से भी नहीं."

समस्या का क्या है स्थायी हल

जमीन के नीचे के पानी पर प्रभुत्व की इस लड़ाई से दरभंगा के आम लोगों को बहुत ज्यादा मतलब नहीं है. क्योंकि उन्हें तो पीने के पानी की चिंता ज्यादा है, जिसका सामना वे पहली बार कर रहे हैं.

दरभंगा के लहेरियासराय स्टेशन के समीप बहादुरपर मोहल्ले की महिलाओं को टैंकर से पानी लेने के लिए रोजाना तीन से चार घंटे तक संघर्ष करना पड़ रहा था, ऐसे में ज्यादातर महिलाएं चाहती है कि जल्दी से घर घर तक नल लग जाए ताकि पानी के लिए बेहद मुश्किल नहीं हो.

एक महिला का कहना था, "कितना समय बर्बाद करें अगर घर घर तक नल पहुंच जाए तो बहुत अच्छा हो जाएगा. पानी के लिए भटकना नहीं पड़ेगा."

लेकिन नल जल योजना के लिए पानी कहां से आएगा, यह पूछे जाने पर वह कोई जवाब नहीं देती हैं, कहती हैं पहले सरकार तक हमारी बात तो पहुंचाइए. लेकिन असली सवाल यही है कि जल नल योजना से क्या बिहार में जल संकट का स्थायी हल है.

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संजय झा भरोसा जताते हैं कि उनकी सरकार बिहार में जल संरक्षण को लेकर काफी गंभीर है और आने वाले दिनों इसको लेकर एक व्यापक नीति बनाने पर काम कर रही है.

हालांकि बरसात शुरू होने के बाद जल संकट की समस्या कम होती जाएगी, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार जल संरक्षण को लेकर किस तरह का प्रावधान लेकर आती है और अपने नदी और तलाब के जल स्तर को बनाए रखने के लिए कितनी गंभीर कोशिश करती है.

नरायण चौधरी बताते हैं, दरभंगा में इस साल पानी का जो संकट देखने को मिला है वह 15 साल से लगातार दस्तक दे रही चुनौती के बाद आया है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि बिहार सरकार इन सालों में कभी तलाब और नदियों को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम नहीं कर रही है.

नरायण चौधरी कहते हैं, "हमने अपने तलाबों और नदियों की हत्या कर दी है, अगर हम उनको पुनर्जीवित नहीं करेंगे तो कोई भी हल जल संकट की समस्या का निदान नहीं हो सकता."

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सोपान जोशी कहते हैं, "कोई सरकार पानी पर कुछ समझदारी से काम करना चाहती है, तो सबसे पहले वह ईमानदारी से इसका आकलन करेगी कि सरकारी योजनाओं ने पानी की लूट और बर्बादी को कैसा बढ़ावा दिया है. इसके बाद यह बात हो कि पहले की गलतियों को सुधारने के व्यवहारिक तरीके क्या हो सकते हैं. ऐसा होता है, तो कुछ नया-ताज़ा होने की उम्मीद जगेगी. वर्ना किसी नये नाम से, किसी नयी योजना के माध्यम से पानी की लूट के और नये तरीके निकल आएँगे."

दरभंगा से आने वाले फिल्मकार और सामाजिक कार्यकर्ता रवि पटवा पिछले कुछ महीनों से दरभंगा को ग्रीन सिटी बनाने के लिए जल संरक्षण अभियान चला रहे हैं. रवि पटवा कहते हैं, "मिथिला की धरती पर कम से कम दो लाख पेड़ लगाने की योजना है हमलोगों की है. इससे जिले में जल संकट को दूर करने में मदद मिलेगी."

हालांकि अपने इस अभियान में रवि पटवा जून महीने तक केवल 670 पेड़ ही लगा पाए हैं और उनके अभियान को एक लंबा रास्ता तय करना है. लेकिन ऐसे लोगों के चलते दरभंगा में जल और पर्यावरण को लेकर जागरूकता का स्तर निश्चित तौर पर बढ़ रहा है.

हालांकि पिछले एक सप्ताह के बाद बारिश के बाद दरभंगा के आम चापाकलों में पानी आने लगा है और दरभंगा शहर में जगह जगह जल जमाव भी हो चुका है.

पीने का पानी का संकट पूरी तरह भले दूर नहीं हुआ है लेकिन आम लोगों के सामने अब घर से बाहर निकलने का संकट पैदा हो गया है, जाहिर है जल जमाव और जल निकासी के लिए भी जिला प्रशासन के पास कोई व्यवस्था नहीं है.

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दरभंगा शहरी क्षेत्र के विधायक संजय सारावगी बताते हैं, "दरभंगा में आज तक सीवर सिस्टम नहीं बन पाया है. क्योंकि इस काम के लिए 450 करोड़ रुपये का अनुमानित बजट है. इतनी बड़ी धनराशि सरकार के पास नहीं है. अकेला विधायक कहां से पैसा दे सकता है. लेकिन हम लोग लगे हुए हैं. पहले तो नाली और गड्ढे थे, वह अब नहीं हैं."

हक़ीकत में, नदियों और तलाबों के रहने से हर साल आने वाली बाढ़ों का असर भी कम होता है और गर्मी के दिनों में पानी का संकट भी नहीं होता है इस बुनियादी बात को दरभंगा के लोग, अधिकारी और नेता जब तक नहीं समझेंगे तब तक दरभंगा एक त्रासदी से दूसरी त्रासदी की ओर भागते हुए लोगों का शहर बना रहेगा.

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English summary
Darbhanga: Why was the city of 300 ponds longing for water?
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