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विधानसभा चुनाव: भारत के 29 राज्यों में सिर्फ़ एक महिला मुख्यमंत्री होने के क्या मायने हैं?

By Bbc Hindi

वसुंधरा राजे, महिलाएं, राजनीति, चुनाव
Vasundhara Raje/Facebook
वसुंधरा राजे, महिलाएं, राजनीति, चुनाव

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद कई चीज़ें बदली हैं. एक बदलाव ये भी है कि अब भारत के 29 राज्यों में सिर्फ़ एक महिला मुख्यमंत्री होगी.

राजस्थान की सत्ता वसुंधरा राजे के हाथों से फिसल चुकी है और इसलिए अब सिर्फ़ पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है जहां एक महिला मुख्यमंत्री है- ममता बनर्जी.

तक़रीबन दो साल पहले भारत के चारों कोनों में एक-एक महिला मुख्यमंत्री थी. आज ये आकंड़ा चार से सिमट कर एक पर आ गया है

साल 2011 और साल 2014 में ऐसा हुआ था कि भारत के चार राज्यों की ज़िम्मेदारी महिला मुख्यमंत्रियों के हाथों में थी.

जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ़्ती, गुजरात में आनंदीबेन पटेल, राजस्थान में वसुंधरा राजे और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी. इससे पहले तमिलनाडु में जयललिता भी थीं.

दिलचस्प बात ये है कि जयललिता के अलावा ये सभी अपने राज्यों की पहली महिला मुख्यमंत्री हैं.

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ममता बनर्जी
AFP
ममता बनर्जी

भारतीय राजनीति पर नज़र रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार स्मिता सिंह इसे भारतीय महिलाओं के लिए अच्छा संकेत नहीं मानतीं.

आज़ादी के बाद से अब तक भारत में कुल 16 महिला मुख्यमंत्री हुई हैं जिनमें उमा भारती, राबड़ी देवी और शीला दीक्षित जैसे नाम शामिल हैं.

स्मिता सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "भले ही भारत में महिला मुख्यमंत्रियों की संख्या उंगलियों पर गिने जाने भर की रही हो, हम इससे इनकार नहीं कर सकते कि जयललिता और मायावती जैसी महिलाएं सबसे ताक़तवर मुख्यमंत्रियों में से रही हैं. दोनों ने एक से ज़्यादा बार मुख्यमंत्री का पदभार संभाला है. दोनों का ही कार्यकाल काफ़ी प्रभावी रहा है. फिर चाहे वो तमिलनाडु में जयललिता की जनवादी योजनाएं हों या उत्तर प्रदेश में मायावती का क़ानून-व्यवस्था को क़ाबू में करना."

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महबूबा मुफ़्ती
Getty Images
महबूबा मुफ़्ती

स्मिता मानती हैं कि एक के बाद एक लगातार कई राज्यों में महिला मुख्यमंत्रियों का आना एक स्वस्थ परंपरा की शुरुआत थी और ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह परंपरा इतनी जल्दी टूटती नज़र आ रही है.

इंटर पार्लियामेंटरी यूनियन (IPU) और यूएन वीमन रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2017 में भारत में महिलाओं की लोकसभा में सिर्फ़ 11.8% और राज्यसभा में सिर्फ़ 11% भागीदारी थी.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अदिति फड़नीस की राय इस मुद्दे पर थोड़ी अलग है.

अदिति कहती हैं, "ये माना जाता है कि महिलाएं शीर्ष पदों पर होंगी तो महिलाओं के हित में फ़ैसले लेंगी लेकिन इसे पूरा सच नहीं माना जा सकता. इंदिरा गांधी जब देश की प्रधानमंत्री थीं तब कोई क्रांति नहीं आ गई या जिन राज्यों में महिलाएं मुख्यमंत्री थीं वहां महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी हो, ऐसा भी नहीं है. ये भी नहीं कह सकते कि पुरुष राजनेता महिलाओं के हक़ में फ़ैसले ले ही नहीं सकते."

हालांकि अदिति ये भी मानती हैं कि जितनी ज़्यादा महिलाएं फ़ैसले लेने की स्थिति में होंगी, फ़ैसलों में उतनी ज़्यादा संवेदनशीलता और बराबरी होगी.

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जयललिता
Getty Images
जयललिता

महिला नेताएं क्यों नहीं लेतीं महिलाओं के हित में फ़ैसले?

स्मिता इससे इत्तेफ़ाक ज़ाहिर करती हैं कि ज़रूरी नहीं महिला नेता महिलाओं के हक़ में फ़ैसले ले ही. लेकिन वो फिर वही बातें दुहराती हैं- राजनीति में महिलाओं की भागीदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ाए जाने की ज़रूरत, महिलाओं की संख्या बढ़ाए जाने की ज़रूरत.

