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Male contraceptive pills: पुरूष क्यों नहीं, महिलाएं ही क्यों निभाएं यह जिम्मेदारी!

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बेंगलुरू। दुनियाभर में पुरूष प्रधान सोच का नमूना ही कहेंगे कि वर्ष 1970 में पुरूषों के लिए गर्भनिरोधक गोलियां विकसित करने को लेकर शुरू हुई खोज अभी तक पूरी अधूरी है। यह इसलिए है, क्योंकि 21वीं सदी में पहुंची दुनिया आज भी पुरूषवादी सोच और रवैये से उबर नहीं सकी है, जहां अभी भी महिलाओं से यह उम्मीद की जाती है कि गर्भ नहीं ठहरने की जिम्मेदारी वो ही उठाती रही। सवाल उठता है कि सार्वजनिक तौर पर महिला और पुरूष में अंतर नहीं करने का ढोंग नहीं करने वाला समाज आखिर वास्तविक धरातल पर जमींदोज क्यों हो जाती है।

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संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया भर में एक कपल्स किसी भी तरीके के गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल नहीं करते हैं और जो कपल्स गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करते हैं, इनमें महिलाओं द्वारा गर्भनिरोधकों को अपनाने का चलन ज्यादा है। अगर अब इसे पुरूषों की सोच मान लिया जाए तो यह जबरन महिलाओं पर थोपने जैसा ही कहा जाएगा। यह ठीक उसी तरह है जैसे कि वर्तमान समय में पुरूष कुकिंग सीख तो लेता है, लेकिन जब कुकिंग का मौका आता है, तो कुकिंग की जिम्मेवारी जन्मजात महिलाओं के हिस्से में डाल दी जाती है।

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वैसे, महिलाओं की तुलना में पुरुषों में प्रचलित एकमात्र गर्भनिरोधक कांडोम है, लेकिन माना जाता है कि कांडोम का चलन पुरूषों में बेहद कम है। आकंड़ों के मुताबिक महज 8 फीसदी पुरूष ही कांडोम का इस्तेमाल करते हैं और महज 2 फीसदी पुरूष ही नसबंदी कराते हैं जबकि पुरूषों के मुकाबले 19 फीसदी महिलाएं गर्भनिरोध के लिए नसबंदी, 14 फीसदी कॉपर टी , 9 फीसदी गर्भनिरोधक गोलियां और 5 फीसदी इंजेक्शन का इस्तेमाल करती हैं।

गौरतलब है गर्भवनिरोधक गोलियों के ईजाद होने से पूर्व पुरूषों को गर्भनिरोधक प्रक्रिया में शामिल होना पड़ता था, लेकिन वर्ष 1960 के दशक में जब महिलाओं के गर्भनिरोधक गोलियां बड़े पैमाने पर तैयार होने लगी तो गर्भनिरोधक का फैसला महिलाओ के हिस्से में डाल दिया गया। महिलाएं यह काम अपने पार्टनर को बताए बिना भी कर सकती थीं। वर्तमान में दुनियाभर में 10 करोड़ से अधिक महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करती हैं। यूरोप, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में गर्भनिरोधक का सबसे प्रचलित तरीका गोलियां है।

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हालांकि इस बीच यह जरूर हुआ कि गर्भनिरोधक गोलियों के आने से पिछले एक दशक में महिलाओं की जिंदगी थोड़ी आसान हुई है। गर्भनिरोधक गोलियों के कारण महिलाओं अब यह खुद तय करने में सक्षम हुई हैं कि उन्हें कब मां बनना है और कब नहीं। वरना पुरूषों पर डिपेंडेंट महिलाओं का हाल बुरा था और जब उन्हें जबरन मातृत्व के लिए मजबूर होना पड़ता था। गर्भनिरोधक गोलियों के चलते अब महिलाएं मातृत्व का चुनाव सोच-समझकर करने में सक्षम हुई है। यही कारण है कि महिला गर्भनिरोधक गोलियों की खोजको 20वीं सदी के महान आविष्कारों में गिनती की जाती है।

महिला गर्भ निरोधक गोलियों की वजह से ही वर्तमान में महिलाएं अब उच्च शिक्षा और नौकरी में ऊंचे ओहदे पर पहुंचने के लिए मातृत्व की योजनाबद्ध तरीके से प्लान कर रही हैं, जो महिला उसकी प्राथमिकता ही नहीं बल्कि सशक्तिकरण का भी द्योतक हैं। हालांकि जिस तेजी से समाज में लिंग आधारित समानता की बात हो रही है और उसका दायर बढ़ रहा है। ऐसे में पुरूषों के गर्भ निरोधिक गोलियों की खोज में देरी सवाल खड़े करता है।

