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चिराग की बात क्या करें ? इंदिरा गांधी के जमाने में तो सत्ता के प्रतीक थे PA

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नई दिल्ली, 22 जून। पशुपति कुमार पारस ने लोजपा में विभाजन के लिए चिराग पासवान के राजनीतिक सहायक सौरभ पांडेय को जिम्मेदार ठहराया है। पारस का आरोप है कि चिराग ने सौरभ पांडेय के प्रभाव में आ कर पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की। हालांकि सौरभ पांडेय का कहना है कि रामविलास पासवान उन्हें पुत्र की तरह मानते थे और उनकी इच्छा थी कि वे चिराग के सहयोगी बन रहें।

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क्या कोई राजनीतिक सलाहकार इतना शक्तिशाली हो सकता है कि वह पार्टी और सरकार में समानानंतर सत्ता कायम कर ले ? तो इसका जवाब है, हां। एक नहीं कई उदाहरण हैं। पंडित जवाहर लाल नेहरू के निजी सहायक यशपाल कपूर, इंदिरा गांधी के निजी सहायक आर के धवन, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के सहायक विंसेंट जॉर्ज, अटल बिहारी वाजपेयी के प्रमुख सचिव रहे ब्रजेश मिश्रा का ऐसा रुतबा था कि वे किसी राज्य के मुख्यमंत्री या केन्द्रीय मंत्री से भी अधिक शक्तिशाली थे। ऐसे लोग पर्दे के पीछे से काम करते हैं लेकिन नीति निर्माण में इनकी अहम भूमिका होती है। कई बार सत्ता प्रतिष्ठान में इनका कद नम्बर दो या तीन का हो जाता है।

नेहरू और इंदिरा गांधी के सहायक यशपाल कपूर

नेहरू और इंदिरा गांधी के सहायक यशपाल कपूर

यशपाल कपूर विदेश मंत्रालय में स्टेनो-टाइपिस्ट थे। टाइपिंग में उनकी शुद्धता और गति को लेकर अधिकारी उनसे खुश रहते थे। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, विदेश मंत्रालय भी अपने पास ही रखते थे। 1964 तक वे प्रधानमंत्री के साथ-साथ विदेशमंत्री भी थे। एक दिन प्रधानमंत्री नेहरू को विदेशनीति से संबंधित कोई डिक्टेश देना था। उन्हें एक योग्य स्टेनो की जरूरत थी ताकि वो जो बोलें उसका सही-सही टाइप हो सके। प्रधानमंत्री का आदेश विदेश मंत्रालय पहुंचा। विदेश मंत्रालय के सचिव ने यशपाल कपूर को प्रधानमंत्री नेहरू के पास भेज दिया। पंडित नेहरू ने यशपाल कपूर से कहा, वे अंग्रेजी में बोलेंगे जिसे सुन कर उन्हें उसी समय हिन्दी में टाइप करना है। यशपाल कपूर का जन्म पाकिस्तान में हुआ था। उन्हें अंग्रेजी के अलाव उर्दू आती थी। हिंदी की उन्हें जानकारी नहीं थी। उन्होंने अंग्रेजी में डिक्टेशन ले लिया। फिर एक पत्रकार मित्र की मदद से कुछ देर बाद उसे हिंदी में अनुवाद कर दिया। पंडित नेहरू को ये बात मालूम नहीं हुई। उन्हें अनुवाद पसंद आया। इसके बाद यशपाल कपूर ने खूब मेहनत की और हिंदी सीख ली। कुछ दिनों के बाद पंडित नेहरू यशपाल कपूर से बहुत प्रभावित हुए और उन्हें पीएमओ में रख लिया। धीरे-धीरे यशपाल कपूर नेहरू के करीबी हो गये। एक टाइपिस्ट के रूप में काम करने वाले यशपाल कपूर पीएमओ में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी बने। फिर वे कांग्रेस पार्टी के नेता बन गये। बाद में कंग्रेस ने उन्हें राज्यसभा का सांसद भी बनाया।

