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इलाहाबाद यूनिवर्सिटीः छात्र आंदोलन का अड्डा क्यों बन गया है 'पूरब का ऑक्सफ़ोर्ड'?

By समीरात्मज मिश्र

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी
jitendra tripathi/ BBC
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी

"मैं बुंदेलखंड से आता हूं. बीए तृतीय वर्ष का छात्र हूं. विश्वविद्यालय में पढ़ाई का कोई माहौल ही नहीं रह गया है. ठीक से कक्षाएं नहीं चलती हैं, पढ़ाने के लिए सिर्फ़ गेस्ट टीचर्स आते हैं, जो खानापूर्ति करके चले जाते हैं. सक्षम अधिकारियों से कोई शिकायत करो तो सस्पेंड करने या फिर घरवालों को बता देने की धमकी दी जाती है. पता नहीं कैसे कहा जाता था कि ये विश्वविद्यालय आईएएस तैयार करने की फ़ैक्ट्री है. जो पढ़ाई यहां होती है, उस पढ़ाई से तो कभी कोई आईएएस जैसी परीक्षा नहीं पास कर सकता है."

ये कहना था इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक छात्र सिद्धार्थ का.

सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के छात्र संघ भवन की तरफ जाने वाले प्रवेश द्वार से भीतर आ रहे थे. प्रवेश द्वार के दोनों दरवाज़ों को लोहे की एक मज़बूत चेन से बांधा गया है और बीच में सिर्फ़ इतनी ही जगह छोड़ी गई है जिससे छात्र नीचे सिर झुकाकर वहां प्रवेश कर सकें.

सिद्धार्थ मुस्कराते हुए इस बात पर भी आपत्ति जताते हैं कि 'भीतर घुसते ही उन्हें झुकने पर मजबूर किया जाता है.'

विश्वविद्यालय में अपनी समस्याओं को लेकर छात्र आंदोलन और संघर्ष अक़्सर करते हैं और मांगें मान ली जाने या फिर उनकी शिकायतों का निपटारा हो जाने के बाद आंदोलन समाप्त भी हो जाते हैं लेकिन पिछले तीन साल से किसी न किसी मुद्दे को लेकर यहां आंदोलनों का जो सिलसिला शुरू हुआ वो अब तक चल रहा है.

विश्वविद्यालय प्रशासन

छात्रों की समस्याओं और उनके आंदोलनों को विश्वविद्यालय प्रशासन महज़ कुछ छात्रों की 'महत्वाकांक्षा' बताकर इससे आम छात्रों के जुड़ाव को नकार देता है.

शायद यही वजह है कि छात्र अब अपने सभी आंदोलनों की मांगों में एक अतिरिक्त मांग 'कुलपति हटाओ' को भी जोड़ देते हैं.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के चीफ़ प्रॉक्टर प्रोफ़ेसर रामसेवक दुबे कहते हैं, "यहां 26 हज़ार छात्र पढ़ते हैं. पढ़ने वाले छात्रों को किसी तरह की कोई समस्या नहीं है. समस्या सिर्फ़ कुछेक ऐसे छात्रों को है जिनका पढ़ाई-लिखाई से कुछ भी लेना-देना नहीं है बल्कि इसके ज़रिए वो एक राजनीतिक प्लेटफ़ॉर्म की तलाश में हैं. आप आम छात्रों से इस बारे में ख़ुद जाकर पूछ सकते हैं."

विश्वविद्यालय के छात्रों ने सबसे पहले ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा प्रणाली को लेकर आंदोलन शुरू किया था.

साल 2016 में विश्वविद्यालय ने सभी प्रवेश परीक्षाएं ऑनलाइन कराने का फ़ैसला किया जिसका छात्रों ने ये कहते हुए विरोध किया कि तमाम छात्र ग्रामीण पृष्ठभूमि के हैं और वो ऑनलाइन प्रक्रिया को ठीक से नहीं समझ पा रहे हैं इसलिए ऑफ़लाइन का भी विकल्प दिया जाए.

