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अनीता का दिल तोड़ने वाला वीडियो जो अपने परिवार के साथ सागर में समा गई

By जियार गोल
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अनीता का दिल तोड़ने वाला वीडियो जो अपने परिवार के साथ सागर में समा गई

कुर्द मूल की ईरानी बच्ची अनीता का एक वीडियो दिखाता है कि इंग्लिश चैनल पार करने की कोशिश करता एक परिवार ने कैसे विदेश में एक बेहतर ज़िंदगी के सपने संजोए थे.

इस वीडियो क्लिप में नौ साल की बच्ची कभी हंसती है, कभी रोती है. वो कहती है - 'मेरा नाम अनीता ईरानजाद है, मैं सारदश्त से हूं.'

ये उनके गृहनगर में ही शूट होने वाली एक शॉर्ट फ़िल्म के लिए स्क्रीन टेस्ट था. वीडियो के बैकग्राउंड में उसके पिता रसूल ईरानजाद कहते सुनाई पड़ते हैं, 'मैं एक अभिनेत्री बनना चाहती हूं... ऐसा कहो.'

इस वीडियो में सिर्फ़ एक पिता का गर्व ही नहीं बल्कि उम्मीदें भी दिखाई देती हैं. रसूल चाहते थे कि उनकी बेटी अपना सपना पूरा करे. लेकिन ये एक राजनीतिक रूप से शोषित और पिछड़े इलाक़े की एक लड़की के लिए बहुत बड़ा सपना था.

ये परिवार पश्चिमी ईरान के एक कुर्द बहुल क़स्बे सारदश्त का रहने वाला है.

इस वीडियो के शूट होने के एक साल बाद रसूल, उनकी पत्नी शिवा पनाही और तीन बच्चे अनीता, छह साल का बेटा आर्मिन और 15 महीने की बच्ची आर्तिन यूरोप की ख़तरनाक यात्रा पर निकल गए.

लेकिन बेहतर ज़िंदगी की परिवार की उम्मीदों का 27 अक्तूबर को इंग्लिश चैनल में बहुत ही दुखद अंत हो गया.

ख़राब मौसम में ब्रिटेन की ओर बढ़ रही उनकी छोटी नाव डूबने लगी. अनीता और तीनों बच्चे छोटे से कैबिन में फंसे थे. उनके पास लाइफ़ जैकेट नहीं थी.

35 साल के रसूल ने अगस्त में अपने परिवार के साथ ईरान छोड़ दिया था. उनके रिश्तेदार इसकी वजह बताते हुए कतराते हैं. लेकिन ऐसे बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि रसूल कहीं और अपनी ज़िंदगी को फिर से शुरू करना चाहते थे.

ईरान के पश्चिमी अज़रबैजान प्रांत में सारदश्त एक छोटा सा क़स्बा है. ये इराक़ की सीमा के क़रीब है. यहां के लोगों के लिए ज़िंदा रहना ही एक संघर्ष है. सपनों को पूरा करने के लिए ये एक बहुत मुश्किल जगह है.

यहां कोई महत्वपूर्ण उद्योग नहीं है, बेरोज़गारी स्तर देश में सबसे ज़्यादा है. यहां की कुर्द मूल की आबादी के लिए आगे बढ़ने की संभावनाएं बहुत ही सीमित हैं.

बहुत से लोग इराक़ के कुर्दिस्तान से सामानों की तस्करी का काम कारते हैं. ये ना ही बहुत फ़ायदे का सौदा है और ना ही बहुत सुरक्षित. बहुत से लोग एक ट्रिप पर सिर्फ़ दस डॉलर तक ही कमाते हैं.

बीते कुछ सालों में सैकड़ों तस्करों को ईरानी बॉर्डर गार्डों ने गोली मार दी है. कई लोग दुर्गम पहाड़ी चट्टानों से गिर कर मर गए हैं या सर्दियों में बर्फ़ के नीचे दफ़न हो गए हैं.

इस इलाक़े में सैन्यबलों की भी भारी मौजूदगी है. 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से ही ईरान के सुरक्षा बलों और हथियारबंद कुर्द समूहों के बीच झड़पें होती रहती हैं. ईरान अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे इन कुर्द बलों को विदेशी मदद प्राप्त अलगाववादी मानता हैं.

ईरान की 8.2 करोड़ आबादी में क़रीब दस प्रतिशत कुर्द हैं. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक देश की जेलों में बंद आधे से अधिक राजनीतिक क़ैदी कुर्द हैं.

ईरान में बीते साल हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बाद से ईरान की एजेंसियों ने बड़े पैमाने पर कुर्द लोगों को प्रताड़ित किया है.

