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अयोध्या पर फैसला: उस शाम जस्टिस रंजन गोगोई सभी जजों को 5-स्टार होटल लेकर क्यों गए थे ? जानिए

नई दिल्ली, 10 दिसंबर: भारत के पूर्व सीजेआई जस्टिस रंजन गोगोई की आत्मकथा 'जस्टिस फॉर द जज' बुधवार को ही दिल्ली के नेहरू मेमोरियल म्यूजीयम एंड लाइब्रेरी में लॉन्च हुई है। इस आत्मकथा में जस्टिस गोगोई ने अपने जज के करियर से संबंधित कई अहम पहलुओं को सार्वजनिक करने की कोशिश की है। इसमें कुछ विवादित मसले भी हैं, जो उनके चार दशक से भी लंबे ज्यूडिशियल करियर से जुड़े हुए हैं। इसमें अयोध्या राम मंदिर पर ऐतिहासिक फैसला, एक महिला स्टाफ मेंबर की ओर से उनपर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप और रिटायरमेंट के चंद महीने बाद ही राज्यसभा के लिए नामित होने जैसे मुद्दे शामिल हैं। अपनी आत्मकथा में जस्टिस गोगोई ने कहा है कि अयोघ्या पर फैसला देने के बाद उस शाम वह पांच सदस्यीय उस बेंच के सभी साथियों को लेकर दिल्ली के एक बड़े 5-स्टार होटल में खाना करने गए थे और वाइन का भी आनंद लिया था।

'सेलिब्रेटिंग द लैंडमार्क अयोध्या वर्डिक्ट'

'सेलिब्रेटिंग द लैंडमार्क अयोध्या वर्डिक्ट'

भारत के पूर्व सीजेआई ने अपनी आत्मकथा में अयोध्या पर ऐतिसाहसिक फैसले का खासकर जिक्र किया है। किताब में दो तस्वीरें हैं, जो दिल्ली के एक पांच-सितारा होटल ताज मानसिंह की हैं, जिसमें इस बेंच के पांचों जज एकसाथ डिनर के लिए पहुंचे हुए हैं। इन दोनों तस्वीरें के बीच में कैप्शन लिखा हुआ है- 'सेलिब्रेटिंग द लैंडमार्क अयोध्या वर्डिक्ट' यानी 'ऐतिहासिक अयोध्या फैसले का जश्न'। किताब में जस्टिस गोगोई ने इसके बारे में लिखा है, 'शाम में, मैं जजों को डिनर के लिए ताज मानसिंह होटल ले गया। हमने चाइनीज खाना खाया और वहां मौजूद सबसे बेहतर वाइन की एक बोतल साझा की।'

जजों को 5-स्टार होटल क्यों ले गए थे जस्टिस गोगोई ?

जजों को 5-स्टार होटल क्यों ले गए थे जस्टिस गोगोई ?

इस मामले पर जस्टिस गोगोई से एनडीटीवी ने सवाल किया कि क्या अयोध्या पर फैसला देने के बाद जश्न मनाना उचित था? इसपर उन्होंने कहा है, 'जश्न नहीं। जब आप दोस्तों के साथ डिनर पर जाते हैं तो कभी-कभी बाहर का खाना चखने का मन नहीं करता?' इसपर उनसे पूछा गया कि खासकर जो मुकदमा हार गए उनके लिए यह असंवेदनशील नहीं है, इसपर वे बोले, 'प्रत्येक जजों ने चार महीनों तक बहुत ही ज्यादा, बहुत ही ज्यादा मेहनत की थी (अयोध्या पर फैसले के लिए)। मेरे जजों ने और हमने सभी ने बहुत ही ज्यादा मेहनत की थी, हमने सोचा कि हम एक ब्रेक लेंगे। हमने कुछ ऐसा कर दिया जिसकी अनुमति नहीं है?'

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    यौन उत्पीड़न वाले मामले पर क्या बोले जस्टिस गोगोई ?

