अब आडवाणी की दुर्दशा न देखी जाए...
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) कहने वाले कहते हैं कि भाजपा और जनसंघ के इतिहास में लाल कृष्ण आडवाणी से ज्यादा पावरफुल नेता कोई नहीं हुआ। और यह भी उतना ही सच है कि आज जितने दयनीय आडवाणी हैं भारतीय राजनीति में ऐसा बुरा हाल भी किसी का नहीं हुआ! बुधवार को लोकसभा में सत्ता पक्ष की पहली पंक्ति में हमेशा की तरह आडवाणी थे। उनके एक तरफ बाएं सुषमा स्वराज और दाएं अरुण जेटली थे।
नवभारत टाइम्स के पूर्व राजनीतिक संपादक शकील अख्तर कहते हैं कि जरूरत पड़ने पर दोनों के बीच संवाद होने पर आडवाणी को खुद को बैंच की पुश्त में धंसाकर अपने उन पुराने शिष्यों के लिए स्पेस बनाना पड़ता था। कल सच में महत्वपूर्ण राजनीतिक दिन था और यह स्पष्ट मैसेज था कि दाल भात में यह मूसलचंद कहां से आ गए।
उनकी तारीफ भी इग्नोर
सुषमा के बयान के बाद आडवाणी ने उनकी खूब पीठ थपथपाई मगर सुषमा की तरफ से कोई आभार का संकेत नहीं था। सुषमा ने एक पत्र पढ़ा वह फाइल लेकर आडवाणी देख ही रहे थे कि जेटली ने उनके हाथ से फाइल ले ली। संसद के कारिडोर में वे निपट अकेले होते हैं। कुल मिलाकर आडवाणी अपनी पार्टी में ही बहुत अलग-थलग पड़े गए हैं।













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