Bangal का साइलेंट गेम-चेंजर कौन? जिसने जाति से परे हिंदुओं को एकजुट कर BJP को दिलाई जीत

Bangal Election Result: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल कर सभी को हैरान कर दिया। बंगाल में भगवा की आंधी ऐसी चली कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का सफाया हो गया। 200 से अधिक सीटें जीतकर भाजपा अब बंगाल में पहली बार सरकार बनाने जा रही है।

बंगाल में भाजपा को मिली सफलता का श्रेय केंद्रीय गृहमंत्री की सोची-समझी रणनीति को जाता है, इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता लेकिन इस जीत का एक 'साइंलेट गेमचेंजर' भी है जिसने जाति से परे हिंदुओं को एकजुट कर भाजपा को ये प्रचंड जीत दिलाई है।

Bangal Election Result

Bangal का साइलेंट गेम-चेंजर कौन?

दशकों तक पश्चिम बंगाल की राजनीति का खेल कुछ और ही नियमों पर चलता था। यहां जाति की गिनती नहीं होती थी, जातिगत पहचानें गौण थीं, धार्मिक लामबंदी कभी-कभार ही दिखती थी, चुनाव वैचारिक निष्ठा पर लड़े जाते थे-कौन किस विचारधारा के साथ खड़ा है, यही असली मुद्दा होता था।

लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदली। यह बदलाव अचानक नहीं आया है, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की एक बेहद सोची-समझी, लंबी और चुपचाप चलने वाली रणनीति का नतीजा है। जमीन पर धीरे-धीरे काम करके, सामाजिक समीकरणों को पलटकर और पहचान की राजनीति को हवा देकर, बंगाल की पूरी राजनीतिक भाषा ही बदली जा रही है।

जनसंघ से भाजपा तक की कहानी

1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिल्ली में भारतीय जनसंघ की शुरुआत की थी। भले ही पार्टी 1951-52 में दिल्ली में बनी, लेकिन उसकी वैचारिक जड़ें और शुरुआती चुनावी आधार बंगाल से प्रभावित था, जहां पर श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी का गहरा प्रभाव था।

पीएम मोदी बोले- अब श्यामा प्रसाद की आत्मा को शांति मिली होगी

आज़ादी के बाद पहली बार भाजपा ने पश्चिम बंगाल में जीत हासिल कर सरकार बनाई है। अपने संस्थापक के राज्य में इतने सालों तक मजबूत पकड़ न बना पाना संघ के लिए हमेशा एक कमी जैसा था। इस जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अब श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आत्मा को शांति मिली होगी।

सिर्फ चुनाव नहीं, बड़ा सामाजिक अभियान

बंगाल की ये जीत सिर्फ वोटों का खेल नहीं थी। इसके पीछे एक बड़ा सामाजिक अभियान चला, जिसमें हिंदुओं के बीच जाति, इलाके और वर्ग के फर्क को कम करके उन्हें एकजुट करने की कोशिश की गई। इस अभियान ने हिंदुओं के आंतरिक विभाजन को खत्म कर एक एकल, एकजुट राजनीतिक चेतना स्थापित की है।

घर-घर जाकर किया गया काम

करीब 250 सीटों पर 2 लाख से ज्यादा छोटी-छोटी बैठकों के जरिए लोगों तक पहुंच बनाई गई। संघ से जुड़े 14 संगठनों ने हर वर्ग-छात्र, मजदूर, महिलाएं, आदिवासी-सबसे संपर्क किया।

बिना शोर-शराबे का तरीका

ये कोई बड़ी रैलियों या भाषणों वाला अभियान नहीं था। इसके बजाय RSS ने 'लोकमत परिष्कार बैठकों' के जरिए लोगों से सीधे संवाद किया। हर सीट पर लगभग 700 बैठकें हुईं, जिनमें लोगों को अपने वोट को एक 'अस्तित्व की लड़ाई' की तरह देखने के लिए प्रेरित किया गया।

बांग्लादेश का मुद्दा भी बना असरदार

अभियान में बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति और वहाँ के डर को भी मुद्दा बनाया गया, जिससे लोगों में एक तरह की चिंता और एकजुटता पैदा हुई।

जहां पहले एकता नहीं थी, वहां असर दिखा

बंगाल में पहले हिंदू समाज कभी एकजुट होकर वोट नहीं करता था, जैसा दूसरे राज्यों में जाति के आधार पर होता है। RSS ने इसी कमजोरी को पहचानकर धीरे-धीरे इसे बदलने का काम किया।

त्योहार भी बने रणनीति का हिस्सा

राम नवमी जैसे त्योहारों को सिर्फ धार्मिक आयोजन न रखकर, उन्हें एक सामूहिक पहचान बनाने का जरिया बनाया गया। इससे लोगों में जुड़ाव बढ़ा।

गांव तक पहुंची रणनीति

ये अभियान सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रहा। गांवों और छोटे कस्बों तक भी इसे पहुंचाया गया, जिससे हर स्तर पर एक जैसा माहौल बना।

चुपचाप लेकिन असरदार काम

RSS की खासियत यही रही कि उसने बिना ज्यादा शोर किए काम किया। इस वजह से लोगों ने इस सोच को धीरे-धीरे खुद अपनाया, न कि इसे उन पर थोपा गया।

आगे क्या संकेत देता है ये बदलाव?

ये बदलाव सिर्फ एक चुनाव तक सीमित नहीं है। ये दिखाता है कि बंगाल में अब राजनीति विचारधारा से ज्यादा पहचान के आधार पर हो सकती है। भाजपा के लिए ये मजबूत नींव है, लेकिन विरोधियों के लिए ये बड़ी चुनौती है, क्योंकि अब उन्हें सिर्फ पार्टी नहीं, बल्कि बदली हुई सोच का सामना करना होगा।

क्या ये मॉडल पूरे देश में लागू होगा?

अगर ये तरीका सफल रहता है, तो बंगाल का ये मॉडल आगे चलकर पूरे देश में इस्तेमाल हो सकता है-जहां धीरे-धीरे समाज के अंदर बदलाव लाकर राजनीति को प्रभावित किया जाए।

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