आख़िर शुजात बुखारी से किसको दिक़्क़त थी

आख़िर शुजात बुखारी से किसको दिक़्क़त थी

कश्मीर एक ऐसा विवाद है जिसमें उसके सबसे बेहतरीन लोगों की ही बलि चढ़ गई है.

डॉक्टर एस. शुजात बुखारी एक स्वाभिमानी कश्मीरी थे. अपनी भाषा और संस्कृति के महारथी और एक ऐसे शख़्स जो नारेबाज़ी और हिंसा के बीच संवाद बनाये रखने के पैरोकार थे. उनकी खुली सोच ने ही उनकी जान ले ली.

कश्मीर में मज़बूत स्थानीय मीडिया एक उम्मीद की किरण की तरह है.

पुराने श्रीनगर के इलाक़े में न्यूज़स्टैंड पर आप इंग्लिश और स्थानीय भाषा में क़रीब 10 अख़बार देख सकते हैं.

शुजात बुखारी का अख़बार 'राइज़िंग कश्मीर' अपनी ऊर्जा और संपादकीय ताक़त के लिए जाना जाता रहा है.

शुजात ने एक युवा और प्रतिभाशाली टीम तैयार की थी. उन्हें गर्व था कि महिलाएं उनमें प्रमुख थीं, जिन्होंने एक ज़ोरदार, जिज्ञासु और निष्पक्ष प्रेस का नज़रिया सामने रखा, जो न सिर्फ़ सरकार बल्कि अलगाववादियों को भी ज़िम्मेदार ठहराता था.

आख़िर शुजात बुखारी से किसको दिक़्क़त थी

कश्मीर की गहरी समझ

इससे पहले शुजात बुखारी भारत के प्रमुख अख़बार 'द हिंदू' के संवाददाता थे.

उन्होंने कश्मीर के बारे में भारत के विचार निर्माताओं तक सूचना पहुँचाने का मुश्किल काम संभाला.

शुजात बुखारी एक शांत मुस्कुराहट और उदार व्यवहार के साथ अपने आप में एक बड़े व्यक्ति थे.

उनमें दोस्त बनाने का हुनर था. उनमें ज्ञान का भंडार था.

अगर आप जानना चाहते हों कि कश्मीर में क्या हो रहा है तो शुजात बुखारी वो व्यक्ति थे जो आपको कोई मनगढ़त कहानी न सुनाकर, सच की गहराइयों तक ले जाते थे.

सभी जगह उनके संपर्क थे और वो ये जानने के लिए उत्सुक रहते थे कि बाहरी लोग कश्मीर को कैसे देख रहे हैं.


आख़िर शुजात बुखारी से किसको दिक़्क़त थी

'बुलाया था अपने दफ़्तर'

जब मैं एक साल पहले श्रीनगर में था तो शुजात ने मुझे अपना एक मोबाइल दे दिया था, जिसका वो इस्तेमाल नहीं करते थे.

वहाँ अंतरराष्ट्रीय फ़ोन नंबर काम नहीं करता है और न ही वो ऐसी जगह है जहाँ आप दुनिया के संपर्क से टूटना पसंद करेंगे.

मैं उनका दफ़्तर देखना चाहता था और उन्होंने मेरे आने और उनके पत्रकारों के साथ बात करने की व्यवस्था भी की थी.

'राइज़िंग कश्मीर' अख़बार के दफ़्तर जाते हुए बारिश के कारण मुझे थोड़ी देर हो गई थी.

तब शुजात का फ़ोन आया और उन्होंने पूछा, ''एंडी, तुम कहाँ हो? हम सब इंतज़ार कर रहे हैं. हमारे पास तुम्हारे लिए चाय और कश्मीरी पेस्ट्रीज़ हैं.''

शुजात कश्मीरी मेहमाननवाज़ी का बेहतरीन उदाहरण थे.

मैंने उनके साथियों और टीम के संवाददाताओं से एक घंटे से ज़्यादा वक़्त तक बात की. इस दौरान कई मुद्दों पर हमारी चर्चा हुई.

मसलन, वैश्विक पत्रकारिता, डिजिटल प्लेटफॉर्म का उदय, रिपोर्टिंग की स्टाइल, जोश के साथ-साथ संतुलन बनाना और क्यों कश्मीर एक ऐसा संघर्ष है जो 70 सालों से सुलगा हुआ है और दुनिया भर के मीडिया का उस पर बहुत कम ध्यान है, जैसे मुद्दों पर हमने बात की.


'कश्मीर को थी उनकी ज़रूरत'

शुजात से मेरी मुलाक़ात लंदन में संघर्ष विराम और सीमाओं के पार अनौपचारिक बातचीत को बढ़ावा देने के लिए हुई एक सभा में हुई थी. उनकी बातें सुनने लायक थीं.

हाल ही में मैंने लिज़्बन में वैश्विक संपादकों की एक सभा से उनके ट्वीट्स को फ़ॉलो किया और मैं चाहता था कि कश्मीर दुनिया से कटे नहीं, बल्कि नए विचारों के लिए खुला रहे.

शुजात बहुत साहसी इंसान थे. जैसा कि कश्मीर के कई पत्रकारों को होना भी होता है.

कश्मीर में उनकी जान को ख़तरे के चलते ही उन्हें निजी सुरक्षा भी दी गई थी. वह गंभीर बीमारी से भी उबरे थे. वो दुबले-पतले थे और उनकी आँखों में चमक थी.

वो एक बुद्धिमान, दोस्ताना और आत्मविश्वास से भरपूर साहसी व्यक्ति थे. ऐसे लोगों की कश्मीर को गहराते राजनीतिक गतिरोध के बीच रास्ता निकालने के लिए ज़रूरत है.

रमज़ान के पावन महीने में उनकी हत्या हो गई और ऐसे वक़्त में जब कश्मीर का दर्द कुछ कम करने के लिए बातचीत के रास्ते तलाश किए जा रहे हैं और इसे लेकर घाटी में हलचल हो रही थी.

इफ़्तार से ठीक पहले शुजात बुखारी रेज़िडेंसी रोड पर भीड़ भरे इलाक़े में अपने प्रेस एनक्लेव वाले ऑफ़िस से निकलकर अपनी गाड़ी में बैठने वाले थे तभी दो बाइक सवारों ने उन्हें गोली मार दी. उनके साथ-साथ उनके दो सुरक्षाकर्मी भी मारे गए.

ये एक तय हमला था और दुख की बात ये कि कश्मीर में पहले भी पत्रकारों पर ऐसे हमले होते रहे हैं, लेकिन चीज़ें ज़रा भी नहीं बदलीं.

मुझे उनके परिवार, सहकर्मियों, उनके कई दोस्तों और कश्मीर के लिए बेहद दुख है.

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