इंदिरा गांधी और आरके धवन

इंदिरा गांधी और आरके धवन

आर के धवन यानी राजेन्द्र कुमार धवन यशपाल कपूर के भांजा थे। आर के धवन का जन्म भी पाकिस्तान में हुआ था। उनका परिवार शरणार्थी के रूप में दिल्ली आया था। पढ़ाई पूरी करने के बाद आर के धवन ने मामा की तरह शॉर्ट हैंड और टाइपिंग सीख कर अपना करियर बनाने की सोची। तब तक यशपाल कपूर का राजनेताओं से अच्छा सम्पर्क हो चुका था। उन्होंने अपने भांजे आर के धवन को आकाशवाणी में स्टेनो-टाइपिस्ट की नौकरी दिला दी। 1959 में इंदिरा गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थीं। जवाहर लाल नेहरू की सरपरस्ती में उनका राजनीतिक जीवन परवान चढ़ रहा था। 1962 में इंदिरा गांधी को न्यूयॉर्क वर्ल्ड फेयर कमेटी का चेयरमैन बनाया गया था। यह एक अंतर्राष्ट्रीय आयोजन था। इंदिरा गांधी को एक ऐसे ऑफिस सहायक की जरूरत थी जो संवादों के आदान प्रदान के लिए चिट्ठी टाइप कर सके और ऑफिस भी संभाल सके। यशपाल कपूर को ये बात मालूम हुई तो वे अपने भांजे आर के धवन को लेकर इंदिरा गांधी के पास पहुंचे। इंदिरा गांधी ने थोड़ी जांच-पड़ताल की। धवन एक मिनट में 100 से अधिक शब्द टाइप कर रहे थे। अंग्रेजी भी शानदार थी। टाइप में एक भी गलती नहीं निकली। इंदिर गांधी ने उसी दिन आर के धवन को अपना निजी सहायक बना लिया। फिर तो उनकी दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की होती गयी।

आर के धवन की हैसियत

आर के धवन की हैसियत

आर के धवन ने इंदिरा गांधी के प्रति अटूट वफादारी दिखायी। देखते ही देखते वे टाइपिस्ट से इंदिर गांधी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी बन गये। इंदिरा गांधी भी उन पर आंख मूंद कर भरोस करने लगीं। 1966 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो उनके निजी सहायक आर के धवन की जिम्मेवारियां बढ़ गयीं। 1971 में जब इंदिरा गांधी बड़ी जीत के साथ सत्ता में लौटीं तो आर के धवन एक शक्तिशाली सहायक के रूप में उभरने लगे। वे इंदिरा गांधी की पसंद ना पसंद से वाकिफ थे। उनके मन मिजाज को बखूबी भांप लेते थे। अगर किसी नेता या आइएएस अधिकारी को इंदिरा गांधी से मिलना होता था तो पहले आर के धवन से इजाजत लेनी पड़ती थी। फिर इंदिरा गांधी अपने राजनीतिक संदेश धवन के मार्फत ही देने लगीं। इसके बाद धवन को प्रधानमंत्री इंदिर गांधी के बाद दूसरा सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माना जाना लगा। राज्यों के मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्री उनका फोन सुन से घबरा जाते थे। जब इमरजेंसी लगी तो संजय गांधी ने आर के धवन के साथ मिल कर सरकार चलायी। आर के धवन और संजय गांधी ने ही मिल कर उन नेताओं की सूची बनायी थी जिन्हें इमरजेंसी लागू होने की रात गिरफ्तार किया जाना था।

धवन के जीवन में उतार चढ़ाव

धवन के जीवन में उतार चढ़ाव

1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो धवन भी वहीं मौजूद थे। उन्हें एक भी गोली नहीं लगी थी। कंग्रेस के कई नेता धवन की हैसित से ईर्ष्या करते थे। उन्होंने इस बात का बतंगड़ बना दिया। धवन को भी शक की निगाहों से देखा जाने लगा। प्रतिष्ठित पत्रकार रजत शर्मा उस समय ऑनलुकर पत्रिका के संपादक थे। उन्होंने धवन के खिलाफ कांग्रेसी नेताओं की साजिश का पर्दाफाश किया था। रजत शर्मा लिखते हैं, "इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में आर के धवन को शक के दायरे में खड़ा कर दिया गया था। आर के धवन को फंसाने के लिए जिस तरह से ठक्कर कमीशन की रिपोर्ट तैयार की गयी थी, उस पूरे खेल का मैंने पर्दाफाश किया था। मैंने बिना डरे अरुण नेहरू के पूरे गेम को जगजाहिर किया था।" जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो अरुण नेहरू बहुत प्रभावशाली हो गये थे। सहयोगियों के कान भरे जाने के बाद राजीव गांधी ने आर के धवन को प्रधानमंत्री कार्यालय से हटा दिया था। लेकिन जब 1989 में राजीव गांधी कई परेशानियों में घिर गये तो उन्होंने आर के धवन को एक नेता के रूप में जोड़ा। राजीव गांधी ने 1990 में उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया। बाद में आर के धवन नरसिम्हा राव की सरकार मंत्री भी बने। धवन एक टाइपिस्ट से पीएम के निजी सहायक बने और फिर भारत सरकार का मंत्री भी।

English summary
bihar politics saurabh pandey chirag paswan pa was more powerful In the time of Indira Gandhi
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