• search
क्विक अलर्ट के लिए
अभी सब्सक्राइव करें  
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

Chandrayaan-2 चंद्रमा पर लैडिंग से मात्र 11 कदम दूर, आगे जानिए किन चुनौतियों से होगा दो चार

|
Google Oneindia News
    Chandrayaan-2: इतिहास रचने से 11 दिन दूर, चांद की दूसरी से तीसरी कक्षा में पहुंचा | वनइंडिया हिंदी

    बेंगलुरु। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने बुधवार को चंद्रयान-2 को चंद्रमा की तीसरी कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश करवाया। चंद्रयान-2 को चांद की सबसे करीबी कक्षा तक पहुंचाने के लिए चार कक्षीय बदलाव किए जाने थे जिनमें तीन बदलाव पूरे हो चुके हैं। मिशन का अगला जरूरी पड़ाव दो सितंबर को होगा। इस चरण में चंद्रयान 2 का एक साथी अपने दो साथियों से अलग होकर काम करना आरंभ करेगा। चंद्रयान का यह साथी आर्बिटर है जो दो सितंबर को विक्रम लैडर से अलग हो जाएगा। इसके बाद लैंडर विक्रम अपने भीतर मौजूद प्रज्ञान रोवर को लेकर चांद की ओर बढ़ना शुरू करेगा।

    chandyan2

    बता दें चंद्रयान 2 बीती 20 अगस्त को चंद्रमा की पहली जबकि 21 अगस्‍त को दूसरी कक्षा में प्रवेश किया था। इसके बाद 28 अगस्त को चंद्रयान-2 को चंद्रमा की तीसरी कक्षा में प्रवेश किया था। इसरो के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-2 को चांद की तीसरी कक्षा में सुबह 09.04 बजे प्रवेश कराया। इसके बाद चंद्रयान-2 178 किलोमीटर की एपोजी और 1411 किलोमीटर की पेरीजी में चंद्रमा का चक्‍कर लगाना है। चंद्रयान-2 ने 26 अगस्त को दूसरी बार चांद की तस्वीरें भेजी थीं। भेजी गई तस्वीरें चांद की सतह से 4375 किमी ऊपर से ली गई हैं। यह तस्वीरें चांद पर मौजूद क्रेटर्स (गड्ढों) की हैं। इनमें से एक फोटो 'मित्रा' की है। 22 अगस्त को भी चंद्रयान-2 ने अपोलो क्रेटर की तस्वीर भेजी थी।

    इसरो वैज्ञानिकों के लिए अगली चुनौती

    इसरो के वैज्ञानिकों और चंद्रयान के लिए दो सितंबर की तारीख भी बहुत महत्पूर्ण है। वैज्ञानिकों के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती यान की गति को कम करने के साथ साथ आर्बिटर को भी नियंत्रित करने की होगी। यानी वैज्ञानिकों को एक साथ आर्बिटर और लैंडर विक्रम की सटीकता के लिए काम करते रहना होगा।

    orbiter

    ऑर्बिटर एक साल तक काम करेगा

    चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद ऑर्बिटर एक साल तक काम करेगा। बता दें ऑर्बिटर का काम पृथ्वी और लैंडर के बीच कम्युनिकेशन करना है। इसके अलावा ऑर्बिटर चांद की सतह का नक्शा तैयार करेगा, ताकि चांद के अस्तित्व और विकास का पता लगाया जा सके। यानी कि आर्बीटर अगल होते ही अपना ये काम आरंभ कर देगा। इसरो अध्यक्ष के. शिवन के मुताबिक, चंद्रयान के तीन हिस्से में से एक ऑर्बिटर चांद का चक्कर लगाता रहेगा। वहीं बाकी दो हिस्से लैंडर "विक्रम" और रोवर "प्रज्ञान" चांद पर एक दिन (पृथ्वी के 14 दिन के बराबर) काम करेंगे।

    lander

    7 सिंतबर को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर साफ्ट लैंडिंग कर रचेगा इतिहास

    04 सितंबर को लैंडर विक्रम चांद के सबसे नजदीकी कक्षा में 35x97 होगा। अगले तीन दिनों तक लैंडर विक्रम इसी कम दूरी से चंद्रमा का चक्कर लगाता रहेगा। इस दौरान विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर की जांच की जाती रहेगी। इस तरह लैंडर और उससे जुड़ा रोवर सात सितंबर को तड़के 1.55 बजे अलग होकर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरेगा। लैंडर विक्रम दो गड्ढों, मंजि‍नस सी और सिमपेलियस एन के बीच वाले मैदानी हिस्‍से में लगभग 70° दक्षिणी अक्षांश पर सफलतापूर्वक लैंडिंग करेगा। चंद्रमा की सतह पर लैंडिंग के समय लैंडर विक्रम की रफ्तार दो मीटर प्रति सेकंड होगी। इस दौरान 15 मिनट बेहद तनावपूर्ण होंगे। सुबह 3.55 बजे लैंडिंग के करीब दो घंटे के बाद लैंडर विक्रम से छह पहियों वाला प्रज्ञान रोवर चांद की सतह पर उतरेगा। सात सितंबर को सुबह 5.05 बजे रोवर प्रज्ञान का सोलर पैनल खुलेगा जिसके जरिए उसे काम करने के ऊर्जा मिलेगी। लैंडर और रोवर चांद पर एक दिन (पृथ्वी के 14 दिन के बराबर) काम करेंगे। लैंडर यह जांचेगा कि चांद पर भूकंप आते हैं या नहीं।

