हार पर बाहर से कम नहीं कांग्रेस के भीतर की तकरार
नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद से कांग्रेस के भीतर और उसके बाहर तकरार बरकरार है। यह तकरार कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। पार्टी के बाहर कांग्रेस को लेकर उम्मीद लगाए लोगों को निराशा हुई, तो उनकी ओर से तरह-तरह की बातें की जाने लगीं। कांग्रेस विरोधियों की ओर से अपने तरीके से उस पर हमले किए जा रहे हैं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि अब भविष्य में कांग्रेस कभी खड़ी नहीं हो सकेगी। हरियाणा विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पराजित हो चुकी और लोकसभा चुनाव में हिस्सा न लेने वाली एक पार्टी के नेता ने तो कांग्रेस के मर जाने तक की बात कह दी थी। इस सबके बीच कांग्रेस के भीतर की बाहर आ रही खबरें बता रही हैं कि अंदरखाने भी काफी घमासान मचा हुआ है। बताया जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पार्टी के कुछ बड़े नेताओं को लेकर न केवल काफी नाराज हैं बल्कि हार के तमाम कारणों में इन नेताओं की भूमिका को भी जिम्मेदार मान रहे हैं। इस सबके आधार पर ही यह भी माना जा रहा है कि निकट भविष्य में कांग्रेस में कुछ बड़े फैसले भी लिए जा सकते हैं। राहुल गांधी को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें पूरी चुनावी लड़ाई अकेले दम पर लड़नी पड़ी जिसमें पार्टी की अतिमहत्वाकांक्षी न्याय योजना भी शामिल है और जिसकी एक तरह से अन्य वरिष्ठ नेताओं ने उपेक्षा की। उस तरह से प्रचारित-प्रसारित नहीं किया गया जैसी उनसे अपेक्षा की जाती थी।

जिस पार्टी को विजय मिली उसके तरीकों का विश्लेषण किया जाना चाहिए
वैसे यह एक मान्यता रही है कि जब जीत होती है, तो वह अगुवा की होती है। इसी तरह हार होती है, तो वह भी अगुवा की ही मानी जाती है। अगर इस एक मात्र कसौटी के आधार पर ही देखा जाए, तो कहा जा सकता है कि यह हार निश्चित रूप से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की है। लेकिन क्या इससे इतर चीजों की भी अनदेखी की जा सकती है जिसमें एक तथ्य यह भी है कि 2014 की तुलना में इस बार कांग्रेस की सीटों की संख्या बढ़ी है भले ही वह उल्लेखनीय न हों। तब इस तथ्य को भी भुलाया नहीं जाना चाहिए कि जिस पार्टी अथवा गठबंधन को विजय मिली है, उसके प्रदर्शन के तरीकों का भी विश्लेषण किया जाना चाहिए। इस सबके बावजूद कांग्रेस की कमियों को न नजरंदाज किया जाना चाहिए और न कोई कर रहा है। इसमें दो राय नहीं कि जमीनी स्तर पर पार्टी की ओर से जिस तरह के काम की अपेक्षा उससे उम्मीद लगाए लोगों को थी, वह बीते पांच सालों में नहीं किया गया और जो पार्टी की हार का बड़ा कारण बना।

पार्टी के भीतर की गुटबाजी के लिए भी शीर्ष नेतृत्व जिम्मेदार है
निश्चित रूप से यह काम भी पार्टी अध्यक्ष को ही करना था। लेकिन क्या इसके अलावा अन्य बड़े नेताओं की यह जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे अपने स्तर पर कम से कम अपने राज्यों में इस तरह के प्रयास करते। अगर ऐसा किया जाता, तो शायद हालात कुछ भिन्न होते। ऐसा नहीं लगता कि कोई पार्टी अध्यक्ष अपने राज्य अध्यक्षों को कुछ करने नहीं देता और वह नहीं चाहता कि संगठन मजबूत किया जाए व उससे लोगों को जोड़ा जाए। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे कितने ही राज्य बल्कि बहुत सारे राज्यों में यह पाया जाता है कि वहां का नेतृत्व एक तरह से हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है। यह आरोप भी लगाया जा सकता है कि पार्टी के भीतर की गुटबाजी के लिए भी शीर्ष नेतृत्व जिम्मेदार है लेकिन क्या दूसरे-तीसरे स्तर के नेताओं में जीत की गारंटी करने के लिए इस गुटबाजी को दबाने अथवा खत्म करने का जज्बा है। इस बारे में छत्तीसगढ़ का उदाहरण लिया जा सकता है जहां के बारे में बताया जाता है कि कांग्रेस ने इस तरह की समस्याओं से पार पाने के लिए अनथक प्रयास किया था। उसका परिणाम भी वहां से सामने आया था जब बीते लोकसभा चुनावों में वहां कांग्रेस ने प्रचंड जीत हासिल की थी। इसे खुद राहुल गांधी ने भी माना था कि वहां के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अनवरत संघर्ष किया, संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाया, गुटबाजी खत्म करने में भी काफी हद तक सफलता पाई और उन तत्वों को न केवल पार्टी से बाहर किया जो नुकसान के कारण बनते थे बल्कि उन्हें कमजोर भी किया। भले ही वहां लोकसभा चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं फिर भी दो सीटें जीतने में सफलता मिली जो 2014 में एक सीट पर ही सीमित रह गई थी।

