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चंद्रयान-3: मिशन की इनसाइड स्टोरी, कैसे विश्व पटल पर बढ़ी धाक और देशवासियों का आत्मविश्वास

भारतवासियों के लिए चंद्रयान मिशन के कई बड़े मायने हैं। चंद्रयान-3 मिशन की सफलता से यह सिद्ध हुआ है कि भारत को साइंस और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में कमतर नहीं आँका जाना चाहिए। इस मिशन ने कई तरह के मिथक तोड़े हैं। भारतवासियों और भारतवंशियों के मस्तिष्क से नकरात्मकता को धराशाई किया है। यह साफ़ किया है कि भारत में साइंस और तकनीकी शिक्षा उन बढ़े मापदंडों को हासिल कर चुकी है जिसके चलते भारत में शिक्षित प्रतिभाओं को भारत में ही ऐसा शोधोन्मुखी इंफ्रास्टक्चर भी उपलब्ध है जिसके बल पर ये वैज्ञानिक अंतरिक्ष में भारतीय तिरंगा लहरा रहे हैं।

किस किसको जाता है श्रेय
लेकिन यह बात इतनी भी सरल नहीं है कि सिर्फ इन चार वाक्यों से इस सफलता को बयां किया जा सके। इसके लिए सफलता के उस संघर्ष को परत दर परत खोलना होगा। जिस गहरे और दृढ़ निश्चय के साथ यह मिशन साल दर साल आगे बढ़ा, उसमें सबसे बड़ा श्रेय इसरो के वैज्ञानिकों की टीम को जाता है लेकिन इस बात को भी समझना होगा कि किसी देश के संस्थानों की सक्रियता, उद्देश्य और सफलता में राजनीतिक नेतृत्व की रणनीति, दूरदर्शिता, मंशा और उत्साह की भी बहुत बड़ी भूमिका होती है। क्योंकि यही वह कारण होता है जिससे प्रतिभाओं को खुलकर काम करने के लिए आसानी से बजट और उससे भी बड़ी बात यह कि अनुकूल वातावरण मिलता है।

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चंद्रयान-2 घटना पर देश के रुख ने रखी नींव
यह तब और महत्वपूर्ण हो जाता है जब चंद्रयान-2 जैसे मिशन की सफलता को लेकर वैज्ञानिक जी जान से जुटे हों, पूरा देश टकटकी लगाए उनकी ओर देख रहा हों और अचानक असफलता का झटका लगे। तब एक पल भी गंवाए बिना देश का मुखिया वैज्ञानिकों की टीम के मुखिया की पीठ पर हाथ रखे और गले लगाकर हौसला देकर वे वाक्य बोले जिससे असफलता से कंधे झुकने के बजाय उनमें भविष्य के लिए उत्साह भर दें। वैज्ञानिकों ने जितना किया उसका महत्व देश की जनता को साफ़ साफ पता लगे, जनता वैज्ञानिकों के साथ खड़ी तालियां बजाकर गर्व से मान चुकी हो कि हमारे वैज्ञानिक इस असफलता से हार नहीं मानने वाले हैं, यह पूरी असफलता भी नहीं है।

इसरो के वैज्ञानिक देश के भरोसे पर खरे उतरे
हमारे वैज्ञानिकों ने वह हासिल कर लिया है जिसके बाद उनका अगला कदम सफलतापूर्वक चाँद पर होगा। देश की जनता और सरकार के इस विश्वास और सपने को अब वैज्ञानिकों ने आखिर 23 अगस्त 2023 की शाम को सच साबित भी कर दिया है।

