• search

ब्लॉग: ठीक कहा, मुल्क को पटवारी चलाता है या प्रधानमंत्री

By राजेश जोशी रेडियो संपादक, बीबीसी हिंद
Subscribe to Oneindia Hindi
For Quick Alerts
ALLOW NOTIFICATIONS
For Daily Alerts

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को अंदाज़ा है कि अगर पटवारी अड़ंगा लगा दे तो कीचड़ में फँसे विकास रथ को भी कोई निकाल नहीं पाएगा. इसीलिए उन्होंने लखनऊ में कहा कि मुल्क को या तो प्रधानमंत्री चलाता है या पटवारी.

    पटवारी को तो हमेशा अपनी ताक़त का एहसास था ही. उसे मालूम था कि अगर उसकी कृपा नहीं हुई तो तहसील की फ़ाइल जाम की जा सकती है. पर पिछले कई दशकों में पहली बार किसी प्रधानमंत्री को अपनी ताक़त का एहसास हुआ है बल्कि वो मंच से ऐलान भी करता है कि हमारे पास "इरादा भी है और ताक़त भी".

    जो बात पटवारी को सरकारी ओहदे के कारण मालूम थी अब पूर्ण बहुमत वाले प्रधानमंत्री को भी उस ताक़त का एहसास हो गया है. वरना मोदी से पहले खिचड़ी सरकारें चलाने की थकावट तमाम प्रधानमंत्रियों के चेहरे पर नज़र आती थी.

    ख़ैर है कि अपना अब तक किसी प्रधानमंत्री से कोई वास्ता नहीं पड़ा. दूर-दूर से देखा-देखी तो वीपी सिंह, एचडी देवेगौड़ा, पीवी नरसिंहाराव से ज़रूर हुई है मगर उस ज़ोन की दीवार को हम जैसे पत्रकार कभी भेद ही नहीं पाते जहाँ प्रधानमंत्री पास बिठाकर पूछें कि कैसे हो?

    पर एक पटवारी ने एक बार इस क़दर छकाया और थकाया कि आज तक उसका ख़्याल आने पर साँस चढ़ने लगती है.

    नरेंद्र मोदी और अनिल अंबानी
    AFP
    नरेंद्र मोदी और अनिल अंबानी

    प्रधानमंत्रियों का स्नेह-ज़ोन

    पर पटवारी से पहले बात प्रधानमंत्रियों के स्नेह-ज़ोन की जहाँ तक पहुँचने के लिए बहुत पहले से मशक्कत करनी पड़ती है. ऐसे नेताओं के बरामदों में बैठकर घंटों इंतज़ार करना पड़ता है जिनमें प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएँ देखी जा रही होती हैं. 'देशवासियों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे' टाइप के सवालों से भरपूर इंटरव्यू करने पड़ते हैं, ये साबित करना पड़ता है कि हम आप ही की कोटरी के हैं, ग़ैर ना समझ लेना.

    कई नामचीन पत्रकारों को आप आज भी प्रभावशाली नेताओं के बरामदे में इंतज़ार करते हुए देख सकते हैं.

    किसी दौर में अटल बिहारी वाजपेयी के घर फ़ोन करना होता था तो वो आसानी से फ़ोन पर आ जाते थे और खुल कर बात करते थे. कभी किसी सभा-समारोह में मिल जाते थे तो ठठा कर हँसते, और कई बार सीधा सवाल पूछने पर तुनक भी जाते थे.

    तुनके वो तब थे जब वो लखनऊ लोकसभा क्षेत्र से 1999 के आम चुनावों में पर्चा दाख़िल करने गए थे. उस दौर में भी बीजेपी के कुछ बयानवीर महात्मा गाँधी को निशाने पर ले लिया करते थे. ऐसे ही किसी नेता ने कह दिया कि भारत का कोई राष्ट्रपिता नहीं हो सकता.

    पर्चा दाख़िल करके निकल रहे प्रधानमंत्री वाजपेयी को भीड़ के बीच रोककर मैंने यही सवाल पूछ लिया. एक बार उन्होंने ही तो कहा था कि गाँधीवादी समाजवाद बीजेपी की विचारधारा है. हिंदुत्व, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे शब्द तब फ़ैशन में नहीं आए थे. इसलिए जब उन्हीं की पार्टी के लोग कह रहे हों कि भारत का कोई राष्ट्रपिता नहीं हो सकता तो सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए था.

    सवाल पर वो अचकचाए फिर दो पल को आँखें बंद करके बोले - जब देश का राष्ट्रपति हो सकता है तो राष्ट्रपिता होने में क्या बुराई है?

    उद्योगपतियों के साथ खड़ा होने से नहीं डरता: मोदी

    क्या नरेंद्र मोदी करन थापर से पुराना 'बदला' ले रहे हैं?

    मोदी राज में 'जीने का अधिकार' गायों के लिए: ओवैसी

    पर उन्हें तुरंत समझ में आ गया कि पत्रकार हेडलाइन तलाश रहा है, और वो तमकते हुए अँग्रेज़ी में बोले - बट, दिस इज़ ए लोडेड क्वेश्चन. यानी ये मासूमियत से किया गया सवाल नहीं है बल्कि इसके निहितार्थ हैं. वो नाराज़ दिख रहे थे.

    पर मई 1996 में जब वो पहली बार 13 दिन के लिए प्रधानमंत्री बने उस वक़्त पाकिस्तान में बेनज़ीर भुट्टो प्रधानमंत्री थीं. उस शाम 11 अशोक रोड के भारतीय जनता पार्टी के दफ़्तर में शाम को आलीशान प्रेस कॉन्फ़्रेंस की गई. आज स्वीकार करना पड़ेगा कि मेरे सवाल में शरारत का पुट छिपा था. मैंने सबसे अंत में उनसे पूछा: "अटल जी, आज की रात आप पड़ोसी मुल्क की अपनी (फिर मैं थोड़ा रुका) काउंटरपार्ट को क्या संदेश भेजने जा रहे हैं?"

