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राज ठाकरे का हिंदुत्व क्या बीजेपी को चुनौती दे सकता है?

राज ठाकरे
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पिछले कुछ दिनों से राज ठाकरे का आक्रामक हिंदुत्व चर्चा में है. मुंबई और ठाणे में रैली करने के बाद उन्होंने पुणे में हनुमान चालीसा पाठ में हिस्सा लिया और अब वह औरंगाबाद में एक रैली करने जा रहे हैं.

राज ठाकरे ने अक्षय तृतीया के मौके पर समूचे महाराष्ट्र में महाआरती पाठ का आह्वान भी किया है. इससे पहले वह अपनी पार्टी के तीन रंगों के झंडे को बदलकर भगवा कर चुके हैं.

अपनी राजनीति के बदलते रंग को दर्शाने के बाद उन्हें इस दिशा में वास्तविक रूप से कदम उठाने में काफी समय लगा है.

उनके इन कदमों से महाराष्ट्र की राजनीति अज़ान और हनुमान चालीसा के इर्द-गिर्द ही घूम रही है.

चिंता ज़ाहिर की जा रही है कि क्या इससे महाराष्ट्र में सामाजिक तनाव भी पैदा हो सकता है.

शुरुआत में महाराष्ट्र की सरकार और सत्ताधारी महा विकास आघाडी गठबंधन ने राज ठाकरे, उनके बयानों और उनकी रैलियों को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन जल्दी ही सरकार जवाब देती नज़र आने लगी.

सोशल मीडिया पर राज ठाकरे को लेकर चर्चाएं

राज ठाकरे के महाआरती का आह्वान करने का जवाब अपनी-अपनी आरतियां और इफ्तार पार्टी करके दिया जा रहा है.

शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी खासतौर पर राज ठाकरे पर जवाबी हमले कर रहे हैं.

राज ठाकरे के जून के शुरुआती दिनों में अयोध्या का दौरा करने की घोषणा के बाद अब आदित्य ठाकरे ने भी कहा है कि वह भी जल्द ही अयोध्या जा रहे हैं.

राज ठाकरे के समर्थक उन्हें नया हिंदू हृदय सम्राट कह रहे हैं. कोल्हापुर उप चुनाव के प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे को फर्ज़ी हिंदू हृदय सम्राट कह कर उन पर तंज़ कसा.

बहुत से लोग यह मान रहे हैं कि राज ठाकरे का हिंदुत्व को लेकर आक्रामक होना दरअसल उनके बीजेपी से हाथ मिलाने की तैयारी है.

मराठी मानुष का झंडा

कुछ लोगों का यह कहना है कि शिवसेना के कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से हाथ मिलाने के बाद अब बीजेपी राज ठाकरे के आक्रामक हिंदुत्व को शिवसेना के खिलाफ इस्तेमाल करने की रणनीति बना रही है.

बीजेपी यह दावा भी कर रही है कि शिवसेना ने हिंदुत्व की राजनीति को छोड़ दिया है. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना पहले से ही मराठी पहचान को लेकर आक्रामक है और बीजेपी इसका इस्तेमाल शिवसेना के खिलाफ कर सकती है.

शिवसेना हमेशा से ही मराठी मानुष का झंडा उठाने का दावा करती रही है.

सवाल यह है कि अपने आपको हिंदू जन नायक के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहे राज ठाकरे क्या शिवसेना के हिंदू वोटों को अपनी तरफ खींच पाएंगे या बीजेपी के हिंदुत्व वोट बैंक को प्रभावित करेंगे.

लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी और नरेंद्र मोदी की कामयाबी के पीछे हिंदुत्व एक अहम कारण रहा है.

महाराष्ट्र भी इसका अपवाद नहीं है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या राज ठाकरे का आक्रामक हिंदुत्व बीजेपी के हिंदुओं को उनकी तरफ आकर्षित करेगा? क्या वह बीजेपी के रास्ते में ही रुकावट बन सकते हैं?

बाल ठाकरे के साथ राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे
Getty Images
बाल ठाकरे के साथ राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे

शिवसेना कांग्रेस से बड़ी बन गई

ऐसा कहा जा रहा है कि राज ठाकरे अपने चाचा बाल ठाकरे के क़दमों पर चल रहे हैं. बाल ठाकरे ने भी मराठी पहचान की राजनीति शुरू की थी और फिर हिंदुत्व को अपना लिया था.

इतिहास में भी बीजेपी के लिए एक अहम सबक है. पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक ने मुंबई में वामपंथियों से निपटने के लिए शिवसेना को बढ़ावा दिया था.

आचार्य अत्रे ने तो शिवसेना को वसंतसेना कहा था. आखिरकार मुंबई पर वामपंथियों का प्रभाव कम हो गया और दत्ता सामंत हड़ताल के बाद मज़दूर आंदोलन भी समाप्त हो गया.

इसमें कांग्रेस की राजनीति ने भी अपनी भूमिका निभाई. इस दौरान और इसी प्रक्रिया में शिवसेना बड़ी होती चली गई.