दुनिया ने देखा कि हम विज्ञान संस्कृति के लिए कितने एकजुट
एक देश के रूप में हम कितने एकजुट हैं यह दुनिया ने देखा। 23 अगस्त 2023 की शाम लैंडर विक्रम के चन्द्रमा पर लैंड करने की कवायत के समय से पहले ही देश के लोग मंदिर, मस्जिद, बैंक, स्कूल, रेस्टोरेंट, ऑफिस, बस, ट्रेन या कार यानि कि जो जिस हाल में था, जिसकी जैसे भी जुगाड़ बनी, दिल थामकर दुआओं के साथ मोबाइल, टीवी और कम्प्यूटर की स्क्रीन पर ऐसे आँखे गढ़ाए देखता रहा कि जैसे पलक झपकना भी गवारा न हो। इसको इसरो के सिर्फ यूट्यूब चैनल पर लाइव प्रसारण से समझ सकते हैं, एक वक्त पर इसे 55 मिलियन से ज्यादा लोग लाइव देख रहे थे। बाकी अन्य माध्यमों पर दर्शकों और पाठकों के आंकड़े अलग रहे।

भारत में वैज्ञानिकों को जनता और राजनितिक दल रखते हैं सिर माथे
भारत जिस पर कभी खुद की तकनीकी विकसित करने के मामले में प्रश्नचिन्ह लगते रहे हों, उसने आजादी के बाद से धीरे धीरे सधे क़दमों से विकास की निरंतरता को बनाये रखा। इसमें कई बार देश को ऐसा नेतृत्व भी मिला जिसने वैज्ञानिकों को दुनिया की चुनौतियों से डरे बगैर खुलकर काम करने का वातावरण दिया। वहीं कभी सांप सपेरों की तस्वीरों तक देश की छवि गढ़ने वालों को विज्ञान और तकनीकी की तरक्की के लिए पिछले कुछ दशकों में भारतीयों का संकल्प भी देखना पड़ा और स्वीकार करना पड़ा।

महान वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम की लोकप्रियता बड़ा प्रमाण
यही वजह थी कि 4 दशक तक इसरो और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानि डीआरडीओ में सेवाएं देकर भारत को परमाणु परीक्षण कर परमाणु शक्ति और कई मिसाइलें देने वाले अवुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम जिन्हें हम एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से जानते हैं, उन्हें देश के सत्ताधारी दल बीजेपी और प्रमुख विपक्ष इंडियन नेशनल कांग्रेस दोनों का समर्थन मिला। लिहाजा एपीजे अब्दुल कलाम 2002 में देश के ऐसे राष्ट्रपति बने जो बेहद लोकप्रिय रहे।

भारत के ऐसे बढ़े अंतरिक्ष में कदम
चंद्रयान-3 की आज की सफलता के पीछे ऐसे ही कई महान वैज्ञानिकों के दशकों चले अथक प्रयास हैं। लिहाजा विक्रम और रोवर क्या करेंगे यह जानने से पहले एक नजर भारत ने कब कैसे कदम दर कदम अंतरिक्ष में आगे बढ़ाये उस पर भी कर लेते हैं।
यह हैं भारत के महत्वपूर्ण अंतरिक्ष की ओर बढ़े कदम

=> 15 अगस्त, 1969 को इसरो का गठन
=>आर्यभट्ट, भारत का पहला उपग्रह, 19 अप्रैल 1975 को अंतरिक्ष में भेजा गया। इसमें तत्कालीन सोवियत संघ ने सहायता की।
=>भारत का दूसरा उपग्रह भास्कर 7 जून 1979 को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया।
=>1980 में पहली बार भारत-निर्मित प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 द्वारा रोहिणी उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया गया।
=>जनवरी 2014 में इसरो ने प्रक्षेपण में एक स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन का सफलतापूर्वक प्रयोग किया।
=>इसरो ने 22 अक्टूबर 2008 को चंद्रयान-1 सफलतापूर्वक भेजा।
=>24 सितम्बर 2014 को मंगल आर्बिटर मिशन के तहत मंगल ग्रह की परिक्रमा करने वाला मंगलयान सफलतापूर्वक भेजा।
=>इसरो ने एस्ट्रोसैट के रूप में 29 सितंबर 2015 को भारत की पहली अंतरिक्ष वेधशाला स्थापित की।
=>अब तो इसरो कई देशों के 50 से ज्यादा उपग्रह लांच कर करोड़ों डॉलर कमा रहा है।
इसके बाद की 2019 की चंद्रयान-2 की कहानी ज्यादा पुरानी नहीं है और अब हम चंद्रयान-3 की सफलता के साथ विश्व की नजर में अंतरिक्ष में भी बड़ी शक्ति के रूप में पहचान बना चले हैं। अब नजर डालते हैं कि-