    rover

    लैंडिंग के 15 मिनट के अंदर मिलने लगेगी तस्वीरें

    रोवर प्रज्ञान चंद्रमा की सतह पर एक सेंटीमीटर प्रति सेकंड की गति से 14 दिनों तक चलने वाली अपनी यात्रा शुरू करेगा। यात्रा शुरू करने के 15 मिनट के भीतर ही इसरो को लैंडिंग की तस्वीरें मिलनी शुरू हो जाएंगी। रोवर प्रज्ञान 14 दिनों में कुल 500 मीटर की दूरी तय करेगा। इसके बाद यह निष्‍क्रिय हो जाएगा। प्रज्ञान से पहले चांद पर पांच रोवर भेजे गए हैं। इन्‍हें सोवियत यूनियन, अमेरिका, चीन आदि ने भेजा था। दूसरी ओर ऑर्बिटर चंद्रमा की कक्षा में 100 किलोमीटर की ऊंचाई पर उसकी परिक्रमा करता रहेगा। इसके बाद रोवर भी लैंडर से अलग हो जाएगा और 500 मीटर के दायरे में चांद की सतह पर घूमकर कई प्रयोग करेगा। रोवर चांद की सतह पर खनिज तत्वों की मौजूदगी का पता लगाएगा।

    सॉफ्ट लैडिंग के सबसे महत्वपूर्ण पल

    चांद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में सॉफ्ट लैडिंग के लिए चंद्रयान-2 धीमी गति और ठहराव जैसी प्रक्रियाओं से गुजरेगा
    चंद्रमा पर सॉफ्ट लैडिंग सबसे महत्वपूर्ण क्षण होगा, इसरो ने यह पहले कभी नहीं किया है
    लैंडर के चांद की सतह पर उतरने के बाद प्रज्ञान नाम का रोवर बाहर निकलेगा
    इसके बाद रोवर अपने छह पहियों पर चलकर चांद की सतह पर अपने वैज्ञानिक प्रयोगों को अंजाम देगा

    chanyan2

    क्‍यों हैं भारत के लिए खास

    चंद्रयान 2 भारतीय चंद्र मिशन है जो पूरी हिम्‍मत से चाँद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में उतरेगा जहां अभी तक कोई देश नहीं पहुंचा है - यानी कि चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र। इसका मकसद, चंद्रमा के प्रति जानकारी जुटाना और ऐसी खोज करना जिनसे भारत के साथ ही पूरी मानवता को फायदा होगा। इन परीक्षणों और अनुभवों के आधार पर ही भावी चंद्र अभियानों की तैयारी में जरूरी बड़े बदलाव लाना है, ताकि आने वाले दौर के चंद्र अभियानों में अपनाई जाने वाली नई टेक्‍नॉलोजी तय करने में मदद मिले।

    हम चाँद पर क्यों जा रहे हैं?

    चंद्रमा पृथ्‍वी का नज़दीकी उपग्रह है जिसके माध्यम से अंतरिक्ष में खोज के प्रयास किए जा सकते हैं और इससे संबंध आंकड़े भी एकत्र किए जा सकते हैं। यह गहन अंतरिक्ष मिशन के लिए जरूरी टेक्‍नोलॉजी आज़माने का परीक्षण केन्‍द्र भी होगा। चंद्रयान 2, खोज के एक नए युग को बढ़ावा देने, अंतरिक्ष के प्रति हमारी समझ बढ़ाने, प्रौद्योगिकी की प्रगति को बढ़ावा देने, वैश्विक तालमेल को आगे बढ़ाने और खोजकर्ताओं तथा वैज्ञानिकों की भावी पीढ़ी को प्रेरित करने में भी सहायक होगा।

    चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव तक पहुंचना क्‍यों जरूरी ?

    चंद्रमा हमें पृथ्वी के क्रमिक विकास और सौर मंडल के पर्यावरण की अविश्वसनीय जानकारियां दे सकता है। वैसे तो कुछ परिपक्व मॉडल मौजूद हैं, लेकिन चंद्रमा की उत्पत्ति के बारे में और अधिक स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। चंद्रमा की सतह को व्यापक बनाकर इसकी संरचना में बदलाव का अध्ययन करने में मदद मिलेगी। चंद्रमा की उत्पत्ति और विकास के बारे में भी कई महत्वपूर्ण सूचनाएं जुटाई जा सकेंगी। वहां पानी होने के सबूत तो चंद्रयान 1 ने खोज लिए थे और यह पता लगाया जा सकेगा कि चांद की सतह और उपसतह के कितने भाग में पानी है।चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव विशेष रूप से दिलचस्प है क्योंकि इसकी सतह का बड़ा हिस्सा उत्तरी ध्रुव की तुलना में अधिक छाया में रहता है। इसके चारों ओर स्थायी रूप से छाया में रहने वाले इन क्षेत्रों में पानी होने की संभावना है। चांद के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के ठंडे क्रेटर्स (गड्ढों) में प्रारंभिक सौर प्रणाली के लुप्‍त जीवाश्म रिकॉर्ड मौजूद है।

    English summary
    Chandrayaan-2,Indian Space Research Organization, ISRO. lading on moom,
    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    For Daily Alerts
    तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
    Enable
    x
    Notification Settings X
    Time Settings
    Done
    Clear Notification X
    Do you want to clear all the notifications from your inbox?
    Settings X
    X