और अंततः शिवसेना ने मुंबई के नगरपालिका चुनावों में कांग्रेस को हरा दिया. शिवसेना ने राज्य में भी अपनी ज़मीन को बढ़ाया और कुछ सालों बाद राज्य की विधानसभा और देश की संसद में शिवसेना कांग्रेस से बड़ी पार्टी हो गई.

अगर बीजेपी शिवसेना से निपटने के लिए दूसरे ठाकरे यानी राज ठाकरे का इस्तेमाल करने की रणनीति के बारे में सोच रही है तो उसे इसका ध्यान रखना चाहिए.

इतिहास खुद को दोहराएगा या नहीं इस बात पर निर्भर करेगा कि बीजेपी और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना एक-दूसरे की मदद के लिए किस हद तक जाते हैं.

राज ठाकरे
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हिंदुत्व की लहर और राज ठाकरे का करिश्मा

भारत की मौजूदा राष्ट्रीय राजनीति में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद दो सबसे शक्तिशाली ट्रेंड हैं. बीजेपी पूरे आत्मविश्वास के साथ इन दोनों पर सवार है. बीजेपी की कामयाबी चुनावों में उसके मुद्दों और चुनावों के नतीजों से साफ दिखती है.

दूसरी तरफ राज ठाकरे के पास उनका अपना एक करिश्मा है और वह बहुत अच्छे वक्ता हैं. बड़ी तादाद में लोगों को अपनी तरफ आकर्षित कर सकते हैं.

ऐसे में अगर राज ठाकरे महाराष्ट्र में हिंदुत्व का झंडा उठाते हैं तो यह एक प्रभावशाली मिश्रण हो सकता है. लेकिन सवाल यह है कि बीजेपी एक संगठन के तौर पर राज ठाकरे के नए राजनीतिक अवतार और हिंदुत्व वोट बैंक पर उनके प्रभाव को किस तरह देखती है.

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'मोदी से अधिक प्रभावी नहीं बन सकेंगे राज'

वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार संदीप प्रधान मानते हैं कि भले ही राज ठाकरे को उनके आक्रामक हिंदुत्व की वजह से लोग पसंद कर रहे हों और उनकी रैलियों में भारी भीड़ आ रही हो लेकिन हिंदू वोटर अपनी निष्ठा मोदी के प्रति ही रखेंगे.

प्रधान कहते हैं, "जहां तक मोदी के करिश्मे का सवाल है, राज ठाकरे हो या कोई भी अन्य क्षेत्रीय नेता वह उनसे पीछे ही रहते हैं. भाषण तो बहुत लोग देते हैं लेकिन मोदी काम करते हैं. यह मोदी की छवि है और राम मंदिर, अनुच्छेद 370 और तलाक जैसे मुद्दों से और मज़बूत ही हुई है. ऐसे में राज ठाकरे भाषण दें या उसे दिखाएं लेकिन जहां तक हिंदू राष्ट्र को बनाने का सवाल है तो मोदी ही वह व्यक्ति हैं जो वास्तव में कुछ कर सकते हैं-भारत के इलीट और मध्यम वर्ग हिंदू वोटरों की यही मान्यता है. अभी भी इस परिस्थिति में कोई भी इसे हिला नहीं सकता है. ऐसे में मुझे नहीं लगता कि राज ठाकरे बीजेपी को कोई नुकसान पहुंचा पाएंगे."

प्रधान कहते हैं, "दूसरी तरफ शिवसेना व्याकुल है. शिवसेना को फिर से अपना हिंदुत्व दिखाना पड़ रहा है और इससे उनके नए बने प्रगतिशील दोस्त दूरी बना सकते हैं. अंततः बीजेपी फिर से शिवसेना के करीब आ सकती है क्योंकि राज ठाकरे के पास मज़बूत पार्टी का संगठन नहीं है. सवाल उठता है कि राज ठाकरे के लिए वास्तव में कितने लोग वोट देंगे? जिस तरह 2019 के आम चुनावों में उनका इस्तेमाल किया गया था इस बार भी ऐसा ही होगा."

राजनीतिक पत्रकार मृणालिनी नानीवेदकर कहती हैं, "यह सच है कि हिंदुत्व की बस में भीड़ हो गई है. लेकिन लोगों को यह तय करना है कि किस पर भरोसा किया जा सकता है और किस पर नहीं. राज ठाकरे को पहले वोट मिल चुके हैं लेकिन तब राजनीति में मोदी का उभार नहीं हुआ था. अब मोदी सबसे बड़े ब्रांड हैं. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि राज ठाकरे बीजेपी और शिवसेना के वोटों को अपनी तरफ खींच पाएंगे या नहीं. कुछ लोग यह दावा कर रहे हैं कि बीजेपी राज ठाकरे को दिशा दिखा रही है. लेकिन हमें इस स्थिति को भी फिर से देखना होगा. मोदी एक अभिमानी नेता हैं और मुझे इस बात से हैरानी होती है कि बीजेपी किसी ऐसे नेता को मौका देगी जो मोदी की छवि को टक्कर दे सके."

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