क्या करेंगे विक्रम और रोवर
आज हमारा विक्रम और रोवर मिशन चंद्रयान 3 की सफलता के साथ चाँद की सतह पर है। पूरी उम्मीद है कि एक चंद्र दिवस यानि पृथ्वी के 14 दिवस से भी ज्यादा समय तक रहकर अपने खोजी उद्देश्य को पूरा करेगा। रोवर के पहिये भारतियों के मन को सुकून देने वाला काम यानि चाँद की सतह पर अशोक स्तंभ और ISRO के लोगो की छाप छोड़ने के अलावा और क्या क्या खास करेगा यह जानते हैं।
=>रोवर विक्रम से बाहर आ चुका है, माना जा रहा है कि जल्द ही हमारे सामने रोवर के द्वारा ली गई विक्रम की तस्वीर और विक्रम द्वारा ली गई रोवर की तस्वीर होगी।
=>इससे चन्द्रमा की सतह का प्लाज्मा घनत्व देखा जायेगा
=>लैंडर में लगा एक विशेष उपकरण चन्द्रमा की सतह के तापीय गुणों की जानकारी एकत्र करेगा।
=>चाँद पर मनुष्य रह सकता है या नहीं इसके लिए यह जानना जरुरी है कि उस पर भूकम्पीय गतिविधि कैसी है। इसकी पहचान सिस्मोग्राफी से होती है। विक्रम में लगा एक खास उपकरण इंस्ट्रुमेंट फॉर लूनर सिस्मिक एक्टिविटी यानि आईएलएसए यही काम करेगा।
=>इसके अलावा चन्द्रमा की सतह पर कैसे रासायन हैं और सतह के अंदर की गतिविधि कैसी है यह भी परखेंगे।

सफलता का परचम क्या दे सकता है ?
जाहिर है यह सफलता साधारण नहीं है। जब विश्व पटल पर एक देश के रूप में सफलता का परचम लहराता है तो सफलता का भाव एक संस्कृति का विकास करता है। इसे हम देश का प्रमुख खेल बन चुके क्रिकेट की कहानी से भी समझ सकते हैं। आज हम क्रिकेट की महाशक्ति हैं लेकिन इस खेल का बादशाह बने रहने की निरंतरता देश के खिलाडियों के जूनून से आती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि देश में क्रिकेट के प्रति यह जूनून 1983 में दो बार की विश्व विजेता वेस्टइंडीज को हराकर विश्वविजेता बनने के बाद आया। जिसके बाद एक ऐसी क्रिकेट की संस्कृति का विकास हुआ कि आज क्रिकेट के हर आंकड़ों में भारतीय खिलाडियों का दबदबा है और हम उसके बाद दो बार फिर विश्व विजेता बन चुके हैं।

वैज्ञानिक संस्कृति और विश्व का नेतृत्व
चंद्रयान-3 की सफलता के लिए जिस तरह का जूनून बच्चे, बूढ़े, जवान और हर वर्ग में देखा गया है। उम्मीद है कि ऐसी सफलताओं की पुनरावृत्ति भारत में विज्ञान और टेक्नोलॉजी को लेकर बच्चे बच्चे में ऐसी संस्कृति का विकास और जूनून पैदा कर कर देंगी कि भारतीय अंतरिक्ष सहित कई अन्य क्षेत्रों में मानव कल्याण के लिए तकनीकि विकसित कर विश्व का नेतृत्व करेंगे।

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