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क्योंकि गर्भनिरोधक गोलियों के दुष्प्रभावों के अलावा भावनात्मक, सामाजिक, वित्तीय और समय सं संबंधित चुनौतियों का सामना पुरूषों की तुलना में आज भी महिलाओं को ही करना पड़ रहा है। महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक गोलियों की खोज जब हुई थी, तो यह एक दशक के भीतर पब्लिक के लिए उपलब्ध हो गई थी, लेकिन वर्ष 1970 में पुरूषों के लिए खोजी गई गर्भनिरोधक गोलियां आज भी मार्केट तक नहीं पहुंच सकी हैं, जो यह सवाल पैदा करते हैं कि कहीं तो कुछ गड़बड़ हैं।

हालांकि कुछ वैज्ञानिक तर्क देते हैं कि पुरूषों के लिए गर्भनिरोधक गोलियों का विकास करने की प्रक्रिया महिलाओं की गर्भनिरोधक गोलियों की तुलना में अधिक जटिल है, क्योंकि पुरूषों की गर्भ निरोधक स्पर्प उत्पादन को रोककर अपना काम करती है, लेकिन ऐसान करने के लिए जिस हार्मोन की जरूरत होती है उसके साइड इफेक्ट्स होते हैं। यही कारण है कि 1970 के दशक से अब तक करीब 50 वर्ष बाद पुरूष गर्भनिरोधक गोलियों को लाया नहीं जा सका है। इसके अलावा इसके पीछे कुछ सामाजिक और आर्थिक कारण भी हैं।

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दरअसल, प्रजनन संबंधी विज्ञान और मेडसिन की दुनिया मुख्य तौर पर महिलाओ के शरीर पर केंद्रित है, इसमें पुरूषों की अनदेखी की जाती है। उदाहरण के लिए , हर कोई यह तो जानता है कि स्त्री रोगों के लिए गायनकोलॉजिस्ट क्या करते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि एंड्रोलॉजिस्ट कौन होते हैं। एंड्रोलॉजिस्ट पुरूषों के प्रजनन संबंधी विज्ञान के बारे में अध्ययन को कहा जाता है, जिसके बारे में इक्का-दुक्का लोग ही जानने वाले मिल सकते हैं।

माना जाता है कि पुरूषों के प्रजनन संबंधी विज्ञान में दक्षता के लिए एंड्रोलॉजिस्ट का अध्ययन किया जाता है, लेकिन भारत जैसे देश में पुरूष चिकित्सक भी गायनकोलॉजिस्ट का अध्ययन करते हैं, क्योंकि पारंपरिक रूप से पुरूष प्रजनन के लिए महिला को ही जिम्मेदार मानकर चलते हैं।

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होना तो यह चाहिए कि पुरूष को गायनोकोलॉजिस्ट के अध्ययन के बजाय एंड्रोलॉजिस्ट का अध्ययन अनिवार्य बनाया जाना चाहिए और महिला के लिए गायनोकोलॉजिस्ट का अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए। कहा जाता है कि पुरूषों के गर्भनिरोधक गोलियों के लिए रिसर्च के लिए का फंड की कमी है जबकि पुरूषों के ऐसी गोलियों की खोज का काम महिलाओं की गर्भनिरोधक गोलियों की खोज के बाद शुरू कर दिया गया था, जिसको अब 50 वर्ष बीत चुके हैं।

उल्लेखनीय है पुरूषों के लिए गर्भनिरोधक गोलियों के विकसित करने के लिए पीछे का मूल कारण पुरूषों की सेक्सुअलिटी है। दरअसल, क्लीन शीट्स पर रिसर्च आधारित पुरूष गर्भनिरोधक गोली के उपयोग से सेक्स के दौरान पुरूषों में स्पर्म बनना बंद हो जाएगा। यही वजह है कि पुरूष गर्भनिरोधक गोली का काम अटका हुआ है।

क्योंकि स्पर्म के निकलने को पुरूषों के सेक्सुअलिटी के लिए अह्म माना जाता है और अगर क्लीन शीट्स पर आधारित गर्भनिरोधक पर काम शुरू हुआ तो गोली खाने से पुरूषों को सेक्सुलिटी बर्बाद होने का खतरा है। इसके पीछे एक पारंपरिक धारणा यह है कि गर्भनिरोधक महिलाएं ही कर सकती है, क्योंकि अधिकांश पुरूष गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल नहीं करते हैं, फिर चाहे वह कांडोम हो अथवा पुरूष नसबंदी।

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आकंड़ों के मुताबिक पुरूषों में नसबंदी की प्रक्रिया 200 साल पहले शुरू हुई थी, लेकिन फिर भी महिलाओं की नसबंदी पुरूषों की तुलना में 10 गुना ज्यादा होती है। इसलिए पुरूषों की गर्भनिरोधक गोलियों को विकसित कर लेने के बाद भी कोई गारंटी नहीं है कि पुरूष उसका भी इस्तेमाल करेंगे। इसके लिए सबसे पहले जरूरी ही लैंगिक समानता पर काम किया जाए और जब तक इसका दायरा नहीं बढ़ेगा पुरूष और महिला के बीच खाई कभी नहीं पटेगी।

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English summary
After 50 years of research Anti Pregnancy Pills for men not developed. Seems researcher are biased to develop anti pregnancy pills for men and they consider women should take the responsibility!
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