    चिरकुँआरे अटल बिहारी वाजपेयी मेरा वाक्य होने से पहले ही समझ गए कि सवाल कहाँ जाकर गिरा है और दिल खोलकर हँसे. उनके साथ पूरा मीडिया हँसा. लेकिन फिर कुछ देर बाद उन्होंने गंभीर होकर भारत-पाकिस्तान रिश्तों के बारे में अपना नज़रिया सामने रखा.

    अब ऐसा मज़ाकिया सवाल - या फिर कोई गंभीर सवाल - किससे पूछा जाए? सोचते हुए भी झुरझुरी होती है. प्रधानमंत्री खुली प्रेस कॉनफ़्रेंस करते नहीं. साल में ज़रूर एक बार कुछ पत्रकार उनसे मिलते हैं और कुछ देर बाद बीजेपी दफ़्तर से हँसते-गाते निकलते हैं - 'सेल्फ़ी लेल्ली रे!'

    मोदी और मीडिया

    जो लोग नरेंद्र मोदी को उनके मुख्यमंत्री बनने से पहले से परिचित हैं वो जानते हैं कि मोदी अगर दर्पीले रहे भी होंगे तो उनके व्यवहार में दर्प क़तई नहीं झलकता था. जब मिलते थे तो ठहर कर, हँसकर मिलते थे और हाथ थामकर बात करते थे. ख़ास तौर पर पत्रकारों से उनके संबंध काफ़ी मधुर हुआ करते थे.

    करन थापर ने अपनी नई किताब 'डेविल्स एकवोकेट' में भी मोदी के बारे में यही लिखा है कि कैसे उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक कुप्प. सी. सुदर्शन से पूछने के लिए कैसे-कैसे मुश्किल सवाल सुझाए थे. मोदी संघ के चरित्र निर्माण में रचे पगे एक खाँटी राजनीतिक कार्यकर्ता थे जिन्होंने तब तक कथित "कड़े फ़ैसले" नहीं किए थे.

    मेरी पहली मुलाक़ात भी नरेंद्र मोदी से कुछ ऐसे ही माहौल में हुई जब उन्होंने गुजरात की राजनीति और उसमें बीजेपी की मामूली मौजूदगी को तसल्ली से बैठाकर समझाया था.

    तब तक वो गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं बने थे और तब तक गुजरात में गोधरा कांड नहीं हुआ था. तब तक अहमदाबाद के बाहर शायद ही किसी ने नरोदा पाटिया, बेस्ट बेकरी, गुलबर्ग सोसाइटी का नाम सुना था. तब तक नरेंद्र मोदी के नेतृत्व शक्ति का या उनके "डिसाइसिव" लीडर होने का कोई प्रमाण नहीं मिला था.

    फ़रवरी 2001 के बाद गुजरात बदला, देश बदला, बहुसंख्यक समुदाय की सोच बदली. और नरेंद्र मोदी बदले. उन्हें भविष्य में और कड़े फ़ैसले करने थे. गाँधीनगर से निकलकर लुटियंस दिल्ली में अपना परचम फहराना था.

    बहरहाल, बात हो रही थी प्रधानमंत्रियों और पटवारियों की. रविवार को लखनऊ में प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश की विकास गाथा का ख़ाका खींचते हुए कहा कि 'मैंने प्रदेश की जनता से वादा किया था कि जो प्यार आपने दिया है उसे सूद समेत वापिस करूँगा, और आज मैंने ये काम कर दिया है'.

    विज्ञापन में मोदी
    BBC
    विज्ञापन में मोदी

    गौतम अडानी और कुमारमंगलम बिड़ला जैसे उद्योगपतियों की संगत में उन्होंने कहा, "हम वो लोग नहीं हैं जी जो उद्योगपतियों के बग़ल में खड़े होने से डरते हैं. कुछ लोगों का आपने देखा होगा. उनकी एक फ़ोटो आप नहीं निकाल सकते किसी उद्योगपति के साथ."

    जब मोदी ये कहते हैं कि मैं उद्योगपतियों के साथ खड़ा होने से नहीं डरता तो वो अपनी पीठ पर मुकेश अंबानी के हाथ वाली तस्वीर को खम ठोंककर उचित ठहरा रहे होते हैं और काँग्रेस मार्का समाजवाद को कुछ और ज़मीन में गहरा गाड़ रहे होते हैं.

    मगर उद्योगपतियों के साथ मज़बूती से खड़े होते हुए भी मोदी पटवारी को नहीं भूले. उन्होंने कहा कि विकास प्रोजेक्टों के लिए योगी सरकार को ज़मीनें अधिग्रहीत करनी पड़ी होंगी पर वो काम भी सुगम गति से हो गया क्योंकि पटवारी ने अड़ंगा नहीं लगाया. "देश को या तो प्रधानमंत्री चलाता है या पटवारी."

    पटवारी कैसा अड़ंगा लगा सकता है ये मेरा दिल जानता है. रही बात प्रधानमंत्री की तो वो राहुल गाँधी से पूछिए.

    ये भी पढ़ें-

    मोदी गंगा की तरह शुद्ध हैं: रविशंकर प्रसाद

    राहुल ने ये भाषण देकर पीएम को दी 'झप्पी'

    नरेंद्र मोदी ख़ुद ही भ्रष्टाचार हैं: राहुल गांधी

    जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

    BBC Hindi
    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    English summary
    Blog either country runs the patwari or the prime minister

    Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
    पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

    X