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J&K:7 दशक बाद डोमिसाइल रूल बदलने से 2 लाख पाकिस्तानी शरणार्थियों-दलितों की बदल गई जिंदगी

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नई दिल्ली- जम्मू-कश्मीर में धारा-370 हटाने का फायदा ये हुआ कि केंद्र सरकार वहां के लाखों लोगों के जीवन में बदलाव के लिए नई डोमिसाइल पॉलिसी लागू कर सकी। नया डोमिसाइल रूल पिछले 24 मई से लागू हुआ है और इसने एक ही झटके में करीब दो लाख लोगों के जीनव में बहुत बड़ा बदलाव ला दिया है। इस दिन का सपना देखते-देखते हजारों लोग अपनी जिंदगी गंवा चुके है। लेकिन, 7 दशकों से भी ज्यादा वक्त उनकी जिल्लत भरी जिंदगी में खुशियों का नया सूर्योदय हुआ है। नए डोमिसाइल नियम से सिर्फ जम्मू डिविजन में ही रह रहे दो लाख पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों, पंजाब से गए वाल्मीकियों और गोरखाओं को वहां का स्थाई निवासी होने का हक मिल गया है। अब वे वहां सम्मान के साथ रह भी सकेंगे और अपने भारतीय होने पर फक्र भी कर सकेंगे।

7 दशकों बाद स्थाई निवासी होने का हक मिला

7 दशकों बाद स्थाई निवासी होने का हक मिला

संघ शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के डोमिसाइल रूल में हाल में हुए बदवाल की वजह से जम्मू डिविजन में रहने वाले 2 लाख पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों, पंजाब से आए वाल्मीकि दलितों और गोरखाओं की जिंदगी में रातों-रातों बदलाव आ गया है। ये लाखों लोग 7 दशकों से इस दिन की आस में ही जी रहे थे। केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में जो नया डोमिसाइल रूल लागू किया है, उसके चलते अब इन लोगों को वहां के स्थायी निवासी होने के दर्जा मिल गया है, उन्हें अब वोट देने का भी पूरा हक मिल चुका है, जिसके चलते उनकी जिंदगी पूरी तरह से बदल चुकी है, जिसकी मांग वो 70 वर्षों से भी ज्यादा वक्त से कर रहे थे।

1947 से ही इस दिन का था इंतजार

1947 से ही इस दिन का था इंतजार

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक इस बदलाव के बारे में वेस्ट पाकिस्तान रिफ्यूजीज ऐक्शन कमिटी के चेयरमैन लाभा राम गांधी ने कहा है कि नए डोमिसाल नियम से करीब एक लाख पाकिस्तानी शरणार्थियों को अब स्थायी निवासी प्रमाणपत्र लेने का अधिकार मिल गया है, जिससे उन्हें सरकारी नौकरियों में भी जाने का अधिकार होगा और वह उन्हीं अधिकारों के हकदार होंगे जो जम्मू-कश्मीर के स्थानीय लोगों को है। ये वो शरणार्थी हैं, जो 1947 में देश विभाजन की वजह से पश्चिमी पाकिस्तान से भारत आ गए थे, लेकिन 73 वर्षों से अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रह रहे थे। गांधी ने कहा, 'हां पाकिस्तानी शरणार्थियों को राशन कार्ड मिला था और उनके पास संसदीय चुनावों में वोटिंग का भी अधिकार था, लेकिन विधानसभा चुनाव में उन्हें वोट देने का हक नहीं था.....अब हमारे पास दोनों चुनावों में वोट देने का अधिकार है।'

