जानिए कैसा रहा है भारत का यूक्रेन के साथ रिश्ता, क्या पीएम मोदी को जाना चाहिए रूस के खिलाफ?
नई दिल्ली, 25 फरवरी। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध पर दुनियाभर की नजर है। जिस तरह से रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन के खिलाफ युद्ध का ऐलान किया उसके बाद अब दुनियाभर के देशों के सामने दोनों में से किसी एक देश का साथ देने की चुनौती है। एक तरफ जहां अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देश यूक्रेन का साथ दे रहे हैं और रूस के इस हमले की निंदा कर रहे हैं तो भारत के सामने बड़ी चुनौती है कि आखिर वह इस मसले पर क्या रुख अख्तियार करे। दरअसल रूस भारत का लंबे समय से मित्र देश है और अमेरिका भारत का अहम रणनीतिक महत्ता का देश है। लिहाजा भारत दोनों में से किसी भी देश के साथ अपने संबंध खराब नहीं करना चाहेगा। यहां एक और बात ध्यान देने वाली है कि भारत का कोई भी प्रधानमंत्री आजतक यूक्रेन के दौरे पर नहीं गया है।

यूक्रेन दुनियाभर के देशों से मदद की अपील कर रहा
रूसी हमले के बाद यूक्रेन दुनियाभर के देशों से मदद की गुहार लगा रहा है। यूक्रेन के राष्ट्रपति ने तमाम देशों से यूक्रेन की मदद करने के लिए कहा है लेकिन किसी भी देश ने अभी तक यूक्रेन की सैन्य मदद नहीं की है। हालांकि कई देशों ने रूस पर अलग-अलग तरह के प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन जब रूस ने सैन्य हमला कर दिया है तो इसका जवाब सैन्य मदद ही हो सकता है जोकि किसी भी देश ने नहीं की है। ऐसे में यूक्रेन ने भारत से भी उसकी मदद की गुहार लगाई है। भारत में यूक्रेन के राजदूत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मदद की गुहार लगाते हुए कहा कि आपसे मुझे बहुत उम्मीद है।

मोदी जी पर भरोसा-यूक्रेन
यूक्रेन के राजदूत ने कहा कि हम भारत से मदद की गुहार लगा रहे हैं, वह इस संकट में हमारी मदद करे। यूक्रेन के राजदूत डॉक्टर इगोर पोलिखा ने कहा कि मोदीजी दुनिया में ताकतवर और सम्मानित नेताओं में से एक हैं। मुझे नहीं पता है कि दुनिया के कितने नेताओं की व्लादिमीर पुतिन सुनेंगे, लेकिन मोदीजी से मुझे काफी उम्मीद है, अगर वह अपनी आवाज पुतिन के सामने उठाएं तो पुतिन शायद इस बार में सोचें। मुझे उम्मीद है कि मोदी जी पुतिन को किसी तरह से प्रभावित करने की कोशिश करेंगे।
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यूक्रेन के साथ संबंध का इतिहास
क्या भारत को यूक्रेन का समर्थन करना चाहिए और रूस के साथ इस मसले पर यूक्रेन का पक्ष लेना चाहिए। इस सवाल का जवाब देने से पहले हमे भारत और यूक्रेन के बीच पिछले कुछ सालों में संबंध कैसा रहा है इसके बारे में समझना होगा। हमे यह समझना होगा कि जब भारत पर दुनियाभर का दबाव था तो उस वक्त यूक्रेन ने भारत के साथ कैसा बर्ताव किया था किसी भी फैसले से पहुंचने से पहले भारत और यूक्रेन के बीच के पुराने रिश्ते काफी अहमियत रखते हैं। जब आप अपने देश के बारे में अच्छा सुनते हैं तो अच्छा जरूर लगता है लेकिन क्या इतिहास इसका समर्थन करता है, यह काफी मायने रखता है।

भारत का खुलकर विरोध कर चुका है यूक्रेन
यूक्रेन सोवियत यूनियन से 1991 में अलग हुआ था जब सोवियत यूनियन का विघटन हुआ था। यानि यूक्रेन को अलग देश बने तकरीबन 31 साल हो गए हैं। इस दौरान भारत और यूक्रेन के बीच के रिश्ते कुछ खास नहीं रहे। भारत और यूक्रेन के बीच ट्रेड की बात करें तो यह लगभग ना के बराबर है। यूक्रेन ने ना ही किसी भी अहम मसले पर भारत की मदद की है। यहां अहम बात गौर करने वाली यह है कि जब 1998 में भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किए थे तो दुनियाभर के कई देशों ने भारत की आलोचना की थी, जिसमे यूक्रेन भी शामिल था।

