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'मेरे साथ ये नहीं होता तो चाचा आज ज़िंदा होते'

By Bbc Hindi
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    रेप पीड़िता, आत्महत्या
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    रेप पीड़िता, आत्महत्या

    इसी पेड़ पर लटककर कुछ दिन पहले पैंतालीस साल के एक व्यक्ति ने अपनी जान दे दी.

    पेड़ के नीचे कतार से दर्जनों रिक्शे एक-दूसरे के हैंडल को थामे खड़े रहते हैं. इन्हीं में से एक रिक्शे के ऊपर चढ़कर कथित तौर पर उन्होंने फंदा बनाया और पेड़ की डाल के सहारे झूल गए.

    न तो उनकी पत्नी थी न ही बच्चे थे... किसी से कोई लड़ाई भी नहीं थी. तंगी थी, लेकिन ज़िंदगी कट रही थी. घर में उनकी भाभी थी और एक दृष्टिहीन भांजी थी.

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    फिर जान क्यों ले ली...?

    "सब उनसे पूछ रहे थे... कोई अपनी बेटी के रेप को किस्से की तरह सुनाता है क्या? मन में बहुत दुख था इसीलिए..."

    इसी पेड़ के नीचे एक ठेले पर बैठी सोनी (बदला हुआ नाम) कहती हैं, "अगर मेरे साथ वो सब नहीं होता तो मेरे चाचा आज ज़िंदा होते."

    चार मई को सोनी के साथ कथित तौर पर बलात्कार हुआ. सोनी का कहना है कि बलात्कार करने वाला उसी बस्ती का एक व्यक्ति नन्हे लाल (बदला हुआ नाम) था.

    सोनी ज़्यादातर चुप ही रहती हैं. उनकी मां हर सवाल का जवाब देती हैं. पीली रंग की पॉलीथीन में कई तरह के ज़रूरी कागज़ात को एक-एक करके सहेजते हुए वो कभी फ़ोन उठाती हैं तो कभी अपनी बेटी की ओढ़नी ठीक करती हैं.

    वो कभी पुलिस वाले को अपना आधार कार्ड दिखाती हैं तो फिर मांगने पर एक निजी बैंक का पासबुक देती हैं. मेडिकल रिपोर्ट मांगने पर एफ़आईआर की कॉपी दे देती हैं और कहती हैं ख़ुद ही देख लीजिए आपको कौन-सा कागज़ चाहिए.

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    'काश मैं पानी भरने नहीं जाती...'

    सोनी बचपन से देख नहीं सकतीं. पांच साल की उम्र तक उन्हें दुनिया का हर रंग दिखता था, लेकिन एक डॉक्टर की ग़लती ने उनकी आंखों की रोशनी छीन ली. इसी का इलाज कराने के लिए आज से 15 बरस पहले वो इस बस्ती में आई थीं.

    सोनी की मां कविता देवी (बदला हुआ नाम) अब दिल्ली में नहीं रहना चाहतीं. वो अपने पैतृक गांव जाना चाहती हैं.

    चार मई के उस दिन को याद करते हुए वो कहती हैं "रोज़ तो इसे लेकर ही पानी भरने जाते थे, लेकिन उस दिन शायद ये सब होना था, इसलिए घर पर छोड़कर चले गए. लाल बत्ती के पार जाकर पानी लाना पड़ता है. आधा घंटा लग गया लौटने में."

    मां को बीच में ही रोकते हुए सोनी आगे की घटना सुनाने लगती हैं. "उसने मुझे बाहर बुलाया और खींचकर बगल वाले कमरे में ले गया. मेरा मुंह बंद कर दिया और मेरे साथ वो सब किया."

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    घटना

    सोनी बताती हैं कि उनके बगल वाली झुग्गी खाली थी और वहां कोई नहीं रहता था. सोनी की मां के अनुसार 'कोने की इस झुग्गी के सामने रिक्शे खड़े रहते हैं और इसीलिए कोई इसमें हो तो दूर से पता नहीं चलता.'

    स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस झुग्गी झोपड़ी वाले इलाके में क़रीब दो हज़ार लोग रहते हैं, लेकिन सुबह नौ बजे हुई इस वारदात के बारे में किसी को कानोंकान ख़बर नहीं लगी.

    सोनी कहती हैं कि उनका मुंह बंद था इसीलिए वो चिल्ला नहीं पाईं.

    कविता बताती हैं, "मैं लौटकर आई तो बिटिया घर के बाहर बैठकर रो रही थी. बाद में इसने मुझे सब कुछ बताया. हम किसको क्या बताते... फ़ोन मिलाने भी तो नहीं आता. इसके चाचा का इंतज़ार किए और फिर एक-दो बजे के क़रीब हमने पुलिस का 100 नंबर मिलवाया."

