फसलों को जलवायु परिवर्तन से सुरक्षित रखने के लिए क्या कर रहे हैं वैज्ञानिक? जानिए
जलवायु परिवर्तन जिस तरह से अपना रूप दिखाने लगा है, उससे कभी-कभी खाद्य सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। लेकिन, कृषि वैज्ञानिक इस चिंता को दूर करने में जुट चुके हैं।

जलवायु परिवर्तन की वजह से पूरी दुनिया में अप्रत्याशित मौसम की घटनाएं तेजी से बढ़ने लगी हैं। लेकिन, भारत में इसकी मार सबसे ज्यादा किसान झेल रहे हैं। उनकी फसलें कभी बहुत ज्यादा गर्मी के चपेट में आ जाती है तो कभी शीतलहर के चलते चौपट हो जाती हैं। जिस साल सबकुछ ठीक रह जाता है तो बेमौसम की बारिश सब तबाह कर जाती है। ऐसे में क्लाइमेट-प्रूफ फसल विकसित करने की चर्चा हो रही है।

मौसम की बेईमानी से पैदावार प्रभावित
जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम के मिजाज अजीब ढंग से बदलने की संख्या बढ़ गई है। फरवरी औसत से ज्यादा गर्म हो गया और मार्च में अप्रत्याशित बारिश ने रबी फसलों के लिए संकट की स्थिति पैदा कर दी। मौसम के साथ नहीं देने से पैदावार और फसलों की गुणवत्ता पर असर पड़ा है।

वैकल्पिक रणनीति अपनाने की जरूरत- किसान नेता
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक अखिल भारतीय किसान सभा के उपाध्यक्ष इंदरजीत सिंह ने कहा है जलवायु परिवर्तन भारतीय कृषि पर खतरनाक प्रभाव डाल रहा है। उनके मुतबाकि, 'समय की मांग वैकल्पिक रणनीति अपनाने की है, जो कि किसान खुद से विकसित नहीं कर सकते।'

जलवायु-प्रूफ बीज विकसित करने की आवश्यकता पर जोर
उनके मुताबिक मौसम की अप्रत्याशित घटनाओं से निपटने के लिए न सिर्फ खेती के पैटर्न बदलने की आवश्यकता है, बल्कि ऐसे बीज तैयार करने की भी जरूरत है, जो कि अत्यधिक गर्मी को भी झेल सके। लेकिन, तथ्य ये है कि कृषि वैज्ञानिक इस विषय पर पहले से ही काम कर रहे हैं।

गेहूं उत्पादन पर 1 से 2% का असर-कृषि वैज्ञानिक
यही वजह है कि हरियाणा के करनाल स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ व्हीट एंड बार्ली रिसर्च के डायरेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह को यकीन है कि साल 2023 में देश में गेहूं का कुल उत्पादन उम्मीद से भी ज्यादा बढ़िया होगा। उन्होंने कहा कि 'पूरे देश में औसतन नुकसान 1 से 2% से अधिक नहीं हुआ है।'

'देर से बुवाई की वजह से हुआ फायदा'
उन्होंने बताया कि 'उसी दौरान मार्च और अप्रैल के पहले हफ्ते में कम तापमान उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में देर से बुवाई वाले क्षेत्रों में पैदावार बढ़ा दिया है, जहां गन्ने के बाद गेहूं की जाती है। इन इलाकों में पैदावार में 5% की बढ़ोतरी हुई है। इसलिए हमें उम्मीद है कि कुल उत्पादन उम्मीद से कहीं अधिक रहेगा।'
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नई वैरायटी पर काम करने की जरूरत
लेकिन, इंस्टीट्यूट के सारे वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के खतरे से चिंतित हैं। किसी साल अत्यधिक गर्मी हो जाती है, कभी ठंड ही ज्यादा दिनों तक रह जाता है और कभी बेमौसम बारिश शुरू हो जाती है। इसलिए इन्होंने भी महसूस किया है कि इससे बचने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए जलवायु परिवर्तन की स्थिति के मुताबिक फसलों की वैरायटी विकसित करना जरूरी है।

गेहूं-जौ की 6 से 7 बेहतर वैरायटी हो चुकी है विकसित
पिछले पांच वर्षों में इंस्टीट्यूट ने गेहूं और जौ की 6 से 7 वैरायटी विकसित की हैं, जो विभिन्न जलवायु में पैदा की जा सकती है और बेमौसम बारिश के बावजूद पैदावार को सुरक्षित रखा जा सकता है। सिंह ने कहा, 'पिछले साल जब हमने बीजों का ऑनलाइन वितरण शुरू किया, डिमांड इतनी ज्यादा थी कि एक दिन हमारा वेबसाइट क्रैश कर गया। एक ही दिन में 20,000 रजिस्ट्रेशन हो गए थे।'
कृषि अर्थशास्त्री रेमंड गुइटर्स ने देश के 200 जिलों का अध्ययन करके अनुमान लगाया है कि 2010-2039 के बीच जलवायु परिवर्तन की वजह से खेती पर बहुत ज्यादा नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसके चलते 1.5% जीडीपी प्रभावित हो सकती है।
गेहूं का कुल उत्पादन उम्मीद से बेहतर रहने की उम्मीद
आईआईडब्ल्यूबीआर इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च के तहत कार्य करता है और इसके मुताबिक प्रतिकूल मौसम के बावजूद इस बार गेहूं का उत्पादन देश में 112 मिलियन टन के मुकाबले 115 मिलियन टन तक हो सकता है।
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