रूस भारत का अहम साथी
जब भारत ने पोखरण में टेस्ट किया था तो यूएन में इसको लेकर चर्चा हुई थी। यूएन में भारत का रूस ने साथ पूरी तरह से साथ दिया था और यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में भारत के पक्ष में वीटो का भी इस्तेमाल किया था। उस वक्त फ्रांस के प्रतिनिधि ने भारत के खिलाफ निंदा शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था। उन्होंने कहा था कि भारत को सीटीबीटी में शामिल होना चाहिए, संचनात्मक तरीके से काम करनी चाहिए। जबकि यूक्रेन ने कहा था कि हमने दुनिया के तीसरे सबसे बड़े परमाणु हथियारों को अपने से रूस को दे दिया था। ऐसे में भारत परमाणु परीक्षण कर रहा है, हम इसकी निंदा करता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु हथियारों को कम करने के अभियान का भी उल्लंघन किया है। ऐसे में साफ है कि यूक्रेन ने यूएन में भारत की बढ़-चढ़कर निंदा की थी।

यूक्रेन-पाकिस्तान के बीच के रिश्ते
यूक्रेन और पाकिस्तान के बीच के रिश्ते की बात करें तो यह तकरीबन 23 साल पहले यूक्रेन के पास पाकिस्तान की ओर से प्रस्ताव आया था, जिसमे पाकिस्तान ने यूक्रेन के 320 टी-80 टैंक को खरीदने का प्रस्ताव रखा था। यह डील 650 मिलियन डॉलर की थी। उस वक्त भारत ने यूक्रेन से कहा था कि पाकिस्तान को ये टैंक मत बेचिए क्योंकि पाकिस्तान आतंक को बढ़ावा देने वाला देश है और इन टैंक का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया जाएगा। पाकिस्तान भारत में आतंकियों को भेजता है और इन्ही हथियारों से इन आतंकियों को बचाने की कोशिश करता है। लेकिन बावजूद इसके यूक्रेन ने इन 320 टैंकों को बेचा, जिसका इस्तेमाल पाकिस्तान आज भी भारत के खिलाफ करता है। पिछले साल ही यूक्रेन ने पाकिस्तान के साथ 85 मिलियन डॉलर की डील की है जिसके तहत इन टैंक को फिर से अपग्रेड किया जाएगा।

भारत की कई मौकों पर रूस ने की मदद
भारत और रूस के बीच के रिश्ते की बात करें तो दोनों ही देशों के बीच रिश्ते काफी मजबूत रहे हैं। कई अहम मसलों पर भारत का रूस ने साथ दिया है। लिहाजा भारत के लिए रूस काफी अहम साथी है। यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में रूस स्थायी सदस्य है। रूस ने कश्मीर के मसले पर अनुच्छेद 370 पर भारत का समर्थन किया था। यही नहीं सबसे अहम बात यह है कि भारत के तकरीबन 70 फीसदी हथियार रूसी हैं, लिहाजा इसके स्पेयर पार्ट्स के लिए हम रूस पर निर्भर हैं। लिहाजा रूस की आलोचना करना या उसके खिलाफ जाना भारत के लिए काफी भारी पड़ सकता है और निसंदेह भारत यह नहीं करना चाहेगा।

रूस-चीन के रिश्ते
रूस और चीन के बीच के रिश्ते पिछले कुछ समय में बेहतर हुए हैं। वहीं भारत के साथ अगर चीन के रिश्तों की बात करें तो यह पिछले कुछ समय से काफी चुनौतीभरे रहे हैं। पिछले कुछ सालों से दोनों ही देशों की सेना एक दूसरे के साथ टकराव की स्थिति में हैं। रूस-यूक्रेन के मसले पर भी चीन ने रूस का एक तरह से समर्थन किया है। रूस की यूक्रेन की कार्रवाई को चीन ने आक्रमण करार देने से इनकार किया है। चीन ने कहा कि आक्रमण शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ऐसे समय में अगर भारत रूस के खिलाफ जाता है तो भारत की विदेश नीति को काफी नुकसान पहुंचाएगा। इसके साथ ही भारत चीन के इस बयान के साथ भी नहीं खड़ा हो सकता है क्योंकि इसका असर अमेरिका के साथ रिश्तों पर भी पड़ेगा। लिहाजा भारत को दोनों देशों के साथ अपने रिश्ते को काफी संयम के साथ आगे बढ़ाना होगा और इस पूरे मसले पर गंभीर विचार के बाद ही कोई फैसला लेना होगा।

यूक्रेन अलग-थलग पड़ा
यहां जो सबसे अहम बात है वह यह कि जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया है तो ऐसे समय में यूरोपीय यूनियन यूक्रेन की मदद के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। तमाम देश बयान जरूर यूक्रेन के समर्थन में दे रहे हैं लेकिन किसी ने भी यूक्रेन की सैन्य मदद के लिए हाथ आगे नहीं बढ़ाया है। अमेरिका सहित यूरोपीय देशों ने यूक्रेन की कोई सैन्य मदद नहीं की है। यहां तक कि स्विफ्ट प्रतिबंध को भी यूरोप ने नहीं लगाया है। ऐसे में भारत को इन तथ्यों पर भी नजर रखना चाहिए। जब यूक्रेन के पड़ोसी देश और अमेरिका तक सैन्य मदद के लिए आगे नहीं आ रहे हैं और सिर्फ बयानबाजी और प्रतिबंध लगा रहे हैं तो क्या भारत को किसी भी एक देश का खुलकर पक्ष लेना चाहिए।












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