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Bihar Polls:महागठबंधन में कांग्रेस को लेकर क्यों सख्त हो गए हैं RJD के तेवर, जानिए

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नई दिल्ली- बिहार चुनाव से पहले महागठबंधन का कुनबा लगातार घटते जाने से तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। अब राजद का कांग्रेस को लेकर भी स्टैंड बहुत ही सख्त हो चुका है। वह किसी भी सूरत में उसे मनमानी सीटें देने को राजी नहीं है। इस स्थिति को लेकर कहा जा रहा है कि यह लालू यादव की गैरमौजूदगी के चलते हो रहा है। शायद तेजस्वी यादव कुनबे को संभाल कर रख पाने में नाकाम हो रहे हैं। ये बातें अपनी जगह सही भी हो सकती हैं। लेकिन, असल में ऐसा लग रहा है कि यह सब जानबूझकर होने दिया जा रहा है और इसके पीछे खुद लालू यादव की सोच काम कर रही है। वह अभी नहीं तो कभी नहीं वाली रणनीति पर काम कर रहे हैं और हर हाल में तेजस्वी यादव की ताजपोशी चाहते हैं। इसलिए एक रणनीति के तहत काम हो रहा है।

    Bihar Election 2020: Congress को लेकर क्यों सख्त हो गए हैं RJD के तेवर ? जानिए | वनइंडिया हिंदी
    कांग्रेस को 60-61 से ज्यादा सीटें नहीं मिलेंगी!

    कांग्रेस को 60-61 से ज्यादा सीटें नहीं मिलेंगी!

    बिहार में पहले दौर के चुनाव में नामांकन का आज दूसरा दिन है। लेकिन, कांग्रेस के साथ राजद का सीटों को लेकर पेंच फंसा ही हुआ है। कहा तो यह जा रहा है कि राजद सुप्रीमो लालू यादव ने बेटे तेजस्वी यादव से साफ कह दिया है कि कांग्रेस को 60 या 61 सीटों से ज्यादा देने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस को लेकर लालू का तेवर इतना सख्त तब है, जब जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा बोरिया-बिस्तर समेटकर महागठबंधन से बाहर हो चुके हैं। दो दिन पहले सीपीआई (माले) ने 30 सीटों पर उम्मीदवारों की लिस्ट भी जारी कर दी है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पार्टी को भनक लग चुकी थी कि राजद सभी वामपंथी दलों को मिलाकर भी 25 सीटों से ज्यादा देने को राजी नहीं है। इनमें झारखंड मुक्ति मोर्चा भी शामिल है। जबकि, माले कम से कम 20 सीटों के लिए अभी भी अड़ी हुई है।

    बहुत दूर की सोच रहे हैं लालू

    बहुत दूर की सोच रहे हैं लालू

    सवाल है कि राजद से एक-एक करके पार्टियां छिटक कर दूर जा रही हैं, फिर भी वह किसी दबाव में आने को तैयार क्यों नहीं है? खासकर कांग्रेस के साथ, जिसका लालू परिवार से वर्षों पुराना खास नाता भी है। असल में इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण लोकसभा का पिछला चुनाव माना जा रहा है। तब पार्टी सहयोगी दलों के दबाव में झुक गई और नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस को तो एक सीट मिल भी गई, जिस आरजेडी के जनाधार पर मिली वह खुद टायं-टायं फिस हो गई। इसलिए अब पार्टी नेतृत्व ने तय किया है कि वह सिर्फ अपने जनाधार के बूते दूसरों को फसल काटने का मौका नहीं देगी। यही वजह है कि इसबार लालू यादव की पार्टी किसी भी दल के दबाव में झुकने के लिए तैयार नहीं है और हर हाल में 150 से ज्यादा सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारना चाहती है। लेकिन, सहयोगियों से झुक कर समझौता नहीं करने का ये तो सिर्फ एक कारण है। बेटे को अगला मुख्यमंत्री बनाने के लिए लालू बहुत दूर की सोच रहे हैं।

