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'लिव-इन में सहमति से संबंध बनाना रेप नहीं', सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को दी गिरफ्तारी से राहत

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बलात्कार के आरोप के मामले में सुनवाई करते हुए अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय से चल रहे लिव-इन रिलेशनशिप में सहमति के आधार पर बनाए संबंध को इसलिए रेप नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि बाद में पुरुष साथी अपने शादी के वादे से मुकर गया है।

लिव इन में संबंध को रेप नहीं कह सकते

लिव इन में संबंध को रेप नहीं कह सकते

चीफ जस्टिस एस ए बोबडे की अध्यक्षता और जस्टिस ए एस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन की पीठ ने अपने फैसले में कहा "शादी का झूठा वादा करना गलत है। यहां तक कि महिला को भी शादी का वादा करके उसे तोड़ना नहीं चाहिए। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहना, शारीरिक संबंध बनाने को बलात्कार कहा जाय।"

सुप्रीम कोर्ट कॉल सेंटर में काम करने वाले दो कर्मचारियों के मामले पर सुनवाई कर रही थी। 5 साल तक लिव-इन में रहने के बाद युवक ने दूसरी महिला से विवाह कर लिया था। जिसके बाद लिव इन में रहने वाली युवती ने पुरुष साथी पर ये कहते हुए बलात्कार का आरोप लगा दिया कि उसने शादी का झूठा वादा करके उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए थे।

वकील की बात पर पीठ ने टोका

वकील की बात पर पीठ ने टोका

आरोपी युवक की तरफ से पेश हुई वरिष्ठ अधिवक्ता विभा दत्ता मखीजा ने कोर्ट में कहा कि अगर लिव इन में रहने पर रेप का आरोप लगाया जाता है और इस पर युवक की गिरफ्तारी होती है तो ये बहुत ही खतरनाक मिसाल बनेगा।

महिला की तरफ से पेश हुए वकील ने कोर्ट को बताया कि युवक ने दुनिया के सामने दिखाया कि वे पति-पत्नी की तरह रह रहे हैं और महिला से एक मंदिर में शादी भी की थी लेकिन पीड़िता से पैसे निकालने और उससे संबंध बनाने के बाद उसने अपना वादा तोड़ दिया।

वहीं अभियुक्त की तरफ से पेश वकील विभा दत्ता ने जब कहा कि महिला इस तरह के आरोप लगाने की आदी रही है और वह पहले भी दो युवकों पर इस तरह के आरोप लगा चुकी है तो पीठ ने कहा कि बलात्कार पीड़िता के लिए अभ्यस्त शब्द का इस्तेमाल करने की अनुमति कानून के अंदर नहीं है। मखीजा ने कहा कि वह मुद्दे की गंभीरता को समझ रही है लेकिन लगाए गए आरोप गलत हैं।

गिरफ्तारी पर लगाई रोक

गिरफ्तारी पर लगाई रोक

कोर्ट ने 8 सप्ताह तक आरोपी की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी और उसे ट्रायल कोर्ट में सुनवाई के लिए जाने को कहा है जहां पर अभियोजन पक्ष को बलात्कार के आरोप की पुष्टि के लिए सबूत पेश करने होंगे। कोर्ट ने याचिका निस्तारित करते कहा कि "आरोपों से बरी होने के लिए ट्रायल कोर्ट में जाना सही रहेगा।"

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने दो फैसले में कहा था कि कोई महिला यदि स्वेच्छा से लिव-इन में रहती है तो शारीरिक संबंध को बलात्कार मानना कठिन है। इसमें ये भी कहा गया था कि "रेप और सहमति से संबंध के बीच में स्पष्ट अंतर है।"

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English summary
Consensual sex in live in relationship not rape says supreme court
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