आखिर वो कौन है जिससे वाजपेयी और मोदी ने कर लिया किनारा!
बंगलुरू। पूरा देश पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज पहला वर्षगांठ मना रहा है। बीजेपी के पितृपुरुष वाजपेयी को याद करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह 'सदैव अटल' स्मारक पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। 16 अगस्त, 2018 को लंबी बीमारी के बाद मौत के गाल में समा गए भारत रत्न वाजपेयी की गिनती एक पेशेवर और मंझे हुए राजनीतिज्ञ रूप में होती थी।

अपनी वाकपटुता से विरोधियों को भी अपना मुरीद बना लेने वाले अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की जोड़ी उतनी ही मशहूर थी, जितनी कि आज मोदी और शाह की जोड़ी है। हालांकि दुनिया भले ही वाजपेयी-आडवाणी को जोड़ीदार कहती थी, लेकिन आडवाणी हमेशा वाजपेयी को अपना गुरू कहते थे। जैसे पूर्व बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुरू सरीखा सम्मान देते हैं।
अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन पर बेस्ड हाल ही में प्रकाशित एक किताब 'हार नहीं मानूंगा-एक अटल जीवनगाथा' में छपे कुछ उद्धरण की मानें तो सबके प्रिय अटल के कुछ अनछुए पहलू भी प्रकट होते हैं। किताब के लेखक पत्रकार विजय त्रिवदी अपनी किताब में लिखते हैं कि अटल-आडवाणी की बेमिशाल जोड़ी कुछ अंतराल के लिए संघ प्रचारक गोविंदाचार्य के चलते भ्रमजाल में फंस गई थी, जिसके चलते जोड़ी की मिठास कड़ुवाहट में बदलती चली गई।
किताब के मुताबिक राम मंदिर आंदोलन को लेकर संघ परिवार को लगने लगा था कि लालकृष्ण आडवाणी ही पार्टी का चेहरा हो सकते हैं, क्योंकि रथयात्रा के बाद आडवाणी ही पूरे देश में सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में उभरकर सामने आए थे. ऐसा माना गया कि आडवाणी और वाजपेयी के बीच संबंधों में थोड़ी-सी कसक की वजह यह घटना रही। इसी घटना के चलते वाजपेयी-गोविंदाचार्य के बीच अविश्वास और नाराज़गी के बीज भी पड़े।

दरअसल, महत्वाकांक्षी रहे आडवाणी चाहते थे कि वाजपेयी विपक्ष के नेता बनें वरना वो सिर्फ़ सांसद रह जाएंगे, लेकिन संघ परिवार का दबावों के चलते आडवाणी को लोकसभा में नेता विपक्ष बनना पड़ा। हालांकि इससे पूर्व उन्होंने अपने करीबी रहे गोविन्दाचार्य को संघ कार्यालय भेजकर कहलवाया कि वाजपेयी को ही विपक्ष का नेता बनाया जाना चाहिए और पार्टी वो ख़ुद संभाल लेंगे,लेकिन संघ के आगे उनकी एक नहीं चली।
आडवाणी और अटल के बीच कड़ुवाहट में गोविंदाचार्य की भूमिका हमेशा संदिग्ध रही है। हालांकि गोविंदाचार्य इसका हमेशा खंडन करते रहे हैं। कहते हैं एक बार ब्रिटिश हाई कमीशन वाले विदेश नीति जैसे मसलों पर चर्चा के लिए बीजेपी कार्यालय में गोविंदाचार्य में मिलने पहुंची थी और जब ब्रिटिश हाई कमीशन के लोगों द्वारा पूछा गया कि अटल-आडवाणी की बेमिशाल जोड़ी में से पार्टी किसे अध्यक्ष चुनना पसंद करेगी तो गोविंदाचार्य ने उन्हें 10 सम्भावित गिनवा दिए थे, जिसमें दूर-दूर तक वाजपेयी का नाम नहीं था और जब सवाल किया कि लिस्ट में वाजपेयी का नाम क्यों नहीं है तो गोविन्दाचार्य का जवाब था कि वजपेयी पीएम पद के उम्मीदवार हैं?
यहीं से अटल और आडवाणी के बीच अनबन और बढ़ गई, क्योंकि गोविंदाचार्य के उक्त बयान के करीब तीन हफ़्ते बाद 6 अक्टूबर 1997 को एक साथ ग्यारह हिन्दी और अंग्रेजी अख़बारों में एक लेख प्रकाशित हुआ। लेख का शीर्षक था, 'वाजपेयी मुखौटा हैं-गोविन्दाचार्य'। वाजपेयी इस सबके लिए पूरी तरह से गोविन्दाचार्य को ज़िम्मेदार मानते हैं, लेकिन किससे छिपा है कि गोविंदाचार्य आडवाणी के ही करीबी थे और यह सब उनके इशारे पर ही हो रहा था।
वाजपेयी मुखौटा कहा गया था और उनके खिलाफ मीडिया में दुष्प्रचार का सिलसिला लगातार चलता रहा तो एक दिन वाजपेयी ने खुद आडवाणी को बुलाकर कहा कि ये लोग आपको बदनाम कर रहे हैं, क्योंकि कुछ लोग मानते हैं कि आपकी पसन्द के लोग यह सब करवा रहे हैं, तो बदनामी आपकी हो रही है।
उल्लेखनीय है गोविन्दाचार्य हर शाम आडवाणी से मिलते थे और पत्रकारों के साथ भी उनकी रोज़ाना बैठकें होती थीं, जिसमें अक्सर वे कुछ-न-कुछ हल्की टिप्पणियां कर देते थे। वाजपेयी के घर पर उनकी बेटी नमिता और दामाद रंजन भट्टाचार्य को लगता था कि इस सब में आडवाणी की भूमिका है, यही कारण है कि लाल कृष्ण आडवाणी वाजपेयी के करीबी और जोड़ीदार होकर भी कभी उनके राजदार नहीं बन सके।

मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राजनीति में लाने का श्रेय लालकृष्ण आडवाणी को जाता है। कहां जाता है वर्ष 2002 के गुजरात दंगों के बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी नरेंद्र मोदी को हटाना चाहते थे, लेकिन लाल कृष्ण आडवाणी के दखल के बाद नरेंद्र मोदी गुजरात में मुख्यमंत्री बने रहे, लेकिन जब नरेंद्र मोदी को पीएम पद के लिए प्रोजेक्ट किया गया तो आडवाणी अपनी महत्वाकांक्षा को नहीं दबा सके और कई दिनों की नाराजगी के बाद नरेंद्र मोदी के नाम राजी हुए। निःसंदेह इसकी टीस नरेंद्र मोदी को अभी भी होगी।
वर्ष 2014 में जब बीजेपी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव में उतरी तो बीजेपी प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने में कामयाब रही। आडवाणी को बीजेपी के मार्गदर्शन मंडल दिया गया। कुछ अंतराल के बाद होने वाले राष्ट्रपति चुनाव होने थे। लोगों को लगा कि नरेंद्र मोदी शायद लाल कृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति पद के लिए प्रोजेक्ट करेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। बीजेपी ने राष्ट्रपति के उम्मीदवार के बीजेपी के दलित चेहरे रामनाथ कोविंद के नाम को आगे बढ़ाया और लाल कृष्ण आडवाणी राष्ट्रपति भी बनते-बनते रह गए।
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