बड़े नेता अपने बेटों को टिकट के लिए लॉबिंग करते रहे
अब अगर यह पता चलता है कि राहुल गांधी इस पर गुस्सा हैं कि कई बड़े नेता न केवल अपने बेटों को टिकट के लिए लॉबिंग करते रहे बल्कि दिल्ली में डेरा डाले रहे, तो समझा जा सकता है कि इन नेताओं के लिए चुनाव में जीत की गारंटी करना कितना मायने रखती है। शायद उनकी चिंता में सिर्फ यह रहा कि कैसे उनके बेटे को जीत मिल जाए। अब जैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जिम्मा दिया गया था लेकिन चुनावों के दौरान लगा ही नहीं कि वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कुछ कर भी रहे हैं अथवा नहीं। इसी तरह राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने अपना अधिकांश समय अपने बेटे के चुनाव प्रचार में लगाया। अन्य प्रत्याशियों को उनके ही हाल पर छोड़ दिया था। इसमें पार्टी के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम का भी नाम लिया जा रहा है। उनके बारे में भी यह कहा जा रहा है कि वे केवल अपने बेटे के लिए सोचते रहे। इतना ही नहीं, लगातार दिल्ली में बने रहे। कई अन्य नेताओं के बारे में भी इस तरह की ही बातें की जा रही हैं जिन्हें गलत नहीं माना जा सकता।

राहुल गांधी ने अपने स्तर पर बहुत सारे प्रयास किए
इन चुनावों में राहुल गांधी ने अपने स्तर पर बहुत सारे प्रयास किए और अब तो विरोधी भी यह मानने लगे हैं कि हार भले ही मिली हो पर वह खुद को स्थापित करने में सफल रहे हैं। इसी के साथ ही इसे भी नकारा नहीं जा सकता कि कांग्रेस में जिस तरह के संगठन की आवश्यकता है और लोगों से जीवंत संपर्क की जैसी जरूरत है, वह पार्टी दे पाने में असमर्थ रही है। यह काम अगर पहले नहीं हो सका था, तो बीते पांच सालों में इसे किया जा सकता था। लेकिन शायद इसे पीछे छोड़ दिया गया था। गठबंधन के बारे में भी यह देखे जाने की जरूरत है कि एनडीए से ज्यादा दलों का गठबंधन यूपीए का रहा है। यह अलग बात है कि कांग्रेस का गठबंधन अगर यूपी और दिल्ली में भी हुआ होता तो शायद हालात कुछ भिन्न होते। लेकिन इसके न होने के लिए क्या केवल कांग्रेस को ही पूरी तौर पर जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। लेकिन इसे भी नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि जहां गठबंधन हुआ भी वहां जीत की गारंटी नहीं हो सकी। बिहार इसका सबसे बड़ा उदाहरण हो सकता है जहां गठबंधन बुरी तरह पराजित हो गया।

सत्ताधारी जिन मुद्दों पर चुनाव में गए कांग्रेस उनकी काट नहीं ला पाई
इसके अलावा यह भी देखने की बात है कि सत्ताधारी जिन मुद्दों पर चुनाव में गया था, उसकी काट कैसे कोई पार्टी प्रस्तुत कर सकती थी। उसे केवल जनता के साथ संवाद करके ही किया जा सकता था जिसका अभाव कांग्रेस में दिखा। यह सही है कि राहुल गांधी ने बहुत सारी सभाएं कीं, लेकिन केवल सभाओं से वह काम नहीं होना था और नहीं हो सका। अब एक बार फिर पार्टी के पास मौका है जिसका उपयोग अगर समग्र नेतृत्व चाहे तो कर सकता है। बाहर के उचित सवालों के जवाब खोजें जाएं और अंदरूनी तकरार से बाहर निकलकर उन जरूरतों को चिन्हित किया जाए, संगठन निर्माण की जिम्मेदारी ऐसे लोगों को दी जाए जिनमें कुछ करने का जज्बा हो, लोगों के साथ जीवंत संपर्क का कार्यक्रम बनाया और विरोधियों के सवालों का सटीक जवाब दिया जाए, तो चीजें बदल सकती हैं। देखने की बात यह होगी कि क्या कांग्रेस और कांग्रेसी खुद को इसके लिए तैयार कर पाते हैं अथवा नहीं।












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