लाश ढोने की सौदेबाजी : 104 साल पुरानी कहानी फिर याद आई

नई दिल्ली, अप्रैल 24: कोरोना महामारी के समय प्राइवेट एम्बुलेंस वालों का निर्दयी चेहरा आम लोगों को विचलित कर गया। जिंदगी की जंग लड़ रहे लोगों से पांच-छह किलोमीटर के लिए दस से पंद्रह हजार वसूले गये। बेंगलुरु, कोलकाता, पटना जैसे शहरों में एम्बुलेंस वाले कोरोना मरीजों से मनामान किराया वसूल रहे हैं। ऐसी खबरें पढ़ कर प्रतिष्ठित पत्रकार और साहित्यकार पांडेय बेचन शर्मा उग्र की कहानी 'वीभत्स’ याद आ गयी। उन्होंने इस कहानी में 1917 में फैली इन्फ्लुएंजा महामारी की भयावह परिस्थितियों का चित्रण किया है। उग्र जी की कहानी 'वीभत्स’ में भाषा सौंदर्य की जगह यथार्थ की कड़वी सच्चाई है। वे पत्रकार भी थे। इसलिए उन्होंने महामारी के समय जो देखा-सुना उसे कहानी की शक्ल में ज्यों का त्यों कागज पर उतार दिया। एक तटस्थ रिपोर्टर की तरह। तब उनकी उमर सोलह-सत्रह साल रही होगी। उग्र जी उत्तर प्रदेश के चुनार के रहने वाले थे। कहानी का तानाबाना बुना है उन्होंने अनूपशहर (बुलंदशहर) के एक गांव को केन्द्र बना कर। 104 साल पहले महामारी के जिस सच का उन्होंने जिक्र किया है वह आज भी जिंदा है। साहित्य भी इतिहास का एक हिस्सा है। शवों को ढोने के लिए 104 साल पहले जैसे एक गाड़ीवान ने सौदेबाजी की थी उसी तरह आज एम्बुलेंस वाले कर रहे हैं।

वीभत्स में महामारी का भयावह सच

वीभत्स में महामारी का भयावह सच

वीभत्स कहानी में एक पात्र है सुमेरा। रोजी-रोटी के लिए बैलगाड़ी चलाता है। वह लंबा-तगड़ा बलिष्ठ गाड़ीवान है। लेकिन स्वभाव से अख्खड़ और परले दर्जे का लालची है। सुख हो या दुख, हरदम फायदे की बात सोचता है। वह बैलगाड़ी पर माल लाद कर बगल के अनूपशहर जाता है। वहां बहुत बड़ी हाट लगती थी। गांव के लोग और छोटे दुकानदार हाट से सामान खरीद कर उसकी बैलगाड़ी पर लाते। भाड़ा में कभी एक रुपया तो कभी दो रुपया रोज हो जाता। किस्मत खुलती तो कभी-कभी तीन रुपया रोज भी कमा लेता। इस बीच 1917 में इन्फ्लूएंजा की बीमारी महामारी की तरह फैल गयी। शहर हो या गांव, रोज लोग मौत के मुंह में समाने लगे। सुमेरा ने एक बहाने से अपनी पत्नी और बच्चों को ससुराल भेज दिया। खर्चा कम हुआ तो सुमेरा खुश हो गया। महामारी एक गांव से दूसरे गांव में फैलने लगी। छुआछूत का रोग था। अनूपशहर और उसके आसपास के हाट में कोहराम मचा हुआ था। रोज सैकड़ों लोग मर रहे थे। लाश पड़ी रहती लेकिन बीमारी के डर से कोई छूता तक नहीं। डर के मारे लोगों ने हाट-बाजार जाना छोड़ दिया था।