प्रोफ़ेसर रामसेवक दुबे
jitendra tripathi/bbc
प्रोफ़ेसर रामसेवक दुबे

मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद

कई दिनों तक संघर्ष होता रहा, पठन-पाठन ठप रहा, आख़िरकार मानव संसाधन मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन को अपना फ़ैसला बदलना पड़ा.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष रहे रोहित मिश्र कहते हैं, "कुलपति ने उस मुद्दे को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया और ज़िद पर अड़ गए. उन्होंने ये नहीं सोचा कि बड़ी संख्या में छात्र ऐसे हैं जो प्रतिभाशाली होते हुए भी संसाधनों की कमी के कारण इतनी तकनीकी दक्षता हासिल नहीं कर पाए हैं कि ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा में बैठ सकें. कुलपति ने छात्रों के निवेदन पर फ़ैसला नहीं बदला, लेकिन मंत्रालय के दबाव में उन्हें झुकना पड़ा."

इसके बाद छात्रावासों से पुराने छात्रों को निकालकर नए छात्रों को आवंटित करने और फ़ीस वृद्धि को लेकर भी छात्रों का आंदोलन महीनों चलता रहा.

अप्रैल 2017 में हॉस्टल खाली कराने के विरोध में आंदोलन कर रहे क़रीब दो हज़ार छात्रों के ख़िलाफ़ विश्वविद्यालय प्रशासन ने मुक़दमा दर्ज कराया और बड़ी संख्या में छात्र गिरफ़्तार भी किए गए.

विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई बार छात्रों पर लाठी चार्ज हुआ जिसमें बड़ी संख्या में छात्र घायल हुए और महीनों विश्वविद्यालय परिसर और कई छात्रावास पुलिस छावनी में तब्दील रहे.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष रहे रोहित मिश्र
jitendra tripathi/ bbc
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र संघ अध्यक्ष रहे रोहित मिश्र

हॉस्टल का मुद्दा

आंदोलन के दौरान कई छात्र आमरण अनशन पर बैठे रहे. छात्रों ने परीक्षा होने तक हॉस्टल में रहने की मोहलत मांगते हुए प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को ख़ून से पत्र भी लिखा लेकिन इतना सब करने के बाद भी छात्र अपनी मांगों को मनवाने में सफल नहीं हो सके.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की शोध छात्रा नेहा यादव भी इस आंदोलन में शामिल थीं.

इसके लिए विश्वविद्यालय से उन्हें निलंबित कर दिया गया और छात्रावास से बाहर कर दिया गया.

नेहा यादव कहती हैं, "मौजूदा समय में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पास कुल मिलाकर 15 हॉस्टल हैं, जिनमें क़रीब आठ हज़ार छात्र-छात्राएं रह रहे हैं. साल 2005 में विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने के बाद सिर्फ़ एक हॉस्टल बन सका है. यानी सिर्फ़ एक तिहाई पंजीकृत छात्र ही यहां हॉस्टल पाने में सफल होते हैं. बाकी छात्रों को बाहर किराये के कमरों में रहना होता है."

विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि एक तो छात्रावासों में कमरे कम हैं, उस पर तमाम बाहरी छात्र जबरन कई सालों से क़ब्ज़ा किए बैठे थे, इसलिए उन्हें खाली कराना ज़रूरी था.

नेहा यादव
jitendra tripathi/ bbc
नेहा यादव

छात्र संघ बहाली का आंदोलन

छात्रों की आपत्ति इस बात को लेकर थी कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने परीक्षा से ठीक पहले सभी छात्रों को दो महीने के लिए हॉस्टल खाली कर देने को कहा था.

