• search
क्विक अलर्ट के लिए
अभी सब्सक्राइव करें  
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

केजरीवाल ने शपथ समारोह में पीएम को तो बुलाया पर क्यों नहीं डाली विपक्षी नेताओं को घास?

|

नई दिल्ली। अरविंद केजरीवाल ने अपने शपथग्रहण समारोह में दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों को क्यों नहीं बुलाया ? पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी, मध्य प्रदेश के सीएम कमलनाथ, केरल के सीएम पी विजयन और झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने केजरीवाल की जीत पर दिल खोल कर बधाई दी थी। कांग्रेस भी दिलोजान से केजरीवाल पर फिदा थी। इसके बाद भी केजरीवाल ने किसी को घास नहीं डाली। आखिर क्यों केजरीवाल ने भाजपा विरोधी ताकतों से दूरी बनायी? केजरीवाल ने नरेन्द्र मोदी को तो न्योता दिया लेकिन विपक्षी नेताओं से क्यों पल्ला झाड़ लिया ? क्या केजरीवाल की यह रणनीति किसी दूरगामी राजनीति का हिस्सा है ?

हैट्रिक ने बदल दिया नजरिया

हैट्रिक ने बदल दिया नजरिया

दिल्ली में लगातार तीसरी जीत पर अरविंद केजरीवाल ने कहा था यह नयी राजनीति की शुरुआत है। इस जीत ने एक नयी राजीनित को जन्म दिया है जिसका नाम है ‘काम की राजनीति'। इस नयी राजनीति ने केजरीवाल को भी कुछ नया करने के लिए प्रेरित किया। केजरीवाल को इस इस बात का अहसास हुआ कि अगर काम दमदार हो तो इनाम कुछ भी हो सकता है। सीएम की कुर्सी से भी बड़ा। अगर काम की राजनीति करनी है तो टकराव की राजनीति से दूरी बनानी होगी। नरेन्द्र मोदी से सीधा टकराव दूरगामी लक्ष्य में बाधक होगा। काम की राजनीति को कामयाब बनाना है तो प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की जरूरत पड़नी ही पड़नी है। मोदी से रिश्ते सुधरेंगे तो रास्ता आसान हो जाएगा। दूसरी तरफ मोदी से खार खाने वाले नेता केजरीवाल की जीत को संपूर्ण विपक्ष की जीत बताने का सपना संजोये हुए थे। वे केजरीवाल को एंटी मोदी फेस बनाने के लिए बेचैन थे। लेकिन केजरीवाल ने उनकी हसरत मिट्टी में मिला दी। वे अपने शपथ ग्रहण समारोह को विपक्षी एकता का मंच नहीं दर्शाना चाहते थे। केजरीवाल की राय में ये जीत दिल्ली वालों की थी। इसलिए उन्होंने ये जीत उन्हें ही समर्पित कर दी। ऐसा कर के उन्होंने मोदी की तरफ अमन का पैगाम भी भेज दिया।

 और बड़ी लकीर खींचने की तैयारी

और बड़ी लकीर खींचने की तैयारी

केजरीवाल अभी 51 साल के हैं। उनके सामने करीब डेढ़-दो दशक की राजनीति पड़ी है। जब समय है तो एजेंडा भी बड़ा सेट किया। माना जा रहा है उनकी नजर अब पीएम की कुर्सी पर है। बड़ा सपना देखना कोई बुराई नहीं। लेकिन इसके लिए लंबा और मुश्किल रास्ता तय करना होगा। राजनीति पंडितों की राय है कि केजरीवाल इस प्रचंड जीत के बाद विपक्षी दलों की भीड़ में खोना नहीं चाहते थे। विपक्षी खेमे में कोई किसी को नेता मानने के लिए तैयार नहीं। हर दल का अपना स्वार्थ। ऐसे लोगों के साथ गये तो इस जीत की धमक कम हो जाएगी। बिना हींग-फिटकिरी के विपक्षी दल इसमें साझीदार होंगे सो अलग। ये केजरीवाल की जीत है तो सिर्फ केजरीवाल की ही दिखनी चाहिए। ये सच है कि दिल्ली के बाहर ‘आप' कोई ताकत नहीं है। पीएम का सपना पत्थर पर दूब उगाने की तरह है। लेकिन सियासत में हवा के बदलते देर नहीं लगती। कभी भी करिश्मा हो सकता है। कौन कह सकता था कि दो सांसदों वाली भाजपा एक दिन केन्द्र में अकेले पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएगी ? एक नहीं बल्कि दो बार ? लेकिन ऐसा हुआ। एक न एक दिन जनता बेहतर विकल्प जरूर चुनती है।

क्या केजरीवाल बन सकते हैं मोदी का विकल्प ?

क्या केजरीवाल बन सकते हैं मोदी का विकल्प ?

नरेन्द्र मोदी अपनी राजनीति के चरम पर पहुंच गये हैं। दूसरा कार्यकाल पूरा होते-होते वे करीब 75 साल के हो जाएंगे। 2019 में नरेन्द्र मोदी को इस लिए भी जीत मिली थी क्यों कि विपक्ष के पास टक्कर का कोई नेता ही नहीं था। विकल्पहीन और कमजोर विपक्ष मोदी के सामने टिक नहीं पाया। 2024 में मोदी के सामने पहले से बड़ी चुनौतियां होंगी लेकिन फिर भी उन्हें हराने के लिए एक मजबूत नेता की जरूरत होगी। विपक्ष की मजबूरी होगी कि वह किसी को सर्वमान्य नेता चुने। चार साल में अगर केजरीवाल ने कुछ और बड़े काम कर लिये और दिल्ली के नजदीक कुछ राज्यों में कमाल कर दिया तो 2024 में तस्वीर बदल सकती है। केजरीवाल के लिए संभावनाओं के द्वार खुल सकते हैं। मोदी का मुकाबला कोई काम करने वाला नेता ही कर सकता सकता है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि केजरीवाल मोदी का विकल्प बनेंगे। लेकिन यह भी सच है लोगों ने उनके नाम पर काम करने वाले नेता की मुहर लगा दी है।

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
arvind Kejriwal swearing narendra modi invited Opposition not
For Daily Alerts
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more
X