Lok Sabha Election: गठबंधन BJP-JJP का टूटा और परेशान हो गई कांग्रेस! हरियाणा में चल क्या रहा है?
Haryana News: हरियाणा में मुख्यमंत्री बदल गया। बीजेपी-जेजेपी का गठबंधन टूट गया। लेकिन, कहीं से किसी को इसकी भनक तक नहीं लग पायी। भारतीय जनता पार्टी और जननायक जनता पार्टी का रास्ता अब अलग हो चुका है, लेकिन इनके बीच रिश्ते टूटते वक्त कोई कोलाहल नजर नहीं आई है।
दूसरी तरफ मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस है। वह दोनों ही दलों पर निशाना साथ रही है। इसे बीजेपी-जेजेपी का 'चालाकी भरा ड्रामा' बता रही है। राजनीति में यह बहुत ही दिलचस्प परिस्थिति है। आमतौर पर विपक्ष को सत्ताधारी दलों में फूट पड़ने पर खुशी होती है, लेकिन यहां तो कांग्रेस ही काफी परेशान लग रही है।

बीजेपी-जेजेपी गठबंधन टूटने से कांग्रेस परेशान
हरियाणा के पूर्व सीएम और राज्य में कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा, 'मैंने हाल में एक मीटिंग में कहा था कि बीजेपी-जेजेपी एक और गठबंधन ड्रामा करने वाले हैं। वह अब हुआ है। उन्हें महसूस हो चुका है कि चुनावों में जनता का सामना नहीं कर सकते, इसलिए इस्तीफे के ड्रामा से लोगों को बेवकूफ बनाने की कोशिश की है....'
प्रदेश की एक और दिग्गज कांग्रेस नेता और पार्टी महासचिव कुमारी शैलजा के मुताबिक, 'ये बदलाव का समय है। एक बार फिर से लोगों को गुमराह करने के लिए यह बीजेपी-जेजेपी का चालाकीपूर्ण ड्रामा है। न्याय के लिए लड़ाई जारी रहेगी।'
कांग्रेस को सता रही है जाट वोटों में बिखराव की चिंता
अगर सत्ताधारी गठबंघन टूटा है तो कांग्रेस को तो खुश होना चाहिए! लोकसभा चुनाव और कुछ महीने बाद होने वाले हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले यह भाजपा के लिए झटके की तरह होना चाहिए!
दरअसल, कांग्रेस की असली चिंता वह जाट वोट बैंक है, जिसके भरोसे वह हरियाणा में बाजी पलटने की उम्मीद में एक दशक से इंतजार में बैठी है।
2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिली थी बड़ी सफलता
2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी हरियाणा की सभी 10 लोकसभा सीटें जीत गई थी और उसे 58% से ज्यादा वोट मिले थे। इसकी वजह ये थी कि बालाकोट एयरस्ट्राइक की वजह से पार्टी को जाटों का भरपूर समर्थन मिला था।
राज्य में करीब 25% जाट आबादी सबसे मजबूत वोट बैंक है और हुड्डा परिवार की बदौलत कांग्रेस को उसमें से अधिकांश पर नजर रहता है।
विधानसभा चुनावों में भाजपा का वोट शेयर काफी गिर गया था
लेकिन, 2019 में लोकसभा चुनाव के कुछ ही महीने बाद विधानसभा के चुनाव हुए थे तो भाजपा का वोट शेयर घटकर 36.49% रह गया था। ऐसे में माली जाति से आने वाले नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बनाने का मतलब है कि बीजेपी ओबीसी आबादी में अपनी पैठ और बढ़ाना चाहती है।
ओबीसी वोट बैंक पर बीजेपी की नजर
चंडीगढ़-दिल्ली जीटी रोड के आसपास के इलाके में भारतीय जनता पार्टी पहले से ही मजबूत है। अब यह ओबीसी वोट बैंक के दम पर हरियाणा के अन्य इलाकों में भी अपना आधार मजबूत करना चाहती है।
जेजेपी के अलग होने से बिगड़ गया जाट वोट का समीकरण
ऐसे में मूलरूप से जाटों के समर्थन पर टिकी दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी का बीजेपी से गठबंधन टूटने का मतलब है कि हरियाणा में जाट वोटों का चार दलों में बिखराव!
हुड्डा परिवार के दम पर कांग्रेस जहां इसपर अपनी ज्यादा दावेदारी समझ रही थी। वहीं अब जेजेपी के अलग से लड़ने पर जाट वोटों का बंटवारा तय है। क्योंकि, अभय चौटाला की आईएनएलडी भी इसकी एक मजबूत दावेदार है। वहीं केंद्र से लेकर राज्य में सत्ताधारी भाजपा की भी इस बिरादरी में अपनी पैठ है ही।
आंकड़ों से समझ में आती है कांग्रेस की परेशानी
कांग्रेस की परेशानी को आंकड़ों से समझा जा सकता है। 2019 के लोकसभा चुनाव में हरियाणा में कांग्रेस को करीब 29%, जेजेपी को लगभग 5% और आईएनएलडी को करीब 2% वोट मिले थे। लेकिन, इनमें से कोई भी पार्टी एक भी सीट नहीं जीती थी।
उसी साल हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के वोट शेयर में जहां मामूली गिरावट हुई और वह करीब 28% रहा। पार्टी को 31 सीटें मिलीं। लेकिन, जेजेपी का वोट शेयर बढ़कर लगभग 15% हो गया और वह 10 सीटें जीत गई। आईएनएलडी के वोट शेयर में भी इजाफा हुआ और उसे 2.44% वोट के साथ 1 सीट भी मिल गई।
मतलब साफ है कि अगर लोकसभा चुनावों के मुकाबले भाजपा के वोटों में विधानसभा में भारी कमी आई तो फायदा कांग्रेस को मिलने की जगह जाट आधारित पार्टियां जेजेपी और आईएनएलडी को हुआ।
कांग्रेस की परेशानी इसी वजह से है। पार्टी को लगता है कि दोनों चुनावों के बाद फिर से दुष्यंत चौटाला बीजेपी के साथ जुड़ जा सकते हैं।












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