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कोरोना, लॉकडाउन और महानगरों की बेरुख़ी ने बढ़ाई खेती के प्रति इन युवाओं की दिलचस्पी

By समीरात्मज मिश्र

युवा, कोरोनावायरस, लॉकडाउन
Samiratmaj Mishra/BBC
युवा, कोरोनावायरस, लॉकडाउन

प्रयागराज के रहने वाले प्रकाश चंद्र दिल्ली में एक निजी बैंक के फ़ाइनेंस विभाग में अच्छे पद पर काम करते थे.

22 मार्च को जनता कर्फ़्यू लागू होने से कुछ समय पहले वो अपने गांव आए थे.

पिछले कुछ दिनों से कई कंपनियों में जारी कॉस्ट कटिंग ने उन्हें भी परेशान कर रखा था.

24 मार्च को देश भर में लॉकडाउन की घोषणा हो गई और प्रकाश चंद्र ने तय कर लिया कि वो अब अपने गांव में ही रहेंगे.

प्रकाश चंद्र बताते हैं, "मेरी नौकरी पर तो फ़िलहाल कोई ख़तरा नहीं था लेकिन मेरे कई जानने वालों की नौकरी पिछले कुछ महीनों में चली गई. वो लोग बहुत परेशान हैं. तभी से मेरे दिमाग़ में आ रहा था कि क्यों न गांव में ही रहकर कुछ काम किया जाए. मेरे पास थोड़ी-बहुत ज़मीन भी है और गांव में घर भी है. मुझे 25 मार्च को लौटकर दिल्ली जाना था लेकिन लॉकडाउन लग जाने के बाद जाना नहीं हुआ. यहीं से मैंने अपने बॉस को इस्तीफ़ा भेज दिया और बोल दिया कि अब गांव में ही रहूंगा और खेती करूंगा."

प्रकाश चंद्र
Samiratmaj Mishra/BBC
प्रकाश चंद्र

घरों में ही रोज़गार के साधन

प्रकाश चंद्र पिछले आठ साल से निजी कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं. वे दिल्ली के अलावा अन्य शहरों में भी रहे.

खेती करने का उनके पास कोई अनुभव नहीं है, भले ही उनका बचपन गांव में बीता हो. बावजूद इसके, वो खेती की ओर क्यों और कैसे रुख़ कर रहे हैं?

इस सवाल पर वो बताते हैं, "नौकरी छोड़कर गांव आने का फ़ैसला इतना आसान नहीं है. व्यक्तिगत रूप से मुझे कोई दिक़्क़त भी नहीं थी नौकरी में. लेकिन निजी कंपनियों के कर्मचारियों के साथ जिस तरह का व्यवहार हुआ, नौकरी से निकाल दिया गया, तनख़्वाह कम कर दी गई, छोड़ने पर विवश किया गया और फिर उसके बाद पलायन की त्रासदी जो हम लोगों ने देखी, उससे ऐसा लगा कि क्यों न अपने घरों में ही रोज़गार के साधन ढूंढ़े जाएं."

प्रकाश चंद्र को दिल्ली से आए दो महीने से ज़्यादा हो गए. यू-ट्यूब और अन्य माध्यमों से कुछ अलग हटकर खेती करने की दिशा में योजना बना रहे हैं. कहते हैं कि इसी साल से इसकी शुरुआत कर देंगे.

मोबाइल कंपनी से खीरे-ककड़ी की कंपनी तक

लेकिन प्रयागराज के ही रहने वाले संजय त्रिपाठी ने बाक़ायदा तरबूज, खरबूजा, खीरा और ककड़ी की खेती के साथ इसकी शुरुआत भी कर दी है. संजय त्रिपाठी इंजीनियर हैं और नोएडा की एक मोबाइल कंपनी में पिछले छह साल से काम कर रहे थे.

