ब्लॉगः पाकिस्तान में लड़के हॉस्टल में कैसे देखते थे श्रीदेवी की फ़िल्में?

श्रीदेवी
Getty Images
श्रीदेवी

ये तब की बात है जब मैं कराची यूनिवर्सिटी में दाखिल हुआ, एक साल बाद मुझे यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में कमरा मिला.

पहला काम ये किया कि अपना कमरा सेट किया, दूसरा काम ये किया कि श्रीदेवी के दो पोस्टर सदर जाकर ख़रीदे और उन्हें कमरे की दीवार पर आमने-सामने चिपका दिया.

ये तब की बात है जब भारतीय फिल्में वीसीआर पर देखना ग़ैरक़ानूनी था और पकड़े जाने पर तीन से छह महीने की सज़ा थी.

मगर लौंडे कहां मानने वाले थे, पैसे जोड़ जाड़कर वीसीआर किराये पर लाते साथ में छह फिल्में भी होतीं.

ये मुमकिन न था कि इनमें से कम से कम एक या दो फिल्में श्रीदेवी की न हों.

श्रीदेवी: चांदनी जो एक लम्हे में खो गई

आख़िर श्रीदेवी की मौत कैसे हुई?

जनरल ज़िया का दौर

'जस्टिस चौधरी', 'जानी दोस्त', 'नया कदम', 'आग और शोला', 'बलिदान', 'सल्तनत', 'मास्टरजी', 'जाग उठा इंसान', 'इंकलाब', 'अक्लमंद', 'नज़राना',

'आखिरी रास्ता', 'कर्मा', 'मक़सद', 'सुहागन', 'निगाहें', 'जाबांज़', 'तोहफ़ा', 'घर संसार', 'औलाद', 'सदमा', 'हिम्मतवाला', 'नगीना', 'मिस्टर इंडिया', 'चांदनी'.

हम श्रीदेवी की ग़ैरक़ानूनी भारतीय फिल्में और वो भी हॉस्टल के हॉल में सब दरवाज़े खिड़कियां खोलकर फुल वॉल्यूम के साथ देखा करते थे ताकि हॉस्टल के बाहर बनी पुलिस चौकी तक भी आवाज़ पहुंच जाए.

ये था हमारा प्रतिरोध जनरल ज़िया-उल-हक़ की तानाशाही के ख़िलाफ़.

कभी-कभी पुलिसवाले दबी-दबी जबान में हंसते हुए कहते, 'हम तुम्हारी भावनाएं समझते हैं, लेकिन आवाज़ थोड़ी कम कर लिया करो, कभी कोई टेढ़ा अफ़सर आ गया तो हमारी पेटियां उतरते देखकर तुम्हें अच्छा लगेगा क्या?'

रूप की रानी श्रीदेवी का निधन

वो 'लम्हे' वो 'चांदनी' और अब ये 'जुदाई' का 'सदमा'

श्रीदेवी की कोई फ़िल्म दिखा दो...

इन सिपाहियों की जगह हर तीन महीने बाद नए सिपाही आ जाते. पर एक सिपाही मुझे याद है, शायद जमील नाम था.

स्पेशल ब्रांच का था इसलिए वर्दी नहीं पहनता था. हॉस्टल की चौकी पर एक साल से ज़्यादा नियुक्त रहा.

जब उसने अपने ट्रांसफ़र का बताया तो हम चार-छह लड़कों ने कहा कि जमील आज तुम्हारी हॉस्टल की कैंटीन में दावत करते हैं.

वह कहने लगा, दावत छोड़ो श्रीदेवी की कोई फ़िल्म दिखा दो.

उस रात सिपाही जमील को सम्मान देने के लिए 'जस्टिस चौधरी' मंगवाई गई और पूरे सम्मान के साथ देखी गई.

'बॉलीवुड की अमावस हो गई, सिनेमा की चाँदनी चली गई'

'श्रीदेवी ने मुझे आख़िरी बार गले लगाया'

नब्बे के दशक में...

आज मैं 30-35 साल बाद सोच रहा हूं कि अगर श्रीदेवी न होती तो जनरल ज़िया-उल-हक़ की 10 साल पर फैली घुप्प तानाशाही हम लड़के कैसे काटते.

मैंने श्रीदेवी की आख़िरी फिल्म 'चांदनी' देखी, ज़िंदगी फिर जाने कहां से कहां ले गई.

श्रीदेवी को भी शायद पता चल गया था, इसलिए 90 के दशक में वो भी शाम के सूरज की तरह आहिस्ता-आहिस्ता नज़रों से ओझल होती चली गईं.

मैंने सुना की 'इंग्लिश-विंग्लिश' बहुत अच्छी फ़िल्म थी, फिर सुना कि 'मॉम' में श्रीदेवी ने कमाल का काम दिखाया.

मगर कल तो श्रीदेवी ने कमाल ही कर दिया, मगर न मुझे कोई दुख है न हैरत.

'मैं आज ज़िंदा हूं तो श्रीदेवी की वजह से'

जब श्रीदेवी ने कहा था, हम झाड़ियों के पीछे कपड़े बदलते थे

श्रीदेवी
AFP
श्रीदेवी

वैन गॉग के बारे में सुना है कि जब उन्हें अपनी कोई पेंटिंग बहुत ज़्यादा अच्छी लगने लगती तो वो उसे फाड़ दिया करते थे.

कल भी शायद यही हुआ श्रीदेवी की पेंटिंग शायद बनाने वाले को ज़्यादा ही भा गई.

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+