Mumbai: मेडिकल स्टूडेंट्स के भरोसे चल रहे हैं Covid अस्पताल, कैसे थमेगी मौत की रफ्तार ?

नई दिल्ली- मायानगरी मुंबई देश में कोरोना वायरस का एपिसेंटर बना हुआ है। यहां मामले शुरू से बढ़ते ही जा रहे हैं और लगता है कि अब स्थिति नियंत्रण से बाहर होती दिखाई दे रही है। आलम ये है कि मुंबई में कोविड-19 के मरीजों को संभालने के लिए सरकारी अस्पतालों में बिल्कुल नए, बिना अनुभव वाले मेडिकल स्टूडेंट्स और डॉक्टरों को कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में उतरना पड़ रहा है। क्योंकि, सरकारी अस्पतालों के कई वरिष्ठ डॉक्टर क्वारंटीन हो चुके हैं। बीएमसी के तो कई बड़े अस्पताल ऐसे हैं, जो पूरी तरह से अनुभवहीन डॉक्टरों के भरोसे ही मरीजों का इलाज कर रहे है। इन डॉक्टरों के जज्बे और जोश में कोई कमी नहीं है और न ही वह अपनी ड्यूटी में कोई कसर छोड़ रहे हैं। दिक्कत ये है कि उन्हें अनुभवी डॉक्टरों का सहयोग और मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा है, इसलिए मुंबई में मरीजों की मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ता ही जा रहा है।

जूनियर डॉक्टरों के कंधे पर आया सारा भार

जूनियर डॉक्टरों के कंधे पर आया सारा भार

इकोनॉमिक टाइम्स में छपी एक खबर मुंबई की बहुत ही भयावह तस्वीर बयां कर रही है। हाल में मायानगरी के एक अस्पताल में बेतरतीब पड़े हुए शवों का वीडियो भी खूब वायरल हो चुका है। लेकिन, अब लग रहा है कि वाकई वहां स्थिति बहुत ही खराब हो चुकी है। स्थिति ऐसी है कि सीनियर निजी डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी से गायब नजर आ रहे हैं और कोविड-19 के मरीजों की पूरी जिम्मेदारी रेजिडेंट डॉक्टरों, एमबीबीएस स्टूडेंट्स और बॉन्ड की मियाद पूरी कर रहे लोगों को सौंप दी गई है। वही फ्रंटलाइन में रहकर मिशन को अंजाम दे रहे हैं। उनकी मदद के लिए अनुभवी डॉक्टरों की टीम है ही नहीं। बता दें कि बीते हफ्ते बीएमसी के लोकमान्य तिलक अस्पताल, जिसे सायन अस्पताल के नाम से भी जानते हैं, वहां का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें शवों को मरीजों के पास यूं छोड़ दिया गया था। ड्यूटी पर मौजूद रेजिडेंट डॉक्टरों के मुताबिक जगह की कमी, प्रशासनिक काम का भार और स्टाफ की कमी इस इस तरह की घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं।

निजी अस्पतालों के वरिष्ठ डॉक्टर जिम्मेदारी से भागे

निजी अस्पतालों के वरिष्ठ डॉक्टर जिम्मेदारी से भागे

जो जूनियर डॉक्टर काम पर हैं, उनके पास अनुभव की कमी है और उनपर कोरोना वायरस के संकट से निपटने की जिम्मेदारी आ गई है। एलटी अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टर 25 साल के पीजी स्टूडेंट आदित्य बुर्जे ने कहा है अस्पतालों में बड़ी तादाद में मरीजों के आने का सिलसिला लगातार जारी है और कई बार जिंदगी बचाने, बेड का इंतजाम करने और मृतकों के लिए पेपर वर्क पूरे करवानों के काम में से किसी एक को चुनना पड़ता है। प्राइवेट अस्पताल बंद हैं और सरकारी अस्पताल बिना कोविड-19 की जांच किए हुए मरीजों को एडमिट नहीं करते, ऐसे में सायन अस्पताल उन कुछ अस्पतालों में से है जो कोरोना के संदिग्ध मरीजों को भर्ती कर रहा है। उन्होंने कहा, 'क्योंकि जगह का अभाव है, बेड मिलने तक हमें मरीजों को फ्लोर पर ही रखना पड़ता है और ऐसा ही शवों के साथ भी होता है। ' उन्होंने ये भी कहा कि 'हमारे यहां स्टाफ , वॉर्ड ब्वॉय, सिस्टर्स और ऑक्सीजन, आईसीयू पूरे नहीं हैं। ' वार्ड में इस वक्त कोविड-19 के 300 मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट पर हैं।