संजय बताते हैं, "मैं तो काफ़ी दिन से इस बारे में सोच रहा था कि दस-बारह घंटे की मेहनत के बाद पैंतीस-चालीस हज़ार रुपया महीना कमाने से अच्छा है कि गांव में ही रहकर खेती और कुछ अन्य रोज़गार किए जाएं. यहां जीवन-यापन भी अच्छे से होगा और सुकून भी रहेगा. लॉकडाउन के बाद तो जैसे मुझे मौक़ा ही मिल गया."

देश में कोरोना संकट के चलते पिछले कुछ महीनों में न सिर्फ़ लाखों की संख्या में मज़दूर बेरोज़गार हुए हैं बल्कि निजी क्षेत्र में काम करने वाले दूसरे पेशेवरों के सामने भी रोज़गार का गंभीर संकट पैदा हा गया है.

तमाम लोगों की नौकरियां चली गईं. ऐसी स्थिति में कुछ लोगों के सामने तो दोबारा नौकरी ढूंढ़ने की विवशता है लेकिन ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े तमाम युवा अब आजीविका का रास्ता अपने गांवों में ही तलाशने लगे हैं.

संजय त्रिपाठी
Samiratmaj Mishra/BBC
संजय त्रिपाठी

गाँव में खुलेगा कंप्यूटर ट्रेनिंग कार्यक्रम

मऊ ज़िले के रहने वाले कृष्ण कुमार पुणे में सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हैं.

बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि अभी नौकरी छोड़ी नहीं है, लेकिन लॉकडाउन ख़त्म होते ही नौकरी छोड़कर गांव आ जाऊंगा.

"दो महीने से घर से ही काम कर रहा हूं. पिछले क़रीब एक साल से इस बारे में योजना बना रहा हूं कि अपने गांव चलूं और वहीं कुछ काम करूं. खेती में कुछ लोगों को मैंने बहुत अच्छा करते हुए देखा है और उनसे बातचीत करके मैं आधुनिक तरीक़े से खेती करना चाहता हूं."

कृष्ण कुमार की योजना यह है कि पहले वो अपने गांव आकर एक कंप्यूटर ट्रेनिंग स्कूल खोलेंगे जिससे उन्हें कुछ आमदनी भी होगी, गांव के बच्चों को कंप्यूटर में दक्ष बनाएंगे और साथ ही साथ ख़ुद भी खेती करेंगे और गांव के दूसरे युवाओं को भी इसके लिए प्रोत्साहित करेंगे.

महानगरों की बेरुखी ने बढ़ाई खेती के प्रति युवाओं की दिलचस्पी

जॉब सिक्योरिटी

कृष्ण कुमार कहते हैं, "यहां 10-12 घंटे काम करने के बाद किसी तरह की जॉब सिक्योरिटी नहीं है. गांव में मेरे यहां अच्छी ख़ासी खेती है. मेरे पिता जी खेती करते हैं. हम लोगों को बचपन से ही नौकरी करने के लिए ही पढ़ाया जाता है. यह कभी नहीं सिखाया गया कि हम भी नौकरी देने वाले बन सकते हैं. मैं ख़ुद भी गांव में आत्मनिर्भर बनना चाहता हूं और अपनी अगली पीढ़ी को भी यही बताना चाहता हूं कि वो जॉब देने की सोचें."

कृष्ण कुमार पड़ोसी ज़िले ग़ाज़ीपुर के रहने वाले डॉक्टर मनीष कुमार राय से प्रभावित हैं.

मनीष कुमार राय बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में सोशल वर्क विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर थे. साल 2013 में वो नौकरी छोड़कर गांव में ही केले की खेती करने लगे और अच्छा-ख़ासा आर्थिक लाभ भी उन्हें मिलने लगा. बाद में उन्हें देखकर कई और लोग भी इस खेती में लग गए.

डॉक्टर मनीष कुमार राय बताते हैं, "मैं सीधे तौर पर भी और कई अन्य लोगों के साथ मिलकर भी क़रीब छह सौ एकड़ ज़मीन पर केले की खेती करता हूं. मेरे साथ दर्जनों किसान जुड़े हुए हैं और सभी काफ़ी पढ़े-लिखे युवा हैं. खेती में मेहनत और तकनीक के साथ जो आमदनी है वह बाहर किसी भी नौकरी की तुलना में कहीं अच्छी है. एक एकड़ केले की खेती में क़रीब डेढ़ लाख रुपये की लागत आती है और आमदनी क़रीब तीन-चार लाख रुपये होती है."

