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Google-Whatsapp की मदद से 43 साल बाद परिवार से मिली 90 साल की महिला, जानें कैसे

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मुंबई। सोशल मीडिया की बदौलत लॉकडाउन में भी लोग अपने दोस्‍तों और परिजनों के संपर्क में रह पाए। वहीं कई मामलों में ये सोशल मीडिया और गूगल वरदान साबित हो रहा हैं। महाराष्‍ट्र में तो गूगल और वाट्सअप की मदद से 43 वर्ष बाद एक 90 वर्षीय बूढ़ी महिला को उसका खोया हुआ परिवार मिल गया। उम्र में आखिरी पड़ाव में अपने परिवार से मिलकर वो अब उसकी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा।

 43 साल बाद अपने पोते से मिली अच्‍चन मौसी

43 साल बाद अपने पोते से मिली अच्‍चन मौसी

दरअसल, महाराष्ट्र की रहने वाली पंचुबाई 43 साल से अधिक समय तक खान परिवार के साथ अच्चन मौसी के रुप में रहीं लेकिन अब गूगल और वाट्सअप की मदद से वो 43 साल बाद अपने परिवार से मिली। उनका पोता महाराष्‍ट्र से बुंदेलखंड खुद लेने पहुंचा। वे अपने पोते पृथ्वी कुमार शिंदे के साथ 90 साल की दादी को लेकर महाराष्‍ट्र अपने गांव ले गया। पंचुबाई जिनको बुंदेलखंड में अच्‍चन मौसी के नाम दिया गया वो दमोह जिले के कोटा ताल गांव की इसरार खान के साथ रहीं। इसरार को पिछले महीने लॉकडाउन में ही पता चला कि उनकी अच्चन मौसी दरअसल महाराष्ट्र से हैं। बता दें इसरार ने गूगल और व्हाट्सएप की थोड़ी मदद से पंचुबाई के पोते को ढूढ़ा।

जानिए कैसे खान परिवार में पहुंची थीं अच्‍चन मौसी

जानिए कैसे खान परिवार में पहुंची थीं अच्‍चन मौसी

महाराष्ट्र के अमरावती जिले के एक गाँव से बुंदेलखंड क्षेत्र के दमोह तक लगभग 500 किमी की दूरी तय कर पंचुबाई वहां कैसे पहुंची थीं ये कोई नहीं जानता। इसरार के पिता खान के ट्रक ड्राइवर पिता ने पंचुबाई को तब देखा था जब मधुमक्खियों के झुंड ने अचानक हमला कर दिया था। खान ने बताया कि 43 साल पहले जब मेरे पिता पिता स्वर्गीय नूर खान अपने घर जा रहे थे तो उन्होंने पंचुबाई बहुत बदहाल अवस्‍था में मिली। उन्होंने मधुमक्खियों के डंक से होने वाले दर्द से राहत के लिए उन्हें कुछ जड़ी-बूटियाँ दीं। खान ने बताया कि उनके पिता ने कुछ दिनों बाद उन्हें फिर से सड़क के किनारे देखा और उनसे उनके ठिकाने के बारे में पूछा, लेकिन वह कुछ नहीं कह सकी। वह फिर उन्हें घर ले आए।

Google-Whatsapp की मदद से मिला परिवार

Google-Whatsapp की मदद से मिला परिवार

43 साल से वो हमारे घर में वह हमारी और पूरे गांव की अच्चन मौसी बन गई। इसरार ने बताया कि ये नाम मेरे पिता ने उन्‍हें दिया था। वह अक्सर मराठी बोलती थीं। मेरे पिता और बाद में मैंने और मेरे दोस्तों ने उनके गाँव को खोजने की बहुत कोशिश की, लेकिन हमारे प्रयास बेकार रहे क्योंकि हमें उससे कोई सुराग नहीं मिला या शायद हम यह समझने में असफल रहे कि वे क्या कह रही थीं। 4 मई को, लॉकडाउन के दौरान, खान परिवार एक साथ बैठा था। मासी ने जो कहा खान ने अपने मोबाइल फोन पर रिकॉर्ड किया और पता लगा कि मासी ने खानम नगर बोला है। बाद में, मुझे अमरावती जिले में एक खानजम नगर पंचायत मिली। Google की मदद से, मुझे खानम नगर में एक कियोस्क मालिक अभिषेक का मोबाइल नंबर मिलीा। मैंने उनसे बात की और अपने गाँव और आस-पास व्हाट्सएप के माध्यम से मौसी की फोटो को प्रसारित करने के लिए उनकी मदद मांगी।

खान परिवार ने अपनी अच्‍चन मौसी को आंसू के साथ उनके घर किया विदा

खान परिवार ने अपनी अच्‍चन मौसी को आंसू के साथ उनके घर किया विदा

जब अभिषेक ने मुझे बताया कि तो गाँव के एक परिवार ने मौसी की पहचान पंचुबाई के रूप में की थी और वह पृथ्वी कुमार शिंदे की दादी हैं तो हम खुशी में झूम उठे। शिंदे ने इसके बाद खान से संपर्क किया। उन्होंने उन्हें बताया कि पंचूबाई ने 2005 में अपने पति तेजपाल और तीन साल पहले बेटे भईलाल को खो दिया है।शिंदे ने बताया कि मेरे दादा तेजपाल और पिता भीलाल ने दादी के मिलने की उम्मीद खो दी थी। मेरे दादा ने थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी। अपनी दादी से मिलने के बाद पोते पृथ्‍वी ने कहा कि मैं हमेशा स्वर्गीय नूर खान और उनके बेटे इसरार खान का ऋणी रहूंगा क्योंकि इस परिवार ने न केवल मेरी दादी को आश्रय दिया, बल्कि घर का सदस्‍य समझकर उनकी देखभाल भी की।आज मैं नूर खान और इसरार खान की वजह से अपनी दादी को देख पा रहा हूं । पंचूबाई के चले जाने पर खान और उनके परिवार बहुत दुखी हैं। इसरार ने कहा कि "मैं बचपन से ही, अच्चन मौसी को अपने अभिभावक के रूप में देखता रहा हूं।मुझे खुशी है कि उसे आखिरकार अपना परिवार मिल गया है लेकिन मुझे दुख है कि मैं अपना अभिभावक खो रहा हूं।

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English summary
90 years old woman met family after 43 years with the help of google-whatsapp, know how
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