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कोरोना मरीजों को खुद से दवा देने का हो सकता है बुरा अंजाम, डॉक्टर दे रहे हैं ये चेतावनी

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चंडीगढ़, 6 मई: कोरोना की पहली लहर के दौरान देश को करीब 19 लाख ऐक्टिव केस के लिए तैयार किया गया था। पिछले साल संपूर्ण लॉकडाउन के दौरान इसी आधार पर हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया गया था। लेकिन, कोरोना की दूसरी लहर ने सारी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा दी है। 35 लाख 66 हजार से ज्यादा ऐक्टिव केस हो चुके हैं। जाहिर है कि अस्पतालों में जगह नहीं है। कई गंभीर मरीजों को भी अस्पतालों में बिस्तर नहीं मिल पा रहा है। आज की तारीख में ज्यादातर कोरोना पॉजिटिव मरीजों के लिए होम आइसोलेशन बेहतर विकल्प है तो कई मरीजों के लिए मजबूरी भी। लेकिन, इसका एक बुरा परिणाम यह देखने को मिल रहा है कि कई बार मरीज या उनके परिवार वाले खुद ही डॉक्टर बनने लगे हैं। लेकिन, असल के डॉक्टर इस बात को लेकर सख्ती से आगाह कर रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि खुद से दवा लेना मरीजों पर भारी पड़ सकता है।

कोविड में खुद से दवा लेना खतरनाक- डॉक्टर

कोविड में खुद से दवा लेना खतरनाक- डॉक्टर

कोरोना मरीजों को खुद से एंटीवायरल, स्टेरॉयड, एंटीबायोटिक या फिर रेमडेसिविर जैसी एंटीवायरल इंजेक्शन देना बीमारी की गंभीरता को काफी बढ़ा सकता है। चंडीगढ़ स्थित पोस्ट ग्रैजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर) के डॉक्टरों ने ऐसी गलतियों को लेकर आगाह किया है। दरअसल, होता ये है कि जैसे ही किसी की कोविड रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, संबंधित व्यक्ति और उसके परिवार वाले घबराहट में दवाओं को लेकर जल्दीबाजी करना शुरू कर देते हैं। पीजीआई चंडीगढ़ के डीन एकेडमिक्स और एनेस्थेसिया एंड इंटेसिव केयर के एचओडी प्रोफेसर जीडी पुरी कहते हैं, 'दुर्भाग्य से दवाइयों को लेकर बहुत ही ज्यादा गलत जानकारियां हैं। कई दवा हैं जो नुकसान पहुंचा सकते हैं। स्टेरॉयड जैसी दवा या रेमडेसिविर, टोसिलिजुमैब और इटोलिजुमैब का बेवजह इस्तेमाल हानिकारकर साबित हो सकता है। मरीजों को फायदा पहुंचाने की बजाए यह बीमारी की गंभीरता को बढ़ा सकती हैं।'

ज्यादातर मरीजों को दवा देने की जरूरत नहीं- डॉक्टर

ज्यादातर मरीजों को दवा देने की जरूरत नहीं- डॉक्टर

प्रोफेसर पुरी साफ कहते हैं कि कोविड के 80 फीसदी से ज्यादा मामलों में किसी भी दवा की जरूरत नहीं होती। सिर्फ 10 से 15 फीसदी मामलों में मरीजों को पैरासिटामोल देने के साथ ही ऑक्सीजन सैचुरेशन लेवल पर नजर रखनी होती है। कोई भी मरीज जब चंडीगढ़ पीजीआई के कोविड-केयर फैसिलिटी के इमरजेंसी में आता है, उसे 5 मिनट तक चलने को कहा जाता है। जब ऑक्सीजन लेवल 94 से कम होता है, तभी भर्ती किया जाता है। वो कहते हैं कि जबतक ऑक्सीजन लेवल ठीक है, चिंता की कोई बात नहीं है। वो कहते हैं कि चलने के बाद यदि ऑक्सीजन सैचुरेशन 97 से 99 के सामान्य स्तर से नीचे नहीं गिरता है, इसका मतलब फेफड़े में कोई बड़ी दिक्कत नहीं है।

