हेमा समिति की रिपोर्ट पर चर्चा न करने के लिए UDF ने केरल सरकार की आलोचना की
कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ विपक्ष ने शुक्रवार (11 अक्टूबर) को दावा किया कि केरल में वाम सरकार न्यायमूर्ति के हेमा समिति की रिपोर्ट में उल्लिखित यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार की घटनाओं के बारे में चर्चा करना नहीं चाहती है। यूडीएफ ने शुक्रवार को केरल सरकार को लेकर कई सारे वादे किए हैं।
यूडीएफ ने दावा किया है कि केरल में वामपंथी सरकार न्यायमूर्ति के हेमा समिति की रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार की घटनाओं के बारे में बचावपूर्ण थी। इसीलिए राज्य विधानसभा में इस पर चर्चा नहीं की जा रही थी।

विपक्ष का यह आरोप तब आया जब स्पीकर ए एन शमसीर ने यूडीएफ विधायकों द्वारा सदन को स्थगित करने और रिपोर्ट में निष्कर्षों के संबंध में आगे की जांच की कथित कमी के मुद्दे पर चर्चा करने के लिए पेश किए गए नोटिस को अनुमति देने से इनकार कर दिया। शमसीर ने कहा कि अनुमति देने से इनकार किया जा रहा है क्योंकि यह मुद्दा केरल हाई कोर्ट के सक्रिय विचाराधीन था।
स्पीकर के फैसले पर विपक्ष के नेता वी डी सतीशन ने क्या कहा?
स्पीकर के फैसले पर कड़ा विरोध जताते हुए विधानसभा में विपक्ष के नेता वी डी सतीशन ने दावा किया कि नोटिस इसलिए पेश किया गया क्योंकि शमसीर ने खुद कहा था कि इस मुद्दे को सदन में एक प्रश्न के रूप में नहीं उठाया जाना चाहिए और कोई सबमिशन या कुछ और पेश किया जाना चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया, "अगर हम महिलाओं से जुड़े इस मुद्दे पर चर्चा नहीं करते हैं तो यह सदन का अपमान है। हम इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं और सदन से बाहर निकल रहे हैं। सरकार इस मुद्दे पर रक्षात्मक है और इसीलिए सदन में इस पर चर्चा नहीं हो रही है।"
इस पर यूडीएफ ने सदन से बाहर निकलकर हंगामा किया। 2017 में अभिनेत्री पर हमला मामले और मलयालम सिनेमा उद्योग में महिलाओं के उत्पीड़न और शोषण के मामलों का खुलासा करने वाली इसकी रिपोर्ट के बाद केरल सरकार ने न्यायमूर्ति के हेमा समिति का गठन किया था।
रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद कई अभिनेताओं और निर्देशकों के खिलाफ यौन उत्पीड़न और शोषण के आरोप सामने आने के बाद, राज्य सरकार ने 25 अगस्त को उनकी जांच के लिए सात सदस्यीय विशेष जांच दल के गठन की घोषणा की। बाद में, जब यह मुद्दा केरल उच्च न्यायालय पहुंचा, तो उसने राज्य की वामपंथी सरकार की खिंचाई करते हुए कहा कि न्यायमूर्ति हेमा समिति की रिपोर्ट पर उसकी निष्क्रियता "खतरनाक रूप से सुस्त" है।
अदालत ने कहा था कि सरकार को यह रिपोर्ट चार साल पहले मिल गई थी और उसे तुरंत जवाब देना चाहिए था। अदालत ने निर्देश दिया था कि पूरी रिपोर्ट विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंपी जाए ताकि कानून के अनुसार अपेक्षित कार्रवाई की जा सके।












Click it and Unblock the Notifications