हॉलैंड हॉल छात्रावास में रहने वाले आनंद सिंह बताते हैं, "वीसी ने हॉस्टल वॉश आउट का जिस तरह से फ़ैसला लिया, वैसा सिस्टम इलाहाबाद में नहीं है. हमारी मांग थी कि आप रेड डालिए और अवैध लोगों को बाहर निकालिए लेकिन इनकी ज़िद थी कि हम दो महीने के लिए सारे हॉस्टल खाली कराएंगे और फिर नए सिरे से उसका आवंटन करेंगे. ऐसे में जो छात्र वैध रूप से रह रहे हैं कहां जाते? लेकिन हॉस्टल को पुलिस के बल पर खाली कराया गया और हम लोग परीक्षा के वक़्त इधर-उधर भटकते रहे."

हालांकि 924 रुपये से बढ़ाकर 2975 रुपये की फ़ीस वृद्धि के प्रस्ताव को छात्रों के लंबे प्रतिरोध के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने वापस ले लिया था.

इसके बाद पिछले दिनों छात्रावासों की फ़ीस में की गई बढ़ोत्तरी को लेकर छात्र एक बार फिर सड़कों पर उतर आए. लेकिन इन सबसे ज़्यादा हंगामेदार रहा छात्र संघ बहाली का आंदोलन जो अब तक जारी है.

लिंगदोह कमिटी की सिफ़ारिशें

इसी साल जुलाई महीने में विश्वविद्यालय प्रशासन ने क़रीब 100 साल पुरानी छात्र संघ की परंपरा को ख़त्म करके उसकी जगह छात्र परिषद के गठन का फ़ैसला किया.

छात्र परिषद में पहले हर कक्षा से दो प्रतिनिधि चुने जाने थे और फिर वही प्रतिनिधि छात्र परिषद के पदाधिकारियों का चुनाव करते थे.

छात्रों ने आरोप लगाया कि इसके ज़रिए न सिर्फ़ विश्वविद्यालय की गौरवशाली छात्र संघ की परंपरा को ख़त्म किया जा रहा है बल्कि छात्रों के हितों के लिए संघर्ष करने वाले छात्र नेताओं की जगह विश्वविद्यालय प्रशासन अपने चुनिंदा लोगों को बैठाना चाहता है.

हालांकि प्रॉक्टर प्रोफ़ेसर रामसेवक दुबे कहते हैं कि ऐसा लिंगदोह कमिटी की सिफ़ारिशों के तहत किया गया है जिसके लिए कोर्ट ने निर्देश दे रखे हैं.

विश्वविद्यालय ने छात्रों के विरोध के बावजूद छात्र परिषद गठित करने की कोशिश की लेकिन दिलचस्प बात ये है कि अंतिम समय तक महज़ कुछेक छात्रों ने नामांकन किया और मतदान से ठीक पहले उन कुछेक छात्रों ने भी अपना नामांकन वापस ले लिया.

पहचान सार्वजनिक होने को लेकर सतर्क

छात्र नेता आदिल हमज़ा कहते हैं, "दरअसल, हॉस्टल के ज़रिए ही छात्र विश्वविद्यालय प्रशासन के तानाशाही रवैये के ख़िलाफ़ एकजुट होते थे. ऐसे में वीसी को लगा कि हॉस्टल से छात्रों को हटाओ और अपने ख़ास छात्रों को दे दो, ताकि एकजुटता होने ही न पाए.''

''विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों के भीतर इतना ख़ौफ़ पैदा कर दिया है कि विरोध तो छोड़िए, अपनी समस्या लेकर भी कोई छात्र विभागाध्यक्ष या फिर प्रॉक्टर से मिलने यदि चला गया तो उसके मां-बाप से शिकायत कर देने की धमकी दे दी जाती है. यही वजह है कि तमाम छात्र परेशान हैं लेकिन कैमरे के सामने वो अपनी शिकायत कभी नहीं करेंगे."

विश्वविद्यालय परिसर के भीतर ऐसे तमाम छात्र मिले भी जिन्होंने इन सभी समस्याओं को लेकर हामी भरी लेकिन अपनी पहचान सार्वजनिक होने को लेकर वो सतर्क भी थे.