वाजिब हक चाहते थे शरणार्थी

वाजिब हक चाहते थे शरणार्थी

24 मई से प्रभावी हुए डोमिसाइल कानून के तहत जो प्रवासी राहत और पुनर्वास विभाग में रजिस्टर्ड नहीं हैं, वो स्थायी निवास प्रमाणपत्र के लिए 1988 के निर्वाचन पत्र में उनका नाम, किसी भी राज्य में प्रवासी के रूप में रजिस्ट्रेशन का सबूत या कोई भी वैद्य कागजात देकर इसके लिए आवेदन दे सकते हैं। बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव से करीब एक साल पहले यूपी शासन के दौरान केंद्रीय गृहमंत्रालय ने 1947 से जम्मू-कश्मीर में रह रहे पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थियों के राहत और पुनर्वास के लिए 200 करोड़ रुपये का पैकेज जारी किया था।, लेकिन शायद ही कोई पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थी उसे लेने के लिए तैयार हुआ। अलबत्ता पाकिस्तानी कब्जे वाली कश्मीर (PoK) के करीब 70,000 शरणार्थियों ने उसका लाभ जरूर उठाया था। बाद में गृहमंत्रालय ने भी लोकसभा में माना कि असल लाभार्थियों ने इस पैकेज के लिए दावा ही नहीं किया। इस तरह तत्कालीन उमर अब्दुला सरकार ने भी उन परिवारों को कुछ रकम देने का फैसला किया, लेकिन शरणार्थी उस भीख पर राजी होने के लिए तैयार नहीं हुए। पिछली सरकारों ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कुछ कनाल जमीन भी देने की पेशकश की थी, लेकिन शरणार्थी को उनका वाजिब हक चाहिए था।

62 वर्ष पहले झांसा देकर बुलाए गए थे वाल्मीकि

62 वर्ष पहले झांसा देकर बुलाए गए थे वाल्मीकि

इसी तरह वाल्मीकि समुदाय (दलित) के लोगों को 1957 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री (पहले वहां मुख्यमंत्रियों के लिए यही उपयोग होता था) बख्शी गुलाम मोहम्मद ने स्थायी निवासी होने और कई और विशेषाधिकारों का भरोसा देकर पंजाब के गुरदासपुर और अमृतसर से बुलाया था। लेकिन, हकीकत ये है कि 62 वर्षों तक कश्मीर में उन्हें सिर्फ सफाईकर्मी बनाकर रखा गया और कभी किसी सरकार ने कोई फिक्र नहीं की। इन सात दशकों में 200 वाल्मीकि दलित परिवार 50,000 लोगों का एक बड़ा समुदाय बन चुका है, लेकिन उन्हें वहां पर सम्मानजनक अधिकार अब तक प्राप्त नहीं था और वे तो बिना नागरिकता के अधिकार से ही जम्मू में रहने को लाचार थे। रमेश कुमार नाम के एक वाल्मीकि कहते हैं, 'लेकिन, नए डोमिसाइल नियम से वाल्मीकियों की स्थिति में एक बहुत बड़ा बदलाव आ गया है।'

गोरखाओं को भी मिला उनका उचित सम्मान

गोरखाओं को भी मिला उनका उचित सम्मान

इसी तरह गोरखाओं की भी एक बड़ी जमात है जो सात दशकों से भी ज्यादा वक्त से जम्मू में स्थाई तौर रहती आई है, लेकिन उन्हें पहले किसी तरह का कोई अधिकार प्राप्त नहीं था। उन्हें 1947 से भी पहले पूर्ववर्ती डोगरा शासकों ने कश्मीर में लड़ाइयां लड़ने के लिए बुलाया था और उन्होंने अपनी ड्यूटी भी बखूबी निभाई, लेकिन अबतक कोई अधिकार नहीं मिल पाया था। इनकी संख्या भी आज 50 हजार के करीब हो चुकी है और अब नए डोमिसाइल नियम की वजह से इन्हें भी इस केंद्र शासित प्रदेश के स्थायी निवासी होने का अधिकार मिल गया है और वे भी उसी तरह रह सकेंगे जैसे आम कश्मीरी रहते आए हैं।

(कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया के सौजन्य से)

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English summary
2 lakh western Pakistani refugees-Valmikis-Gurkhas lives changed due to change in domicile rule in J&K
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