ये प्रदर्शन इराक़ से लगी पश्चिमी सीमा के पास बसे कुर्द बहुल शहरों में शुरू हुए थे और ईरान के कई बड़े शहरों तक पहुंचे थे.

शिवा की एक दोस्त ने बीबीसी को बताया है कि रसूल सरकारी एजेंसियों से बचना चाहते थे.

इस दोस्त के मुताबिक शिवा के परिवार के पास जो कुछ भी था वो उन्होंने बेच दिया था और यूरोप जाने के लिए तस्करों को पैसा देने के लिए उन्होंने दोस्तों और परिजनों से उधार लिया था.

वो ब्रिटेन पहुंचना चाहते थे जो कुर्द प्रवासियों की पसंदीदा जगह है.

ग्रैंड सिंथे कैंप
BBC
ग्रैंड सिंथे कैंप

उनका मानना था कि ब्रिटेन यूरोप के बाकी देशों के मुकाबाले सीमित संख्या में प्रवासियों को स्वीकार करता है ऐसे में वहां उनके पास बेहतर मौके होंगे.

इस परिवार का पहला ठिकाना तुर्की था. रसूल के दोस्तों ने बीबीसी के साथ एक वीडियो क्लिप साझा की है जिसमें वो कुर्दी भाषा में गीत गा रहे हैं. इस वक़्त उनका परिवार यूरोप ले जाए जाने के लिए तस्करों का इंतज़ार कर रहा था.

रसूल गा रहे हैं, "मेरे दिल में दर्द है, गहरा ग़म है.....लेकिन मैं क्या करूं, मुझे अपने कुर्दिस्तान को छोड़ना है और जाना है..."

रसूल जब ये गीत गा रहे थे उनका बेटा आर्मिन हंस रहा था. उनकी बेटी आर्तिन आकर उनकी गोद में बैठ जाती है.

कुर्द लोगों की एक मशहूर कहावत हैः 'पहाड़ों के सिवा हमारा कोई दोस्त नहीं है.'

पहले विश्व युद्ध के बाद जब उस्मानिया सल्तनत का अंत हो गया था, विजेता पश्चिमी देशों ने कुर्दों को आज़ादी देने का वादा किया था लेकिन क्षेत्रियों शक्तियों ने कभी उस समझौते को स्वीकार नहीं किया.

आज़ाद राष्ट्र के बजाए, कुर्दों की ज़मीन मध्य पूर्व के नए स्वतंत्र हुए देशों में बंट गई.

इसके बाद से जब-जब कुर्दों ने ईरान, तुर्की, सीरिया या इराक़ में आज़ादी की आवाज़ उठाई है, उन्हें बेरहमी से कुचल दिया गया है.

पहले तुर्की ईरानी शरणार्थियों की पसंदीदा जगह हुआ करता था. लेकिन बीते सात सालों में वहां भी माहौल बदल गया है और अब ये कुर्द शरणार्थियों के लिए ठिकाना नहीं रहा है.

प्रवासियों के बारे में ऐसी रिपोर्टें हैं कि तुर्की के सैन्यबलों ने पुलिस स्टेशनों में कुर्द शरणार्थियों का उत्पीड़न किया या फिर उन्हें वापस ईरान भेज दिया.

इस्तांबुल में ईरानी मूल के कई लोगों की राजनीतिक हत्या और अपहरण की वारदातें हुई हैं.

ऐसे में रसूल और शिवा अपने परिवार के साथ तुर्की से आगे बढ़ने को लेकर आतुर थे.

परिवार लून प्लाज नाम के इसी बीच से सफर पर निकला था
BBC
परिवार लून प्लाज नाम के इसी बीच से सफर पर निकला था

सितंबर में उन्हें एक तस्कर मिल गया और उन्होंने उसे क़रीब 28 हज़ार डॉलर चुकाए. ये तस्कर उन्हें तुर्की से इटली और फिर लॉरी से उत्तरी फ्रांस ले गया.

फ्रांस के तटीय शहर डनकर्क में एक चैरिटी के साथ काम करने वाली स्वयंसेवक शार्लट डेकांटर शिवा को कुर्द शरणार्थियों के कैंप में मिलीं थीं. वो वहां खाना बांटने गईं थीं.

वो उनकी ज़िंदादिली से बहुत प्रभावित हुईं थीं.

'वो एक छोटी सी महिला थीं, बहुत दयालु और मीठी बोली वाली. मैंने कुर्द भाषा में कुछ शब्द कहे तो वो बहुत ज़ोर से हंसी. वो चौंक गईं थीं.'