इस मुद्दे पर हुए बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम में शामिल एक छात्र ने कार्यक्रम के बाद सीधे पूछ ही लिया, "सर, हमें कुछ होगा तो नहीं? कहीं ऐसा न हो कि कोई नोटिस मिल जाए या फिर कोई कार्रवाई हो जाए."

छात्रों पर लाठीचार्ज

विश्वविद्यालय प्रशासन ने हॉस्टल वॉशआउट के पीछे वैध छात्रों को हॉस्टल देना वजह बताई है. जबकि छात्र-छात्राओं का दावा है कि आज भी लगभग सभी छात्रावासों में कई अवैध छात्र रह रहे हैं, यहां तक कि महिला छात्रावास में भी. वहीं कई छात्र-छात्राएं पात्रता शर्तें पूरी करने के बाद भी बाहर रहने को विवश हैं.

जहां तक छात्रसंघ बहाली को लेकर चले आंदोलन का सवाल है तो ये अभी भी जारी है.

पिछले कई महीने से विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्रों के बीच तनातनी चलती रही और कई बार छात्रों पर लाठी चार्ज हुआ.

क़रीब दो दर्जन छात्र गिरफ़्तार करके जेल भेजे गए. छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष अवनीश यादव भी उनमें शामिल थे.

वो बताते हैं, "विश्वविद्यालय के इतिहास में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि इतनी बड़ी संख्या में अपने हक़ की आवाज़ उठाने वाले छात्रों की दिवाली और छठ जेल में बीती हो. कुल मिलाकर मुद्दा ये है कि विश्वविद्यालय के कुलपति और उनकी टीम के लोग ये चाहते हैं कि छात्र चुपचाप वही करें जो वो लोग चाहते हैं. इनके ख़िलाफ़ यदि आवाज़ उठाई गई तो ये जेल में डालेंगे, निलंबित कर देंगे या निष्कासित कर देंगे."

छात्रावास
jitendra tripathi/ bbc
छात्रावास

विश्वविद्यालय की रेटिंग

पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष रोहित मिश्र दावा करते हैं कि पिछले तीन साल में विश्वविद्यालय के क़रीब 500 छात्र या तो निष्कासित कर दिए गए, या निलंबित कर दिए गए या फिर ब्लैक लिस्टेड करके विश्वविद्यालय में उनके प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया गया.

रोहित मिश्र ख़ुद भी निष्कासित किए जा चुके हैं और उनका कहना है कि उनके अलावा विश्वविद्यालय छात्र संघ के क़रीब एक दर्जन पदाधिकारियों और पूर्व पदाधिकारियों को ये दंड दिया गया है.

विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि ऐसे छात्रों की संख्या दस-बारह से ज़्यादा नहीं है, लेकिन निष्कासित, निलंबित और ब्लैकलिस्टेड छात्रों की कोई आधिकारिक सूची उसके पास नहीं है.

क़रीब तीन साल पहले विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर रतनलाल हांगलू ने बीबीसी से बातचीत में कहा था कि वो इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पुरानी गरिमा बहाल करने के मक़सद से यहां आए हैं लेकिन इन तीन वर्षों के दौरान विश्वविद्यालय की रेटिंग कई पायदान नीचे चली गई है.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से जारी नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क यानी एनआईआरएफ़ की साल 2019 के लिए जारी की गई रैंकिंग में 125 साल पुराना ये विश्वविद्यालय 200 शीर्ष विश्वद्यालयों में भी अपनी जगह नहीं बना पाया जबकि साल 2016 में इसे 68वां स्थान मिला था.

