25 years of Kargil: एक धमाके ने छीना इस मेजर का पैर, फिर भी बने देश के पहले ब्लेड रनर
हिम्मते मर्दा मददे खुदा....यानी कि अगर आप हिम्मत से किसी काम को करने की चाह करेंगे तो, ऊपर वाला भी आपके साथ होगा। इसका सटीक उदाहरण हैं 'मेजर देवेंद्र पाल सिंह'। जिनका जीवन हमें हर कठिनाई से लड़ने की ताकत देता है। 25 साल की उम्र में देश के लिए अपनी जान हथेली में लेकर जंग में कूद पड़े। जंग के दौरान उनके पास मोर्टार फट गया। ऑपरेशन में उनको नई जिंदगी मिली। लेकिन, एक पैर गंवाना पड़ा।
कृत्रिम पैर का सहारा मिला। मेजर देवेंद्र ने अपना हौसला कायम रखा और देश में पहले ब्लेड रनर का खिताब हासिल किया। कृत्रिम पैर के साथ, मेजर सिंह ने कई मैराथन में भाग लिया और अपने दृढ़ संकल्प और साहस से सभी को प्रेरित किया। सोलो स्काई डाइविंग करने वाले एशिया के पहले दिव्यांग बने और कई नेशनल अवॉर्ड जीते। आइए आपको रूबरू करते हैं...

कारगिल युद्ध में खोया पैर
मेजर देवेंद्र का जन्म 13 सितंबर 1973 को परवरिश पंजाब में हुआ। उन्होंने अपने प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद भारतीय सेना में प्रवेश करने का निर्णय लिया। 1997 में भारतीय सेना में शामिल हुए। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान, मेजर देवेंद्र पाल सिंह जम्मू और कश्मीर के इलाके में तैनात थे। 15 जुलाई 1999 को एक ऑपरेशन के दौरान, उन्हें एक मोर्टार का गोला लगा, जिससे उनकी हालत गंभीर हो गई। उनके शरीर के कई हिस्से बुरी तरह से घायल हो गए और उनका दायां पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया।
कृत्रिम पैर बना सहारा
मेजर की जान बचाने के लिए डॉक्टरों को उनका दायां पैर घुटने से नीचे काटना पड़ा। यह घटना उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुई। मेजर सिंह ने अपने जीवन को नए सिरे से शुरू करने का निर्णय लिया। उन्होंने कृत्रिम पैर के साथ जीवन जीना सीखा और इसे अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। उन्होंने न केवल चलने की क्षमता हासिल की बल्कि दौड़ने का भी संकल्प लिया।
26 से अधिक मैराथन से लोगों को दी प्रेरणा
कृत्रिम पैर के साथ, मेजर सिंह ने कई मैराथन में भाग लिया और अपने दृढ़ संकल्प और साहस से सभी को प्रेरित किया। वह भारत के पहले ब्लेड रनर बने। मेजर देवेंद्र पाल सिंह ने अपनी प्रेरणादायक कहानी को साझा करते हुए कई मंचों पर व्याख्यान दिए और लोगों को अपने जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने 26 से अधिक मैराथन में भाग लिया है और हमेशा अपने साहस और दृढ़ संकल्प से सभी को प्रेरित किया है।
पुस्तक और पुरस्कार
पुस्तक: मेजर देवेंद्र पाल सिंह ने अपनी आत्मकथा "Grit: The Major Story" लिखी है, जिसमें उन्होंने अपने संघर्षों, चुनौतियों और सफलता की कहानी को साझा किया है।
पुरस्कार: उनके अद्वितीय साहस और योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। उन्हें 2018 में "वॉर हीरो अवार्ड" और 2019 में "पद्मश्री" से सम्मानित किया गया।












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