Caste census ने BJP की बढ़ाई मुश्किलें! जातिगत जनगणना की काट के लिए भाजपा के पास क्या हैं विकल्प?

बिहार सरकार ने 2 अक्टूबर को जातीय जनगणना के आंकड़े जारी कर दिए। इस रिपोर्ट के जारी होने के बाद लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में एक बार फिर नए सिरे से फारवर्ड बनाम बैकवर्ड की राजनीति शुरू हो गई है। जिसने बीजेपी की टेंशन बढ़ा दी है।

यह 2024 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के लिए खतरे की घंटी भी है। बीजेपी न को इसका खुलकर विरोध कर पा रही है और ना ही समर्थन। बीजपी का शीर्ष नेतृत्व जहां इस पर मौन नजर आया तो वहीं बिहार बीजेपी इसकी खामियां बताती दिखी।

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जाति आधारित सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में 63% से अधिक आबादी पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग की है। जिसे बीजेपी का कोर वोट बैंक माना जाता है। अब इस आंकड़े के सामने के बाद बिहार में जहां नीतीश कुमार औऱ लालू यादव इस जातीय के साथ नए समीकरण तैयार करने में जुट गई हैं। वहीं बीजेपी को भी 2024 के चुनावों को लेकर नई रणनीति बनानी पड़ेगी। बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं।

यही नहीं इस सर्वे के आने के बाद से बिहार से सटे यूपी, झारखंड, एमपी और खासकर हिंदी बेल्ट वाले राज्यों में जातीय जनगणना कराने की मांग और तेज हो जाएगी। जो बीजेपी के लिए मश्किलें खड़ी कर सकती हैं। बीजेपी को आगामी लोकसभा चुनावों में जातीय जनगणना की काट के लिए नए विकल्प तलाशने होंगे। इसके लिए बीजेपी को छोटे दलों के साथ गठबंधन करना होगा, अगड़ी जातियों के बिखराव को कम करके एक साथ लाने जैसे प्रयास करने पड़ सकते हैं।

छोटे दलों का साथ
2014 के चुनावों में जीत के बाद बीजेपी ने सहयोगी दलों के पर निर्भरता को कम कर दिया था। वहीं 2019 में मोदी को मिली जीते के बाद एनडीए लगभग निष्क्रिय हो गया था। लेकिन इंडिया गठबंधन के बनने के बाद पीएम मोदी ने फिर से एनडीए को एक्टिव किया था। लेकिन अब जातीय जनगणना के आंकड़े आने के बाद बीजेपी की निर्भरता छोटे दलों पर और बढ़ने वाली है। बिहार की बात करें तो यहां पर एनडीए के मुख्य घटक दलों में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी, चिराग पासवान, पशुपति कुमार पारस और जीतन राम मांझी की पार्टी शामिल है।

बिहार में पांच फीसदी आबादी के साथ दूसरे नंबर पर दूसाध (पासवान) है। तीसरे नंबर पर कुशवाहा हैं, जिनकी आबादी 4 पर्सेंट से अधिक है। ऐसे में बिहार चुनाव और लोकसभा चुनावों में इन पार्टियों का साथ बीजेपी के काफी अहम साबित हो सकता है। 2019 लोकसभा चुनाव में जब नीतीश कुमार की जदयू और रामविलास पासवान की LJP एनडीए का हिस्सा थी तब गठबंधन ने 40 में से 39 सीटें बिहार में जीती थी। लेकिन इस बार जेडीयू राजद के साथ है। जो बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा सकती हैं।

नए साथियों की तलाश

माना जा रहा है की जाति आधारित सर्वे के रिपोर्ट सामने आने के बाद भाजपा बिहार में नए सिरे से गठबंधन की साथियों की तलाश शुरू कर सकती है। जिसमें विकासशील इंसान पार्टी प्रमुख और मल्लाह नेता मुकेश सहनी महत्वपूर्ण है। जाति आधारित सर्वे में जो आंकड़े के मुताबिक, बिहार में केवट और मल्लाहों की आबादी तकरीबन 3.3% है। अगर बीजेपी को अपनी जीत सुनिश्चित करनी हैं तो उसे मुकेश सहनी को अपने पाले में लाना होगा।

फिलहाल मुकेश सहनी ना तो इंडिया गठबंधन का हिस्सा है ना ही एनडीए का। आंकड़े के आने के बाद ऐसी संभावनाएं बन सकती हैं कि बीजेपी अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए मुकेश सहनी को आपने पाले में लाने की कोशिश करे।

वहीं दूसरी तरफ बीजेपी बिहार और यूपी में बसपा को अपने साथ गठबंधन में लाने की कोशिश कर सकती है। मायावती भी अभी न तो विपक्षी गठबंधन का हिस्सा हैं और न ही एनडीए का। बिहार में चमार और मोची आबादी 5.3 प्रतिशत है। जिस पर बसपा मायावती की पकड़ मानी जाती है। ऐसे में इन वोटों पर फोकस करते हुए बीजेपी मायावती को अपने साथ ला सकती है।

सीट शेयरिंग में सम्मानजनक बंटबारा
जातीय सर्वे के नए आकंड़ों आने के बाद बीजेपी को सीट शेयरिंग के फॉर्मूले को और लचीला करना पड़ेगा। अभी तक बीजेपी अपने पिछले प्रदर्शन के हिसाब से सीटों का बंटबारा करती थी। लेकिन अब जातीय आंकड़े आने के बाद आबादी के हिसाब से छोटे दल अपनी सीटें की मांग बढ़ा सकते हैं। ऐसे में बीजेपी के पास मोलभाव करने की अधिक ताकत नहीं रहेगी। आने वाले चुनावों में छोटी दल सीट शेयरिंग में सम्मानजनक सीटें पाने की कोशिश करेंगे।

अगड़ी जातियों में बैलेंस

सवर्ण मतदाता बीजेपी का कोर वोट बैंक माना जाता है। बीजेपी बाह्मण, ठाकुर, वैश्य मतदाताओं को अपने पाले में बनाए रखे। बिहार में 15.52 फीसदी अगड़ी जातियां है। जिसमें ब्राह्मण 3.65%, राजपूत 3.45%, भूमिहार 2.86%, कायस्थ 0.60% और बनिया 2.31% हैं। हालांकि कोई भी सवर्ण जाति 4 फीसदी के आंकड़ें को नहीं छू पाई है।

ऐसे में बीजेपी इन जातियों को एकजुट कर अपने पक्ष में रखने की भरकस कोशिश करेगा। हाल ही में राजद एमपी मनोज झा द्वारा ठाकुर शीर्षक की कविता संसद में पढ़ी थी। जिसके चलते राज्य में बाह्मण बनाम ठाकुर की नई राजनीति शुरू हो गई है। जो बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकती है।

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