वो कहती हैं, "दूसरी बात ये है कि अगर कोई महिला तमाम अड़चनें पार करके राजनीति में ऊंचे पद पर पहुंचती है तो उसकी स्पर्धा भी उन तमाम पुरुषों से होगी जो पहले से सत्ता में क़ाबिज़ हैं. इसलिए वो भी फिर चुनाव जीतने के लिए वही हथकंडे अपनाती हैं जो पुरुष और इस पूरी प्रक्रिया में महिलाओं के मुद्दे कहीं पीछे चले जाते हैं.''

स्मिता पूछती हैं कि हम महिलाओं से ये उम्मीद क्यों करते हैं कि वो पुरुषों जितनी महत्वाकांक्षा नहीं रखेंगी?

वो ज़ोर देकर कहती हैं कि असली फ़र्क़ तब आएगा जब महिलाओं की संख्या में बड़ा अंतर आएगा. पुरुष अपनी बात मनवाने में इसलिए कामयाब होते हैं क्योंकि वो राजनीति में बहुसंख्यक हैं, जबकि महिलाएं अल्पसंख्यक.

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मायावती
Getty Images
मायावती

राजनीति में महिलाएं कम क्यों हैं?

अगर भारतीय राजनीति में सक्रिय महिलाओं को देखें तो उनमें से ज़्यादातर सशक्त राजनीतिक परिवारों से आती हैं. फिर चाहे वो इंदिरा गांधी हों या वसुंधरा राजे.

स्मिता सिंह के मुताबिक़ ऐसी कई वजहें हैं जो महिलाओं को राजनीति में आने से रोकती हैं. मसलन, पैसे और हिंसा.

स्मिता कहती हैं, "राजनीति एक मुश्किल पेशा है. इसमें काफ़ी अनिश्चितताएं होती हैं. जब तक आपके पास कमाई का कोई ठोस और अतिरिक्त विकल्प न हो, आप सक्रिय राजनीति में ज़्यादा समय तक नहीं टिक सकते. अगर हम मायावती और जयललिता को ही देखें तो उनके पास कांशीराम और एमजीआर जैसे राजनीतिक गुरु थे जिन्होंने उनकी आगे बढ़ने में मदद की."

अदिति फड़नीस के मुताबिक़ महिलाओं को राजनीति में ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में दोहरा काम करना पड़ता है. वो कहती हैं, "महिलाओं को पुरुषों के बराबरी में आने के लिए ख़ुद को उनसे बेहतर साबित करना पड़ता है और यही बात राजनीति में भी लागू होती है."

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शीला दीक्षित
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शीला दीक्षित

हालिया महिला मुख्यमंत्रियों का इतिहास

ममता बनर्जी का यह पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री के तौर पर दूसरा कार्यकाल है. ममता पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री हैं और शायद कुछ दिनों में अकेली महिला मुख्यमंत्री होंगी. कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी (तृणमूल कांग्रेस) बनाने वाली ममता की छवि एक ऐसे नेता की है जिसने अपने बूते पर राजनीति में जगह बनाई. पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी का दबदबा कमज़ोर करने वाली ममता की उनके अड़ियल रवैये के कारण आलोचना भी होती है.

राजस्थान में दो बार मुख्यमंत्री का पदभार संभालने वाली वसुंधरा राजे सिंधिया की कुर्सी छिन चुकी है. वसुंधरा राजस्थान की पहली महिला मुख्यमंत्री भी हैं. राजनीतिक और शाही परिवार से आने वाली राजे अपने रूखे व्यवहार के लिए कई बार आलोचकों के निशाने पर रही हैं.

जम्मू-कश्मीर में अपने पिता मुफ़्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद बीजेपी के साथ गठबनंधन को आगे बढ़ाते हुए महबूबा मुफ़्ती सूबे की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी थीं. हालांकि बीजेपी-पीडीपी गठबंधन टूटने के बाद उन्हें दो साल बाद ही पद छोड़ना पड़ा.

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महिला
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महिला

तमिलनाडु में पांच बार मुख्यमंत्री पद पर रहने वाली जयललिता की 2016 में मौत हो गई. उनके निधन के बाद कोई महिला नेता उनकी जगह नहीं ले पाई और फ़िलहाल सत्ता ई. पलानीस्वामी के हाथों में है. तमिलनाडु में पांच बार मुख्यमंत्री रहीं जयललिता का दबदबा हमेशा याद किया जाएगा और ये कहना भी ग़लत नहीं होगा कि मौजूदा वक़्त में किसी महिला नेता का व्यक्तित्व और प्रभाव उनके आस-पास भी नहीं फटकता.

गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को साल 2014 में उस वक़्त सूबे की कमान दी गई थी जब लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत हुई और नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री चुने गए. हालांकि इसके दो साल बाद ही उन्होंने इस्तीफ़ा सौंपा और विजय रूपाणी ने उनकी जगह ले ली.

मायावती ने उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपना आधिपत्य जमाया. दलित और अनुशासनप्रिय नेता की छवि वाली मायावती ने उत्तर प्रदेश की क़ानून व्यवस्था सुधारकर जहां तारीफ़ें बटोरीं वहीं भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी छवि कमज़ोर भी की.

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English summary
Assembly elections What is the significance of being the only female Chief Minister of 29 states of India
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