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    दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "हमारे पास एक-डेढ़ बजे के आस-पास फ़ोन आया. हम तुरंत मौके पर पहुंचे. लड़की का बयान लिया, मेडिकल कराया फिर काउंसलिंग हुई."

    सोनी कहती हैं कि वो देख नहीं सकती हैं, लेकिन लोगों की आवाज़ें पहचानती हैं. उनका कहना है कि उन्होंने बलात्कार करने वाले को भी उसकी आवाज़ से ही पहचाना और उसकी पहचान के आधार पर डीबीजी रोड थाना पुलिस ने नन्हे लाल को हिरासत में लिया.

    अभियुक्त नन्हे लाल ने अपना जुर्म कबूल लिया है और उन पर धारा 366 और धारा 376 के तहत मुक़दमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया गया है.

    नन्हे लाल मूल रूप से मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं और दिल्ली में रिक्शा चलाने का काम करते हैं.

    नन्हे लाल भी इसी झुग्गी में रहते हैं और उनका घर सोनी के घर के सामने है. उनके परिवार में उनकी पत्नी और तीन बच्चे हैं.

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    बाहर से तो सब ठीक ही लग रहा था...

    कविता के हिसाब से अभियुक्त पकड़ा गया था और सब ठीक ही चल रहा था, लेकिन उनके देवर सुखराम (बदला हुआ नाम) थोड़ा परेशान रहने लगे थे.

    सोनी को दिखाई नहीं देता, लेकिन ठेले पर बैठे-बैठे वो ऊपर की ओर इशारा करते हुए कहती हैं, "उनसे लोगों का ताना बर्दाश्त नहीं हुआ और इसी पेड़ से लटक कर उन्होंने जान दे दी. उस रात हम लोग दो बजे तक जगे हुए थे. पर जब सुबह अम्मा उठी थीं तो वो पेड़ पर लटके हुए थे."

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    सामाजिक अकेलापन...

    सोनी की दो बहनें और दो भाई भी हैं. दोनों बहनों की शादी हो चुकी है. एक भाई मुंबई में रहता है और कुल्फ़ी बेचने का काम करता है.

    जब कविता देवी ने उन्हें यहां की घटना के बारे में बताया तो उन्होंने कहा "अभी काम से छुट्टी नहीं मिल सकती, नहीं आ पाऊंगा."

    वहीं दूसरा भाई यहीं दिल्ली के दूसरे हिस्से में रहता है. जब हम सोनी और उनकी मां से मिलने पहुंचे तो वो वहीं थे.

    उन्होंने बताया कि उन्हें बहन के साथ हुए बलात्कार की घटना के बारे में नहीं पता चला. जब चाचा ने आत्महत्या कर ली तो उन्हें फ़ोन करके यहां बुलाया गया.

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    दिल्ली में रहने वाले सोनी क भाई कहते हैं "मेरा भी परिवार है, नौकरी है, छुट्टी नहीं मिलती... इसलिए इन लोगों को देखने नहीं आता था. चाचा भी थे तो कोई चिंता नहीं थी, लेकिन अब इन लोगों को अपने साथ ले जाऊंगा. उसके बाद गांव भेज दूंगा."

    कविता बताती हैं कि सरकारी लोग आए थे और 25 हज़ार रुपये दे रहे थे, लेकिन मैंने सिर्फ़ पांच हज़ार रुपये ही लिए. पूरा पैसा लेती तो कोई मुझे ही पैसों के लिए मार डालता. बाक़ी पैसा मेरे खाते में आ जाएगा.

    'वो था... तो सहारा था'

    कविता कहती हैं कि "घर चलाने के लिए वो मेरे हाथ पर दस-बीस रुपये ही देता था, लेकिन देता तो था. चला गया तो वो सहारा भी नहीं रहा... वो शराब पीता था, लेकिन लड़ाई-झगड़ा कभी नहीं किया."

    सोनी चुपचाप सब सुनती रहती हैं तभी एकाएक बोलती उठती हैं... "अरे उनको ये पेड़ दिखा दो ना जिस पर चाचा लटक गए."

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    ये पेड़ दो दिन पहले भी यहीं खड़ा था... लेकिन अब वो छांव देने वाला पेड़ नहीं रहा. अब उसकी पहचान बदल गई है लोग उसकी डाल की तरफ़ उंगली उठाकर कहते हैं "इसी डाल पर वो लटक गया."

    हम जाने लगे तो सोनी और उसकी मां ने भी झोला उठा लिया. सोनी का भाई उसे अपने साथ ले जा रहा था.

    घर की बत्ती बंद कर दी गई. किवाड़ पर कोई ताला नहीं, कोई कुंडी नहीं.

    सोनी की मां बोलीं, "जो लुटना था लुट चुका है अब लूटने के लिए कुछ बाकी कहां रहा."

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    English summary
    After uncle kills himself, blind rape-survivor considers withdrawing police case.

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