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दो Lockdown के बीच सैकड़ों किलोमीटर के फासले पर यूं फंसा एक मजदूर परिवार

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नई दिल्ली- देश के कई भागों में इस समय हजारों प्रवासी मजदूर फंसे हुए हैं। वह जहां रहते थे, वहां काम बंद है। उनमें से कुछ लोग मजबूरी में और अफवाहों की वजहों से लॉकडाउन तोड़कर हजारों किलोमीटर दूर अपने गांवों की ओर निकल चुके हैं। लेकिन, उनमे से शायद ही कुछ लोग होंगे जो अपने गांव तक पहुंच पाए होंगे। उन्हें अलग-अलग राज्यों में रोक लिया गया है और क्वारंटीन किया गया है। ऐसे में घर के रास्ते में फंसा हुआ वह मजदूर और सैकड़ों किलोमीटर दूर पलक पांवड़े इंतजार में बैठे उसके परिवार की परेशानी का तो सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है।

दिल्ली से मधुबनी के लिए निकले गोंडा में अटके

दिल्ली से मधुबनी के लिए निकले गोंडा में अटके

इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक पुरानी दिल्ली की नई सड़क इलाके में मजदूरी करने वाला एक मजदूर संदीप यादव 27 मार्च को तड़के दो बचे अपने साइकिल ठेले से बिहार में मधुबनी जिले स्थित अपने गांव को निकल पड़ा। चार दिन और चार रात तक पैडल मारकर वह अपने गांव से लगभग आधे रास्ते यानि यूपी के गोंडा तक तो पहुंच गया। लेकिन, उसके बाद वहीं पर अटका पड़ा है। अब उसकी चिंता ये है कि अगर रास्ते में उसे कोरोना वायरस हो गया तो वह घर कैसे पहुंचेगा। और अगर वह जल्दी घर नहीं पहुंचा तो उसके परिवार और बच्चों का क्या होगा, जिन्हें वह लगभग तीन हफ्ते से एक भी पैसा नहीं भेज पाया है। नई सड़क से मधुबनी में उसका गांव करीब 1,100 किलोमीटर दूर है। एक अप्रैल तक वह उसमें से लगभग 670 किलोमीटर की दूरी तय कर चुका था। पर उस दिन वह पुलिस की हत्थे चढ़ गया और उसे उसके भाई रमनजी के साथ गोंडा के एक शेल्टर होम में पहुंचा दिया गया। उसके साथ कुछ और लोग भी थे, लेकिन नजर बचाकर वहां से भाग निकले।

खाने-नाश्ते और ठहरने का बेहतर इंतजाम, लेकिन घर पहुंचने की है जल्दी

खाने-नाश्ते और ठहरने का बेहतर इंतजाम, लेकिन घर पहुंचने की है जल्दी

संदीप का भाई भी अगली सुबह कोई ट्रक पकड़कर भाग गया। वह भी किसी तरह पांच दिन बाद अपने गांव पहुंच गया। लेकिन, संदीप क्या करे। वह तो भाई और साथियों के साथ साइकिल ठेले से निकला था। उसपर उसने वो सारा सामान भी डाल रखा है, जो दिल्ली में उसकी संपत्ति के रूप में थी। ऊपर से रास्ते के लिए कुछ राशन और स्टोव भी रखा हुआ है। गोंडा के शहीद ए आजम सरदार भगत सिंह इंटर कॉलेज में उसके साथ और लोगों को एक तरह से क्वारंटीन में रखा गया है। ठहरने और खाने-पीने का पूरा और पुख्ता बंदोबस्त है। मच्छरदानी, मास्क से लेकर सैनिटाइजर तक का पूरा ख्याल रखा जाता है। खाना-नाश्ता चारों वक्त मिलता है, लेकिन शारीरिक श्रम करने वाले मजदूरों की खुराक शायद कुछ ज्यादा होती है तो हो सकता है कि बंधा हुआ खाना संदीप जैसे लोगों के लिए कुछ कम पड़ जाता हो। कुछ भी हो संदीप को उम्मीद थी कि 14 तारीख को लॉकडाउन खत्म होने के बाद वह 15 को अकेले ही निकल जाएगा और किसी तरह से 4-5 दिन में गांल पहुंच ही जाएगा। लेकिन, अब 3 मई तक कोई उम्मीद नहीं है।

परिवार की चिंता खत्म ही नहीं हो रही

परिवार की चिंता खत्म ही नहीं हो रही

ठहरने और खाने के प्रबंध से यादव को कोई शिकायत नहीं लगती। उसकी परेशानी दो ही बातों को लेकर है। यहां उसका आगे का इतना लंबा वक्त कैसे गुजरे और परिवार वालों तक वह जल्द से जल्द कैसे पहुंचे। उसके पास एक बेसिक फोन है, जिसमें अनलिमिटेड कॉलिंग की सुविधा है। जब भी घर में किसी से या पत्नी से बात होती है तो उसका दिल और घबरा जाता है। पत्नी रेणु देवी के बारे में वो कहता है, 'मैं उससे पूछता हूं कि खाना या और जरूरी सामान है। मैं यहां से कुछ नहीं कर सकता सिर्फ सलाह ही दे सकता हूं। ' यादव गोंडा में अपना वक्त तो कॉलेज के पेड़ों में पानी डालने जैसे छोटे-मोटे काम करके काट लेता है। लेकिन,परिवार की चिंता खत्म ही नहीं होती। दिल्ली-एनसीआर में ठेला चलाकर वो 15,000 रुपये महीने कमा लेता है, जिसमें से हर दो हफ्ते में घर पर 2,000 रुपये भेजता था। लेकिन, अभी तो वह खुद ही किसी से उधार मांग कर निकला हुआ है।

करीब 500 किलोमीटर के फासले पर अटकी जिंदगी

करीब 500 किलोमीटर के फासले पर अटकी जिंदगी

संदीप एक साल बाद अपने गांव लौट रहा है। उसे उम्मीद थी कि गांव में गेहूं की फसल तैयार है। लेकिन, अब इन सबके बारे में पत्नी से फोन पर बात होने पर झगड़ा भी हो जाता है। उसने कहा, 'फसल तैयार है और मेरी पत्नी और मैं लगातार झगड़ रहे हैं। कल उसने कह दिया कि मैं तो यहां मस्ती कर रहा हूं। हालांकि, मुझे पता है कि उसने ऐसा इसलिए कहा कि वह चिंतित है। उसे डर है कि हमें अपनी भैंस बेचनी पड़ेगी। जब भी हमारी फोन पर बात होती है वह रोने लगती है।' दो बच्चों का पिता जब भी अपने बच्चों से बात करता है तो भावुक हो जाता है। उसने अपने बेटे के बारे में बताया, 'मुझे लगता है कि उसने मुझसे झूठ कहा कि उसे पूरा खाना मिल पाता है, मैं समझता हूं कि उसे मेरी चिंता हो रही है। मैंने उन्हें 20 दिनों से पैसे नहीं भेजे हैं। अगर मेरा परिवार वहां मर जाता है या मैं यहां तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?' संदीप यादव अकेला नहीं है। इस समय देश के अलग-अलग इलाकों में ऐसे हजारों प्रवासी मजदूर फंसे हैं, जिनकी जिंदगी लॉकडाउन की वजह से दो राहे पर खड़ी है।(कुछ तस्वीरें प्रतीकात्मक)

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English summary
A laborer family stuck at a distance of hundreds of kilometers between two lockdowns
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