लेकिन फ़्रांस में कहीं शिवा और रसूल दुर्घटना का शिकार हो गए थे. उनका सारा सामान लूट लिया गया था.

24 अक्तूबर को कैले में रह रहे एक दोस्त को भेजे संदेश में शिवा ने बताया था कि नाव से यात्रा ख़तरनाक होगी लेकिन लॉरी से जाने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं.

टेक्स्ट संदेश में उन्होंने कहा था, "मैं जानती हूं कि ये ख़तरनाक है लेकिन हमारे पास और कोई विकल्प नहीं है."

वो ये बताती हैं कि वो शरण पाने के लिए कितनी बेताब थीं.

'मेरे दिल में हज़ारों ग़म हैं लेकिन अब जब मैंने ईरान छोड़ दिया है तो मैं अपनी पुरानी ज़िंदगी को भूल जाना चाहती हूं.'

रसूल के परिवार के साथ फ़्रांस जाने वाला उनका एक मित्र बताता है कि 26 अक्तूबर को डनकर्क में तस्कर ने उन्हें बताया था कि अगले दिन इंगलिश चैनल पार किया जाएगा.

इब्राहिम मोहम्मदपुर
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इब्राहिम मोहम्मदपुर

वो सुबह-सुबह एक तेल डिपो के पास दुर्गम स्थान से बीच के लिए निकले. ये जगह लून प्लाज बीच पर है.

मौसम बहुत ख़राब था, कोई डेढ़ मटीर ऊंची लहरे उठ रही होंगी. हवा तीस किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से चल रही थी.

रसूल के दोस्त ने ये खतरनाक सफर न करने का फैसला लिया.

वो बताता है, "मैं डर गया था, मैंने ना जाने का फ़ैसला लिया. मैंने रसूल से कहा कि वो ये ख़तरा ना उठाए लेकिन उसने कहा कि उसके पास और कोई रास्ता नहीं है."

ईरान में रह रहे रिश्तेदारों के मुताबिक रसूल ने तस्करों को क़रीब साढ़े पांच हज़ार ब्रितानी पाउंड दिए थे.

सारदास्त के रहने वाले अभिनेता और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्ममेकर 47 वर्षीय इब्राहिम मोहम्मदपुर भी अपने 27 साल के भाई मोहम्मद और 17 साल के बेटे के साथ उस नौका पर सवार थे.

इब्राहिम अन्य लोगों के साथ
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इब्राहिम अन्य लोगों के साथ

इब्राहिम कहते हैं कि ये नाव सिर्फ़ साढ़े चार मीटर लंबी थी और इसमें आठ लोगों की जगह थी ना कि 23 लोगों की जो उसमें ठूंस-ठूंस कर भर दिए गए थे.

इब्राहिम कहते हैं, "ईमानदारी से कहूं तो हम सब अंधे हो गए थे क्योंकि इस यात्रा में हम बहुत कुछ झेल चुके थे. पहले मन में विचार आया कि इस नाव पर नहीं बैठना है लेकिन फिर मन कहता है कि बैठ जाओ ताकि इस दुख से पीछा छूटे."

16 साल के यासीन जो नौका पर सवार थे बताते हैं कि सिर्फ़ उन्होंने और दो और लोगों ने लाइफ़ जैकेट पहना था. रसूल के परिवार में किसी ने जैकेट नहीं पहना था.

इस नौका पर सवार सभी 22 यात्री सारदश्त के कुर्द थे जबकि नाविक उत्तरी ईरान का एक शरणार्थी था.

पहले ब्रिटेन की यात्रा कर चुके ये ईरानी प्रवासी बताते हैं कि तस्कर उस व्यक्ति से नौका चलाने के लिए कहते हैं जिसके पास उन्हें देने के लिए सबसे कम पैसे होते हैं.

शिवा और बच्चे शीशे के बने केबिन में चले गए. ये उन्हें सुरक्षित और कुछ गर्म लगा होगा लेकिन यही सबसे ख़तरनाक साबित हुआ.

इब्राहिम के मुताबिक करीब आठ किलोमीटर की यात्रा के बाद नाव में पानी भर गया.

वो कहते हैं, "हमने पानी बाहर निकालने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे. हमने वापस कैले लौटने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे."

उनके भाई मोहम्मद कहते हैं कि नौका में सवार लोग डरने लगे. वो नाव में एक तरफ से दूसरी तरफ जा रहे थे और अचानक नाव डूब गई.

इसके बाद क्या हुआ ये स्पष्ट तौर पर कह पाना मुश्किल है क्योंकि ज़िंदा बचे लोगों के बयान इसे लेकर स्पष्ट नहीं हैं.