    यौन उत्पीड़न वाले मामले पर क्या बोले जस्टिस गोगोई ?

    कोर्ट के एक महिला स्टाफ की ओर से उनपर यौन उत्पीड़न के आरोप के मामले की सुनवाई की खुद अध्यक्षता करने पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसके बारे में उन्होंने सफाई दी है, 'मेरी किताब में एक वाक्य है, कि पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि शायद बेंच में मेरी मौजूदगी सही नहीं थी।' उनका कहना है कि उनका फैसला अपनी प्रतिष्ठा की चिंता से प्रभावित था, 'सीजेआई स्वर्ग से नहीं उतरते। मेहनत से बनी 40 साल की प्रतिष्ठा को बर्बाद करने की कोशिश की जा रही है, आपको एक कॉल लेना है। इसमें कुछ गलत हो जाता है।' 'बेवजह और अपमानजनक आरोपों' पर आदेश में मीडिया को संभलकर रिपोर्टिंग करने के बेंच के आदेश के बारे में उनका कहना है, 'यह एक अप्रभावी आदेश था....' 'बेंच ने सिर्फ यह कहने की कोशिश की थी कि बेवजह और अपमानजनक आरोपों की रिपोर्टिंग ध्यान से और संभलकर करनी चाहिए। बस यही था।'

    राज्यसभा की सदस्यता स्वीकार करने पर क्या बोले जस्टिस गोगोई ?

    राज्यसभा की सदस्यता स्वीकार करने पर क्या बोले जस्टिस गोगोई ?

    अपनी आत्मकथा में देश के पूर्व मुख्य न्यायधीश ने लिखा है कि 'मैंने कभी नहीं सोचा था कि ऑफर स्वीकार (राज्यसभा की सदस्यता के लिए नामांकन) करने में कोई बुराई है या इसकी वजह से विपरीत टिप्पणियों का सामना करना पड़ेगा। हमने कभी कल्पने में भी सोचा होता, कि लोग इस तरह से सार्वजनिक तौर पर अपनी सोच और नजरिया जाहिर करेंगे, तो शायद मैं नामांकन स्वीकार करने से पहले दोबारा सोचता।' उन्होंने तब कहा था कि उन्होंने ऑफर इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि इससे उन्हें जुडिशियरी और अपने गृह राज्य असम की समस्याओं को सामने रखने का मौका मिलेगा। लेकिन, राज्यसभा के रिकॉर्ड से पता चलता है कि उनकी संसद में उपस्थिति 10 फीसदी से भी कम है।

    राज्यसभा में कम उपस्थिति पर क्या बोले जस्टिस गोगोई?

    राज्यसभा में कम उपस्थिति पर क्या बोले जस्टिस गोगोई?

    राज्यसभा में कम उपस्थिति के बारे में उन्होंने कहा है कि निजी तौर पर वहां जाने में वह बहुत कंफर्टेबल महसूस नहीं करते। ऊपर से महामारी की वजह से भी दिक्कत है। वो कहते हैं कि मार्च, 2020 से जब से वे सांसद बने हैं, सदन की बैठक ही नहीं हो पा रही है। पहले महामारी की वजह से, फिर हंगामें की वजह से। एकबार सबकुछ ठीक हो जाने के बाद वह जनता के महत्त्व के विषय रखने की बात कह रहे हैं। उन्होंने अपनी किताब में यह भी साफ किया है कि सांसद का शपथ लेने के 6 महीने के भीतर उन्होंने किसी पार्टी की सदस्यता नहीं ली है, इसलिए वह निर्दलीय हैं। उन्होंने कहा है कि वह जनता से जुड़े मुद्दे उठाएंगे, इससे फर्क नहीं पड़ता कि किस पार्टी ने उन्हें राज्यसभा के लिए नामांकित किया है और किसने समर्थन नहीं दिया है।

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