    पिछले लोकसभा चुनाव का सबक

    पिछले लोकसभा चुनाव का सबक

    तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले मौजूदा महागठबंधन का कुनबा किन वजहों से बिखरा है, उससे जुड़े तथ्यों पर गौर कीजिए। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के जीतनराम मांझी इसलिए वापस नीतीश कुमार के पास गए, क्योंकि उन्हें तेजस्वी यादव के नेतृत्व में खामी नजर आ रही थी। साफ शब्दों में समझिए तो वह मुख्यमंत्री के तौर पर तेजस्वी की उम्मीदारी के लिए तैयार नहीं थे। उपेंद्र कुशवाहा ने तो स्पष्ट तौर पर इसका जिक्र ही कर दिया। विकासशील इंसान पार्टी को भी राजद से साफ संदेश है कि वह ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की उम्मीदें ना पाले। दरअसल, इसके पीछे राजद नेतृत्व की सोच स्पष्ट है। 2019 का लोकसभा चुनाव उसके लिए एक बड़ी सबक है। उसे लगता है कि ये तमाम सहयोगी दल अपना वोट उसके उम्मीदवारों के हक में ट्रांसफर करवाने में नाकाम साबित होते हैं। इसलिए पार्टी 2014 के 4 से 2019 में शून्य पर पहुंच गई। जबकि, पिछले विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल 101 सीटों पर लड़कर 81 सीटों पर जीता था।

    लालू की शर्त मानना कांग्रेस की मजबूरी!

    लालू की शर्त मानना कांग्रेस की मजबूरी!

    कांग्रेस के लिए लालू ने जो 60-61 सीटों का अल्टीमेटम जारी किया है, उसके पीछे एक खास मकसद और है। इसके बारे में राजद के एक नेता ज्यादा जानकारी दी है। उनका कहना है, 'अगर नतीजों के बाद विधानसभा त्रिशंकु रहती है तो कांग्रेस को नीतीश के पाले में जाते देर नहीं लगेगी। इसलिए लालू चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए जाएं। छोटे दलों के साथ भी यही बात है। उनके लिए पाला बदलना बहुत ही आसान है।' मांझी और कुशवाहा को लेकर आरजेडी को पहले से ही ऐसा डर सता रहा था, जिसके चलते उन्हें रोकने की कोशिश भी नहीं की गई। अब बारी कांग्रेस की है। लालू को भी पता है कि फिलहाल कांग्रेस को उनकी शर्तें मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। बिहार में कांग्रेस का खुद अपना वजूद दशकों से सवालों के घेरे है।

    राजद के लिए लेफ्ट ज्यादा भरोसेमंद!

    राजद के लिए लेफ्ट ज्यादा भरोसेमंद!

    रही बात सीपीआई (माले),सीपीएम और सीपीआई जैसे वामपंथी दलों की तो ये साथ में चुनाव लड़ें या अलग शुरू से लालू यादव के प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोगी की भूमिका अक्सर निभाते देखे गए हैं। कांग्रेस नहीं मानी और उसने जमीनी हालात का सटीक आंकलन किए बगैर अलग रास्ता अपनाया तो लालू लेफ्ट पार्टियों को ज्यादा सीटों का ऑफर जरूर दे सकते हैं। क्योंकि, इन सभी दलों का अपना कैडर आधारित जनाधार है, जिनके वोट आरजेडी में ट्रांसफर होने की लगभग गारंटी है। यही नहीं, त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में भी इनके पाला बदलने की संभावना नहीं है। उधर 30 सीटों पर उम्मीदवारों के ऐलान के बाद भी माले ने तालमेल की उम्मीदें अभी छोड़ी नहीं हैं। पार्टी के नेता कुमार परवेज के मुताबिक 'हम अपनी मांग रख चुके हैं। आखिरी फैसला आरजेडी को लेना है। वैसे हमने 30 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर दी है।'

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    English summary
    Bihar election:Know why the RJD's attitude has become tough on the Congress in the Grand Alliance
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