सभी बताते हैं कि शुरुआत में शिवा और बच्चे केबिन में फंसे थे.

इब्राहिम बताते हैं कि रसूल पानी के भीतर गए और उन्हें बचाने की कोशिश की और फिर बाहर आकर मदद की गुहार लगाई.

यूनिवर्सिटी छात्र पेशरा कहते हैं कि उन्होंने शीशे की केबिन को तोड़ने की कोशिश की लेकिन वो नाकाम रहे.

वो बताते हैं कि उन्होंने मासूम आर्तिन को पानी में तैरते देखा.

मृत परवार को श्रृद्धांजलि
Getty Images
मृत परवार को श्रृद्धांजलि

शिवा के भाई रासो बताते हैं कि उन्होंने सुना है कि रसूल ने आर्तिन को बाहर निकाल लिया था और फिर बाकी को निकालने दोबारा भीतर गए थे.

इब्राहिम की आंखों में उन पलों को याद करके आंसू आ जाते हैं.

उन्होंने अनिता को पानी पर तैरते हुए देखा था और उसका हाथ थामने में कामयाब रहे थे

वो कहते हैं, 'मैंने पानी में उस बच्ची का हाथ पकड़ा, मैं सोच रहा था कि वो ज़िंदा है. एक हाथ से मैंने नाव पकड़ी हुई थी और एक हाथ से उसका हाथ, मैं उसे बार-बार हिला रहा था कि कुछ हरकत हो लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.'

वो रोते हुए कहते हैं, 'मैं कभी अपने आप को माफ़ नहीं कर पाउंगा.'

इब्राहिम के भाई मोहम्मद के मुताबिक रसूल रोते हुए पानी से बाहर निकल आए थे और फिर उन्होंने अपने आप को लहरों के साथ बह जाने दिया.

फ्रांसीसी अधिकारियों के मुताबिक स्थानीय समयानुसार सुबह 09.30 बजे पास से गुज़र रही एक नौका ने अलार्म बजाया. इसके 17 मिनट बाद पहला बचाव जहाज़ मौके पर पहुंचा.

अधिकारियों के मुताबिक कुछ लोगों को दिल का दौरा पड़ने की स्थिति में पानी से बाहर निकाला गया था. इससे ज़्यादा जानकारी उन्होंने नहीं दी.

ज़िंदा बचे जिन लोगों से हमने बात की उनका मानना है कि रसूल, उनकी पत्नी शिवा, बेटी अनीता और आर्मिन मारे जा चुके थे. पंद्रह अन्य लोगों को अस्पताल ले जाया गया. बेबी आर्तिन का अभी पता नहीं चला है. हालांकि उसे भी मृत मान लिया गया है.

यासीन कहते हैं कि उन्होंने आर्तिन को लहरों में बहते देखा था.

एक ईरानी नागरिक जिसे नाव का कप्तान माना जा रहा है फ्रांस में जज के सामने पेश हुआ है. उस पर हत्या के आरोप हैं.

शिवा के भाई और बहन यूरोप में रहते हैं, वो शवों को देखने डनकर्क पहुंचे.

इंगलिश चैनल की खतरनाक यात्रा करने वाले प्रवासियों की संख्या बढ़ती जा रही है.

2018 में छोटी नावों से 297 लोग ब्रिटेन पहुंचे थे, 2019 में 1840 लोग पहुंचे हैं.

बीबीसी के विश्लेषण के मुताबिक इस साल अब तक क़रीब 8 हज़ार लोग ये यात्रा कर ब्रिटेन पहुंच चुके हैं.

2019 के बाद से अब तक कम से कम दस लोगों की इस जोख़िम भरी यात्रा के दौरान मौत हो चुकी है.

इनमें से अधिकतर प्रवासी ईरान से हैं.

शरणार्थियों के लिए काम करने वाली संस्थाएं और फ्रांसीसी अधिकारियों का कहना है कि ब्रिटेन में शरण लेने से पहले लोगों को आवेदन करने की सुविधा दी जानी चाहिए.

इब्राहिम बताते हैं कि ज़िंदा बचे लोग बुरे सपनों से जूझ रहे हैं.

इस सबके बावजूद यासीन का कहना है कि वो दोबारा चैनल पार करने की कोशिश करेंगे.

'हम सब बहुत दुखी थे, मैं बहुत डर भी गया था. लेकिन मैं बस एक सुरक्षित जगह पहुंचना चाहता हूं. मैं दोबारा कोशिश करूंगा.'

BBC Hindi
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English summary
Anita's heart-breaking video that ended with her family in the ocean
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