खिलाड़ियों का भी बढ़ता रुझान

ग़ाज़ीपुर के ही रहने वाले रोहित कुमार सिंह बनारस में शूटिंग की कोचिंग चलाते हैं. लॉकडाउन के चलते कोचिंग बंद है और उनका रोज़गार भी इस वजह से ठप है. रोहित सिंह बीएचयू से शारीरिक शिक्षा में पीएचडी हैं और नौकरी की तलाश में भी हैं.

लेकिन मनीष कुमार राय जैसे उच्च शिक्षित लोगों से प्रेरणा लेकर वो भी खेती की ओर आना चाहते हैं.

रोहित बताते हैं, "मैं ख़ुद भी शूटिंग में यूपी की टीम का प्रतिनिधित्व कर चुका हैं और नेशनल लेवल पर दो मेडल भी जीत चुका हूं. लॉकडाउन में मेरा काम बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. यूट्यूब देखकर रिसर्च कर रहा हूं कि किस चीज़ की खेती की जाए और कैसे की जाए. पारंपरिक तरीक़े वाली खेती में तो कुछ मिलना नहीं है. पेशेवर तरीक़े से तैयारी और होमवर्क करके इस क्षेत्र में उतरने की तैयारी कर रहा हूं."

ग़ाज़ीपुर में कई किसान ऐसे हैं जो कि भारी मात्रा में सब्ज़ियों की खेती कर रहे हैं और उससे उन्हें अच्छी-ख़ासी आमदनी भी हो रही है. तमाम किसान ऐसे भी हैं जो कि अपनी उपज का एक बड़ा हिस्सा विदेशों में निर्यात भी कर रहे हैं.

इसके अलावा यूपी के दूसरे हिस्सों में भी कई किसानों ने परंपरागत तरीक़े से हटकर खेती की और सफलता के झंडे गाड़े. आईटी, एमबीए या फिर अन्य क्षेत्रों के प्रोफ़ेशनल्स भी खेती की ओर इन्हें ही देखकर प्रोत्साहित हो रहे हैं.

दिल्ली में कई बड़ी कंपनियों में सलाहकार की भूमिका निभा चुके राणा सिंह ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एमफ़िल और पीएचडी की डिग्री ली है. पिछले चार-पांच साल से पूरी तरह से बलिया ज़िले में स्थित अपने गांव में शिफ़्ट हो गए हैं.

राणा सिंह बताते हैं, "मैं तो कुछ शौक़िया और कुछ स्वास्थ्य संबंधी दिक़्क़तों की वजह से दिल्ली से गांव आ गया. इंटरप्रेन्योर बनना चाहता था, खेती का शौक़ था और अब उसे अच्छी तरह से पूरा कर रहा हूं."

कृषि के क्षेत्र में संभावनाएं कम

राणा सिंह युवा पीढ़ी में इस ओर बढ़ रहे रुझान से तो ख़ुश हैं लेकिन इसमें बहुत संभावना नहीं देखते.

वो कहते हैं कि आज भी इस क्षेत्र में तमाम दिक़्कतें हैं, "कुछ एक सफल उदाहरण हमारे सामने भले ही हैं लेकिन सच बताऊं तो पूर्वी यूपी में आधुनिक तरीक़े से खेती करना, उसमें निवेश करना और फिर आर्थिक समृद्धि हासिल करना संभव ही नहीं है. इसका कारण यह है कि ज़मीन बँटी हुई है, सरकारी अफ़सरशाही हावी है, कृषि क्षेत्र के विकास के लिए सरकार की तमाम योजनाएं हैं लेकिन ज़्यादातर कागज़ी हैं. कागज़ पर सब अच्छा लगता है लेकिन ज़मीन पर बहुत मुश्किलें हैं. मैं ख़ुद भुक्तभोगी हूं. इसलिए जो युवा इधर आकर्षित हो भी रहे हैं, वो बहुत दिनों तक यहां टिके रहेंगे, इसमें मुझे संदेह है."

