Caste Census: कर्नाटक के CM सिद्दारमैया रिपोर्ट जारी करने पर वाकई गंभीर हैं या समय काट रहे हैं?
Karnataka Caste Census report: कर्नाटक सरकार महीनों से अटके पड़ी जाति जनगणना रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिए अचानक सक्रिय नजर आ रही है। पहले गृहमंत्री जी परमेश्वरा ने यह संकेत दिए और सोमवार को खुद सीएम ने इसकी ओर इशारा किया है। लेकिन, सिद्दारमैया भ्रष्टाचार के जिन विवादों में उलझे हैं और उनका जातिगत विषयों पर जो पुरान रिकॉर्ड रहा है, उससे सवाल उठता है कि क्या वे वाकई इस बार गंभीर हैं या सिर्फ समय खींचना चाहते हैं।
कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष के जयप्रकाश हेगड़े ने इस साल 29 फरवरी को ही मुख्यमंत्री को सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक सर्वे (जाति जनगणना) रिपोर्ट दे दी थी। सोमवार को सीएम ने कहा है कि 'बहुत संभव' है कि कैबिनेट के सामने यह रिपोर्ट चर्चा के लिए 18 अक्टूबर को पेश किया जाए।

खुद ही दुविधा में दिख रही है सिद्दारमैया सरकार
पीटीआई के अनुसार उन्होंने कहा है, '...मुझे सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक सर्वे रिपोर्ट मिली है। मैं इसे कैबिनेट के सामने रखूंगा और चर्चा के बाद इसपर फैसला लिया जाएगा...मैंने विधायकों को भी बताया है कि इसे कैबिनेट के सामने रखा जाएगा...बहुत संभव है 18 अक्टूबर को... '। सीएम को तय करना है, फिर भी वह यकीनी तौर पर इसपर फैसला लेने की बात नहीं कह पा रहे हैं।
जबकि, उनके गृहमंत्री ने तो जोश में यहां तक कह दिया था कि हो सकता है कि कैबिनेट में भी चर्चा न हो और उससे पहले ही रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी जाए। यह सर्वे सिद्दारमैया ने ही अपने पिछले कार्यकाल में शुरू करवाई थी। लेकिन, कांग्रेस की जाति जनगणना वाली राजनीति के बावजूद पहले तो सरकार इस रिपोर्ट को स्वीकार करने में लटकाती रही और फिर मिल जाने के आठ महीने बाद ही विचारों में ही ली हुई है।
रिपोर्ट जारी करने की प्रतिबद्धता पर है संदेह!
इस वजह से भले ही अभी सिद्दारमैया सरकार कह रही है कि वह इसपर फैसला लेगी, लेकिन इसके संभावित प्रभावों को देखते हुए उनकी प्रतिबद्धता को लेकर संदेह पैदा हो रहे हैं। यही वजह है कि विपक्षी बीजेपी और जेडीएस इस मुख्यमंत्री से जुड़े विवादों से ध्यान भटकाने का हथकंडा बता रही है।
रिपोर्ट सार्वजनिक करने पर कांग्रेस में ही है दो फाड़
तथ्य यह है कि इस रिपोर्ट के सार्वजनिक किए जाने को लेकर कांग्रेस के अंदर ही दो फाड़ है। नेताओं और मंत्रियों का एक तबका इसे हर हाल में जल्द जारी करने के पक्ष में है, तो बहुत ही प्रभावशाली दूसरा तबका इसका उतना ही विरोध भी कर रहा है। मसलन,टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार से लेकर एमबी पाटिल और ईश्वर खांड्रे जैसे लोगों को इस रिपोर्ट पर सख्त आपत्ति है।
लिंगायतों और वोक्कालिगा समुदायों का क्या होगा?
इन नेताओं को लगता है कि इस रिपोर्ट का राजनीतिक प्रभाव बहुत ही विशाल और दूरगामी हो सकता है। इसकी वजह ये है कि इस रिपोर्ट के कुछ तथ्य पहले लीक हुए थे, जिसके मुताबिक कर्नाटक के दोनों ही प्रभावशाली और दबंग समुदायों लिंगायतों और वोक्कालिगा की आबादी इसमें कथित तौर पर 10% से भी कम बताई गई है। जबकि, इनकी आबादी अब तक क्रमश: 17% और 14% मानी जाती है।
इस वजह से इन दोनों समुदायों के नेताओं को आशंका है कि अगर यह रिपोर्ट जारी हुई तो अबतक उन्होंने प्रदेश की राजनीति और समाज में जो दबदबा बना रखा है, उसकी मिट्टी पलीद हो सकती है। इसकी वजह से ये समुदाय करीब 5 दशकों से कल्याणकारी योजनाओं का भी बड़ा हिस्सा प्राप्त कर रहे हैं।
पुरानी वाली गलती दोहराएंगे सिद्दारमैया?
राहुल गांधी के जाति जनगणना वाले राग अलापने के बावजूद सिद्दारमैया के इसपर अबतक हाथ बंधे रहे हैं तो इसके पीछे यही वजह मानी जाती है। सिद्दारमैया वह बात भी नहीं भूले होंगे कि कैसे 2018 के विधानसभा चुनावों से पहले उन्होंने लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने की कोशिश की थी और उनका दांव उल्टा पड़ गया था और पार्टी हार गई थी।
सूत्रों का कहना है कि 'इसके चलते उन्हें जोखिम उठाने की जगह समय काटने के तरीके खोजने पर मजबूर होना पड़ सकता है, क्योंकि वे विभिन्न विवादों में उलझे हुए हैं।'












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