यूनिवर्सिटी का एक हिस्सा
jitendra tripathi/ bbc
यूनिवर्सिटी का एक हिस्सा

सरकार का स्पष्ट आदेश

विश्वविद्यालय के तमाम छात्र ग्रेडिंग गिरने को सरकार, कुलपति और विश्वविद्यालय प्रशासन की ग़लत नीतियों के कारण बताते हैं जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन इसके लिए संसाधनों की कमी को ज़िम्मेदार ठहराता है.

प्रॉक्टर प्रोफ़ेसर रामसेवक दुबे कहते हैं, "ग्रेडिंग बढ़ेगी कैसे? यहां तीन चौथाई से ज़्यादा अध्यापक रिटायर हो गए हैं. सरकार का स्पष्ट आदेश है कि नई नियुक्तियां न की जाएं. जब अध्यापक नहीं होंगे, तो पढ़ाई कैसे होगी. लैब नहीं होगी तो प्रैक्टिकल कैसे होंगे, शोध कैसे होंगे. तो ये सब बातें ज़िम्मेदार हैं ग्रेडिंग नीचे जाने के लिए."

विश्वविद्यालय के अधिकारी संसाधनों की कमी का भी ज़िक्र कर रहे हैं लेकिन दो साल पहले विश्वविद्यालय ने यूजीसी को 200 करोड़ रुपये इसलिए वापस कर दिए थे क्योंकि वह उनका इस्तेमाल नहीं कर पाया था.

जहां तक नियुक्तियां न होने का मसला है, उस पर विश्वविद्यालय के तमाम शिक्षक भी छात्रों की मांगों के सहमत हैं.

बताया जा रहा है कि विश्वविद्यालय में शिक्षकों के 500 से ज़्यादा पद खाली हैं.

सरकार का आदेश है कि ज़्यादातर पाठ्यक्रमों को क्रमिक रूप से स्ववित्तपोषित किया जाए यानी छात्र पैसा देकर पढ़ें, जैसा कि प्राइवेट संस्थानों में होता है और विश्वविद्यालयों से कहा गया है कि आप अपने संसाधन इसी से जुटाएं.

यूनिवर्सिटी का एक हिस्सा
jitendra tripathi/ bbc
यूनिवर्सिटी का एक हिस्सा

स्व-वित्तपोषित पाठ्यक्रमों पर ज़ोर

यही वजह है कि विश्वविद्यालय कई तरह से फ़ीस वृद्धि और पैसा अर्जित करने वाले पाठ्यक्रमों पर ज़ोर दे रहा है और परिणामस्वरूप छात्रों से उसका टकराव बढ़ रहा है.

हालांकि इस बीच, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुछ विभागों और विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्तियां हुईं लेकिन उन नियुक्तियों पर भी सवाल उठे और उसे लेकर भी छात्रों ने आंदोलन किया.

रोहित मिश्र कहते हैं, "शिक्षकों की भर्ती, कई विभागों में गबन, एडमिशन सेल के घोटाले इन सब को लेकर वीसी और उनकी टीम पर आरोप लग रहे हैं और छात्र आंदोलन कर रहे हैं. ख़ुद एचआरडी मंत्रालय की दो-दो समितियों ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि विश्वविद्यालय अनियमितताओं का गढ़ बन चुका है. बावजूद इसके वीसी पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है. आम छात्र इतना डरा हुआ है कि मुखरता से अपनी बात तक नहीं कह पा रहा है."

इस पूरे मामले में हमने विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर रतनलाल हांगलू से भी बात करने की कोशिश की लेकिन उनसे बातचीत संभव नहीं हो पाई.

प्रॉक्टर प्रोफ़ेसर रामसेवक दुबे इन आंदोलनों के लिए भले ही मुट्ठी भर छात्रों को ज़िम्मेदार बताते हों लेकिन ये भी सही है कि ये सारे आंदोलन अलग-अलग विचारधाराओं के छात्र संगठनों ने मिलकर लड़ा और अभी भी लड़ रहे हैं.

BBC Hindi
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English summary
Allahabad University: Why has become the hub of student movement?
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