लाश ढोने के लिए सौदेबाजी

लाश ढोने के लिए सौदेबाजी

महामारी के डर से कोई बाजार नहीं जा रहा था। सुमेरा की गाड़ीवानी का धंधा मंदा पड़ गया था। आखिर कब तक सुमेरा बैठा रहता। एक दिन उसने बैलगाड़ी जोती और चल पड़ा अनूपशहर हाट की ओर। वह गांव से बाहर हुआ तो उसे दो आदमी दिखायी पड़े। सुमेरा पहली नजर में ताड़ गया वे किसी दूसरे गांव के हैं। उसने पूछा, कहां से आये हैं ? उन्होंने जवाब दिया, हम हाट से आये थे लेकिन काम नहीं हुआ। सुमेरा ने पूछा, कौन सा काम नहीं हुआ ? उनमें से एक अजनबी ने कहा, बैलगाड़ी की जरूरत थी लेकिन नहीं मिली। सुमेरा की उत्सुकता बढ़ी, उसने पूछा किस काम के लिए चाहिए बैलगाड़ी ? उस आदमी ने कहा, हाट में दो दिनों से चार-पांच आदमी मरे पड़े हैं। कोई उन्हें फेंकने वाला नहीं। इन लाशों को गंगा जी में बहाने के लिए बैलगाड़ी ठीक करने आये थे। मरने वालों के नाते- रिश्तेदार बीमारी फैलने के डर से उन्हें छूने तक को तैयार नहीं तो उठाने की बात कौन पूछे। बेटा भी मसान ले जाने को तैयार नहीं। सुमेरा ने थोड़ी जिरह की। अगर गाड़ीवान को कुछ हो गया तो ? तो अजनबी ने कहा, तुम्हें कंधा थोड़े ही देना है। लाश गाड़ी पर लाद के गंगा जी ले जाना है। सुमेरा समझ गया कि बाहर से आने वाले दोनों लोग गर्जमंद हैं। उन्हें हर हाल में बैलगाड़ी चाहिए।

कोई मरे तो मरे, इन्हें पैसा चहिए

कोई मरे तो मरे, इन्हें पैसा चहिए

सुमेरा के मन में लोभ समा चुका था। उसने पूछा, मजूरी कितनी मिलेगी ? जवाब मिला, एक लाश का भाड़ा एक रुपया। हमारे हाट से गंगा जी की दूरी करीब पांच कोस है। क्या इतने पर चलोगे ? सुमेरा ने कहा, काम जितना खतरे का है उसके हिसाब से भाड़ा बहुत कम है। अजनबी ने कहा, अच्छा ठीक है, चार आना और ले लेना। सुमेरा जानता था कि दूसरे सभी बैलगाड़ी वाले लाश ढोने से मना कर चुके हैं और ये लोग बहुत मजबूरी में हैं। उसने कहा, खतरे का काम है, अगर एक लाश का भाड़ा दो रुपये मिलेगा तो चलूंगा। भाड़ा तय हो गया। दोनों अजनबी उसकी बैलगाड़ी पर बैठ गये। सुमेरा हाट पहुंचा। पांच लाशों को गाड़ी में लाद कर गंगाजी में बहा आया। एक दिन में दस रुपये कमा कर सुमेरा बहुत खुश था। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि उसने दो दिन पुरानी और विभत्स लाश को ढोया है। वह भी छूत की बीमारी से मरे लोगों की। महामारी बढ़ती तो मरने वालों की तदात भी बढ़ती गयी। सुमेरा को लोगों के दुख दर्द से कोई मतलब नहीं था। लाश ढोने का उसका धंधा चल निकला था। कमर में बंधी थैली निकाल कर वह बार-बार रुपये गिनता और खुश हो जाता। उग्र जी की कहानी में इसके बाद का प्रसंग और भी डरावना है। एक सौ चार साल पहले महामारी के समय मनुष्य की जो प्रवृति थी, आज कोरोन काल में भी वह बिलकुल वैसी ही है। कोरोना किसी के लिए विपदा है तो किसी के लिए कमाने का जरिया। खून के रिश्ते भी पानी हो रहे हैं।

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