हालांकि ऐसे लोगों के सामने बांदा ज़िले के जखनी गांव जैसे उदाहरण भी हैं जहां के लोगों ने समूह बनाकर खेती के दम पर न सिर्फ़ आत्मनिर्भरता हासिल की है बल्कि गांव से होने वाले पलायन को भी रोक दिया.

महानगरों की बेरुखी ने बढ़ाई खेती के प्रति युवाओं की दिलचस्पी

पानी को संरक्षित करने की कोशिश

गांव के लोगों को इस ओर प्रेरित करने वाले उमाशंकर पांडेय बताते हैं, "हमने सबसे पहले पानी को संरक्षित करने की कोशिश की जिसका परिणाम हुआ कि बुंदेलखंड जैसे सूखे इलाक़े में भी हमारे गांव में हर समय लबालब पानी रहता है. उस पानी का इस्तेमाल हमने खेती में किया और आज स्थिति यह है कि हमारे गांव की सब्ज़ियां न सिर्फ़ पूरे ज़िले में बिकती हैं बल्कि हम लोग तीन-चार करोड़ रुपये का बासमती चावल भी हर साल बेचते हैं. हमारे गांव के कई लोग जो बाहर रहते थे, अब गांव में ही आकर खेती, पशुपालन और मछली पालन में लगे हैं."

दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह कहते हैं कि युवाओं में हाल के दिनों में खेती के प्रति आकर्षण बढ़ा ज़रूर है लेकिन ऐसे युवाओं की संख्या अभी भी बहुत कम है.

हालांकि अरविंद कुमार सिंह यह भी कहते हैं कि महानगरों में निम्न और निम्न-मध्यम वर्ग के जो हालात हैं, उन्हें देखते हुए गांवों में युवाओं के लिए संभावनाएं तलाशना कोई बुरा नहीं है.

वो कहते हैं, "उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और कुछ अन्य राज्यों में भी कई किसानों ने अपनी मेहनत और दूरदर्शिता से खेती में अच्छी-ख़ासी आमदनी की है. ज़ाहिर है, कुछ युवा उनसे प्रेरित भी हो रहे हैं. दूसरी ओर, प्राइवेट सेक्टर में नौकरियों की स्थिति पिछले कुछ वर्षों में काफ़ी ख़राब हुई है. कुछ उच्च पदों को छोड़ दिया जाए तो मध्यम और निचले स्तर पर वेतन बहुत ही कम है और इतने वेतन में इन महानगरों में जीवन-यापन करना बेहद मुश्किल है. फिर लॉकडाउन के दौर में युवाओं ने पलायन का जो दृश्य और दर्द देखा है, इससे उनके भीतर का महानगरीय आकर्षण भी जाता रहा. इसलिए जो यह सोच रहे हैं कि थोड़ा कम ही मिलेगा लेकिन सुकून ज़्यादा मिलेगा तो इसमें कुछ ग़लत भी नहीं है."

हालांकि कृषि मामलों से जुड़े जानकार यह भी कहते हैं कि बहुत ज़्यादा संख्या में युवाओं का खेती की ओर आकर्षित होना बहुत अच्छा संकेत भी नहीं है क्योंकि इससे न सिर्फ़ खेती पर दबाव बढ़ेगा बल्कि उत्पाद ज़्यादा होने पर इनकी क़ीमतें घटेंगी और इनके साथ दूसरे किसानों को भी नुक़सान उठाना पड़ेगा.

लेकिन अरविंद कुमार सिंह कहते हैं कि यह बहुत दूर की सोच है और जब तक यह स्थिति आएगी तब तक खेती का स्वरूप भी बदल चुका होगा.

BBC Hindi
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English summary
Coronavirus, lockdown and metropolitan rude behaviour increased these youth's interest in farming
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