'सीटी-स्कैन से कोरोना का पता नहीं चलता'

'सीटी-स्कैन से कोरोना का पता नहीं चलता'

यही नहीं डॉक्टरों के मुताबिक सीटी स्कैन से तबतक कोरोना का पता नहीं चल सकता जबतक कि वह फेफड़े तक ना पहुंच जाए। बाकी इससे सिर्फ फेफड़े में इंफेक्शन का पता चलता है। पुरी के मुताबिक, 'दुर्भाग्य से कुछ लोग मानते हैं कि सीटी स्कैन से कोविड-19 का पता चलता है, जो कि पूरी तरह से गलत है। सीटी स्कैन में कोविड को लेकर पता नहीं भी चल सकता है। हां, अगर फेफड़े में कोई दिक्कत आ रही है तो सीटी स्कैन से यह पता चल जाता है।'

'स्टेरॉयड लेने में जल्दबाजी ना करें'

'स्टेरॉयड लेने में जल्दबाजी ना करें'

इसी तरह चंडीगढ़ पीजीआई ने स्टेरॉयड के इस्तेमाल को लेकर भी बहुत ही ज्यादा सावधानी बरतने की सलाह दी है और वह भी स्पेशलिस्ट की निगरानी में। पीजीआई ने इसको लेकर जो केस स्टडी की है, उसमें इस बात का खुलासा हुआ है कि कई मरीजों ने जिन्होंने खुद से एंटीवायरल इंजेक्शन ली और स्टेरॉयड लिए, उनकी बीमारी और गंभीर हो गई। डॉक्टर पुरी के मुताबिक 'स्टेरॉयड की वजह से शरीर में वायरस का रेप्लिकेशन बढ़ सकता है। अगर इसे शुरू में ही दे दिया जाता है तो वायरस से होने वाले नुकसान को बढ़ाकर बीमारी की गंभीरता बढ़ा सकते हैं। इसका सही समय तब है जब शरीर में वायरस का रेप्लिकेशन खत्म हो चुका हो।' स्टडी में यह बात सामने आई है कि ऑक्सीजन सैचुरेशन गिरने से पहले अगर स्टेरॉयड दी जाती है तो मरीज की मृत्यु की आशंका और उसकी बीमारी की गंभीरता बढ़ सकती है। गौरतलब है स्टेरॉयड को लेकर एम्स के डायरेक्टर डॉक्टर रणदीप गुलेरिया पहले भी यही सलाह दे चुके हैं।

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रेमडेसिविर के पीछे ना भागें, इतना जरूर जान लें

रेमडेसिविर के पीछे ना भागें, इतना जरूर जान लें

इसी तरह रेमडेसिविर इंजेक्शन को लेकर भी उन्होंने बहुत ही सख्त चेतावनी दी है। उनके मुताबिक इसका इस्तेमाल वायरस के रेप्लिकेशन फेज के दौरान किया जाता है और सिर्फ कोविड के हाई-रिस्क मरीजों को ही दी जाती है। वो कहते हैं कि 'अगर मरीज वेंटिलेटर पर है तो इससे उसे कोई फायदा नहीं होगा।' इसी तरह अगर मरीज घर पर ही रहकर इलाज करा रहा है तो भी इसका कभी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा है, 'अस्पताल में भर्ती मरीज में भी इस दवा से उसके जीवित रहने की संभावना बढ़ती नहीं देखी गई है। यह सिर्फ अस्पताल में उसके रहने के समय को कम करने में ही मदद कर सकती है।' यही नहीं जिन कोविड मरीजों को लिवर या किडनी से जुड़ी परेशानी है, उनके लिए यह घातक साबित हो सकती है।

English summary
Providing medicines to Covid patients by themselves can prove to be fatal, doctors of Chandigarh PGI told that in which case, which medicines are given by specialists
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