‘छतर जात्रा’ में मां मणिकेश्वरी को ‘प्रसन्न’ करने के लिए दी गई पशुओं की बलि
ओडिशा के भवानीपटना में प्रशासन की अपील के बाद भी वार्षिक 'छत्तर यात्रा' में हजारों पशुओं की बलि दे दी गई। जबकि, प्रशासन की ओर से बार बार पुश बलि न देने की अपील की जा रही थी। यहां हर महाष्टमी, दुर्गा पूजा के आठवें दिन, ओडिशा के आदिवासी बहुल कालाहांडी के जिला मुख्यालय भवानीपटना की सड़कें पर ऐसा नजारा देखने को मिलता है। आदिवासी और गैर-आदिवासी दोनों समुदाय सार्वजनिक पशु बलि में भाग लेते हैं।
कंधा जनजातियाँ की धार्मिक भावनाओं से इसके गहरे जुड़ाव के कारण वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी भी इस प्रथा को रोकने में असहाय नजर आते हैं।

नाम न बताने का अनुरोध करते हुए एक वरिष्ठ मजिस्ट्रेट ने कहा, "हालांकि प्रशासन ने पशु बलि के खिलाफ कई जागरूकता अभियान चलाए, लेकिन लोग इसे शायद ही क्रूरता का कार्य मानते हैं।" अधिकारी ने कहा कि हालांकि यह प्रथा पीढ़ियों से चली आ रही है, लेकिन हर साल वध किए जाने वाले पशुओं की संख्या में कमी आई है।
अधिकारी ने बताया, "कालाहांडी के जिला मजिस्ट्रेट सचिन पावर ने वरिष्ठ अधिकारियों, पुलिस और जनप्रतिनिधियों के साथ कई बैठकें कीं। लोगों को पशु बलि से दूर रहने के लिए सार्वजनिक संबोधन प्रणाली और सोशल मीडिया पर घोषणा की गई। लेकिन पुरानी मान्यता और परंपरा के कारण भक्तों पर इसका कोई असर नहीं हुआ।"
हजारों भक्तों ने अपनी मनोकामना पूरी होने के प्रतीक के रूप में छत्र से पहले कबूतर भी उड़ाए। परंपरा के अनुसार, 'छतर यात्रा' मध्यरात्रि में मुख्य मंदिर में अनुष्ठानिक गुप्त पूजा के बाद जेनाखाल से मां मणिकेश्वरी की वापसी का प्रतीक है। सुबह करीब 4 बजे 'जेना बाद्या' और 'घुमुरा बाद्या' जैसे ढोल बजाते हुए शुरू हुआ जुलूस दोपहर तक मुख्य मंदिर तक 3 किलोमीटर की दूरी तय कर चुका था। एक पुजारी ने बताया कि यह कार्यक्रम एक भैंसे की गुप्त बलि से शुरू होता है, जिसके बाद सड़कों पर सामूहिक पशु बलि दी जाती है।
दोपहर के करीब मंदिर के गेट पर पहुंचने पर शाही परिवार के सदस्य महाराजा अनंत प्रताप देव ने जुलूस का स्वागत किया। कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए 15 प्लाटून (प्रत्येक में 30 कर्मी) तैनात किए गए थे, क्योंकि इस अवसर पर तीन लाख से अधिक लोग एकत्र हुए थे।












Click it and Unblock the Notifications