रोजाना तीन-चार मरीजों को इलाज के अभाव में मरते देखते हैं- डॉक्टर

रोजाना तीन-चार मरीजों को इलाज के अभाव में मरते देखते हैं- डॉक्टर

आदित्य बुर्जे ने बताया कि वो रोजाना देखते हैं कि तीन से चार मरीज बहुत कोशिशों के बावजूद भी नहीं बच पाते। ये ऐसे मरीज होते हैं जिन्हें अगर वक्त पर ऑक्सीजन सपोर्ट मिल जाय तो वो बच सकते है, लेकिन कई अस्पतालों से ठुकराए जाने के बाद वो यहां पहुंचते हैं और तब तक बहुत देर हो जाती है। उन्होंने युवा डॉक्टरों की परेशानी के बारे में बताया कि, 'हमारे पास 22-24 मरीज सांस की बहुत ज्यादा तकलीफ के साथ पहुंचते हैं। हम रोज नया वार्ड खोलते हैं, जो उसी दिन भर जाता है। हमसे जो हो सकता है हम कर रहे हैं, खासकर प्राइवेट अस्पतालों ने अपने दरवाजे बंद कर रखे हैं। सारा भार हम पर है। '

आग से खेल रहे हैं मेडिकल स्टूटेंड

आग से खेल रहे हैं मेडिकल स्टूटेंड

मुंबई के एक और अस्पताल में काम करने वाले एक रेजिडेंट डॉक्टर ने बताया कि कोविड-19 के मरीजों के इलाज में लगे 80% पीजी स्टूडेंट हैं और लगभग 30 फीसदी फर्स्ट ईयर के स्टूडेंट हैं। इन लोगों को बिना किसी खास ट्रेनिंग के इमरजेंसी में आग से खेलने के लिए भेज दिया गया है। बता दें कि एमबीबीएस डिग्री पूरा करने में 5.6 साल लगते हैं, जिसके बाद तीन साल का पीजी होता है। एक व्यक्ति ने पहचान नहीं जाहिर होने की शर्त पर बताया कि, 'ऐसी स्थिति में हमें ज्यादा सीनियर डॉक्टरों की मदद और मार्गदर्शन की जरूरत है। कितने सारे प्राइवेट प्रैक्टिसनर्स घरों में बैठे हैं, जबकि इस समय राष्ट्र को उनकी आवश्यकता है।' उसने कहा, 'मैं समझता हूं कि मुंबई में ज्यादा मौतों के पीछे यही कारण है। इस मुश्किल घड़ी में अनुभवी पेशेवर लोग गायब हैं।'

उद्धव सरकार के आदेश की भी हवा उड़ाई

उद्धव सरकार के आदेश की भी हवा उड़ाई

पिछले हफ्ते महाराष्ट्र सरकार ने आदेश दिया था कि जो भी डॉक्टर राज्य में रजिस्टर्ड हैं उन्हें कम से कम 15 दिन ड्यूटी करनी पड़ेगी। अकेले मुंबई में ऐसे 25,000 रजिस्टर्ड एमबीबीएस हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर नदारद हैं। मुंबई में कोविड-19 ड्यूटी दे रहे कई डॉक्टरों के क्वारंटीन होने की वजह से अतिरिक्त 2,000 अनुभवी डॉक्टरों की तत्काल आवश्यकता है। सेंट जॉर्ज अस्पताल की 29 वर्षीय डॉक्टर मालविका नीरज ने कहा कि उन्होंने निजी तौर पर जाकर कई वरिष्ठ प्राइवेट प्रैक्टिसनरों से मदद मांगी है, लेकिन उन्होंने उसपर ध्यान नहीं दिया। उनके मुताबिक, 'इटली की कहानियां देखी हैं कि वरिष्ठ डॉक्टरों ने अपनी जान खतरे में डालकर कैसे ड्यूटी निभाई है। लेकिन, यहां हम ऐसा नहीं देख रहे हैं। हमें उनकी मदद और उनका मार्गदर्शन चाहिए।'

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