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ये ताश का खेल निकम्मो का नहीं, जिसमें एशियाड में भारत ने जीता गोल्ड, जानिए सबकुछ

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    Asian Games 2018: Contract Bridge card game, All you need to know | वनइंडिया हिंदी

    नई दिल्ली। एशियन गेम्स में भारतीय एथलीट के 'गोल्डन शनिवार' की शुरूआत अमित पंघल के पावरफुल पंच से हुई। उन्होंने जकार्ता में चल रहे एशियाड में 49 किलोग्राम स्पर्धा के फाइनल में ओलंपिक चैंपियन मुक्केबाज को उजबेकिस्‍तान के हसनबॉय को मात दी। राष्ट्र गान सुनते ही उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे लेकिन उन्होंने इतिहास लिख दिया था। एशियन गेम्स के 14वें दिन भारत को एक और गोल्ड मेडल मिला जिसे न तो उतना फेम मिला है और न ही आम लोगों के बीच उतना लोकप्रिय है। इस खेल का नाम है ब्रिज या कॉन्ट्रैक्ट ब्रिज। साठ वर्षीय प्रणब बर्धन और 56 वर्षीय शिबनाथ सरकार ने चीन को मात देकर इस खेल में एशियाड इतिहास का पहला गोल्ड मेडल जीता। जानिए यह खेल है क्या जिसमें भारत का नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हो गया है।

    'ब्रिज' में भारत को गोल्ड

    'ब्रिज' में भारत को गोल्ड

    ब्रिज, सुनने में जितना आसान और सरल लगता है यह गेम अपने आप में उतना ही कठिन है। इस खेल को 'Game of Skill' कहा जाता है। वैसे तो हर खेल में स्किल और चतुराई की तारतम्यता से जीत मिलती है लेकिन यह खेल बांकी गेम से अलग है। महिलाओं की अपेक्षा यह गेम पुरूषों के लिए और मुश्किल माना जाता है। इस खेल में हर एक टीम के दो खिलाड़ी शामिल होते हैं। इस खेल को लगातार 7 दिनों तक खेला जाता है। हर एक दिन इस खेल को खेलने वाले प्रतिभागी 7 घंटे तक बैठकर खेलते हैं और प्रतिद्वंदी को अपनी चाल से मात देते हैं। ताश के पत्तों से खेले जाने वाला यह खेल किसी मैराथन से कम नहीं है। यही कारण है कि इसे मैराथन ऑफ़ शॉर्ट्स भी कहा जाता है। आम खेलों के मुकाबले इस खेल को खिलाड़ी लगभग 80 साल की उम्र तक खेलते हैं। एसी कमरे में बहुत कम तामपान में खिलाड़ियों को बैठकर यह खेल खेलना होता है।

    क्या है ताश के पत्तों का ये खेल 'ब्रिज'

    क्या है ताश के पत्तों का ये खेल 'ब्रिज'

    ब्रिज की शुरूआत वर्ल्ड ब्रिज फेडरेशन नाम की संस्था ने की। इसे ट्रिक-टेकिंग कार्ड गेम भी कहा जाता है। वैसे तो भारत में ताश खेलने वाले लोगों को आम लोग निकम्मा और निठल्ला मान बैठते हैं लेकिन भारत को गोल्ड मिलने के बाद इस खेल को आम लोगों की नजर में भी इज्जत मिलेगी। इसे एक टाइम पास गेम के रूप में भी भारतीय खेलते हैं। अगर इस खेल के इतिहास की बात करें तो इसे 16वीं शताब्दी से खेला जा रहा है। उन दिनों यह खेल राजघरानों तक सीमित था जहां बड़े खानदानी लोग शान के तौर पर इसे खेला करते थे। इस संस्था की वेबसाइट के मुताबिक इनका पंचलाइन 'Bridge for Peace' यानी शांति के लिए रास्ता बनाना है। साल 1958 में ओस्लो में वर्ल्ड ब्रिज फेडरेशन की स्थापना हुई लेकिन एशियाड को इस खेल में इस साल (2018) ही जगह मिल पाई है। ओलिंपिक काउंसिल ऑफ एशिया (OCA) ने वियतनाम में आयोजित एक आम सभा में इस खेल को एशियाड-2018 में शामिल करने का फैसला 25 सितंबर 2016 को लिया था।

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    16वीं सदी में हुई ब्रिज की शुरूआत

    16वीं सदी में हुई ब्रिज की शुरूआत

    इस साल एशियाड की ब्रिज प्रतिस्पर्धा में सात देशों ने भाग लिया है। चीन, चाइनीज ताइपे, भारत, सिंगापुर, हॉन्गकॉन्ग, थाईलैंड और इंडोनेशिया वो देश हैं जिन्होंने इस प्रतिस्पर्धा में भाग लिया है। इस प्रतियोगिता में साठ वर्षीय प्रणब और 56 वर्षीय शिबनाथ फाइनल्स में 384 अंकों के साथ शीर्ष पर रहे। चीन के लिक्सिन यांग और गांग चेन ने 378 अंक हासिल करके रजत तथा इंडोनेशिया के हेंकी लासुट और फ्रेडी इडी मोनोप्पा ने 374 अंक साथ कांस्य पदक जीता। इस खेल में कार्ड के 52 पत्तों में से 13 पत्ते हर खिलाड़ियों में बांटे जाते हैं। खिलाड़ी परम्यूटेशन और कॉम्बिनेशन के आधार पर इस खेल को खेलते हैं इसलिए यह आने वाले कार्ड पर निर्भर करता है कि वह किस तरह अपना स्कोर बढ़ा सकते हैं।फुटबॉल, रग्बी और बांकी खेलों की तुलना में यह एक माइंड गेम है जिसे चालाक लोग अपनी चतुराई से जीतते हैं।

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