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125 किलो सोने से मढ़ा जाएगा तेलंगाना में नृसिंह मंदिर का द्वार, मंत्री ने दिया 1.75 करोड़ कैश, देखिए तस्वीरें

हैदराबाद। तेलंगाना के यदाद्री में स्थित प्रसिद्ध श्री लक्ष्मी नृसिंह स्वामी मंदिर के गोपुरम (विशेष द्वार) को सोने से मढ़ा जाएगा। इसके लिए मंदिर प्रबंधन 125 किलो सोना जुटा रहा है। सोने की खरीददारी के लिए राज्य सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक से सौदा किया है। रिजर्व बैंक से सोने का सौदा इसलिए किया गया है, ताकि शुद्ध सोना मिले। सरकार ने कहा है कि, वो धन जुटाकर भारतीय रिजर्व बैंक से सोना खरीदेगी। ऐसे में, राज्य के मंत्री और मुख्यमंत्री अपने-अपने स्तर पर भी धन-दान दे रहे हैं।

मुख्यमंत्री और मंत्री दे रहे धन दान

मुख्यमंत्री और मंत्री दे रहे धन दान

तेलंगाना के मंत्री मल्ला रेड्डी ने यदाद्री में श्री लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर के​ गोपुरम पर सोने की परत चढ़ाने के लिए 1.75 करोड़ रुपए दान किए। जिसकी तस्वीरें सामने आई हैं। उनके समर्थकों ने बताया कि, मल्ला रेड्डी ने मेडचल विधानसभा क्षेत्र की ओर से एक करोड़ रुपये नकद और 75 लाख रुपये का चेक सौंपा। उनके अलावा तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव पहले दानदाता के तौर पर अपने परिवार की ओर से 1.16 किलोग्राम सोने के लिए राशि दान दे चुके हैं। न्यूज एजेंसी के मुताबिक, तेलंगाना के कई मंत्री अपने साथियों के साथ यदाद्रि में पूजा करने के लिए विशाल-रैली करते हुए पहुंचे। जहां सरथ चंद्र रेड्डी, मलकाजगिरी संसद टेरेसा पार्टी के प्रभारी राजशेखर रेड्डी, पूर्व विधायक सुधीर रेड्डी, मेडचल निर्वाचन क्षेत्र के तरासा पार्टी के प्रभारी महेंद्र रेड्डी, तरासा के नेता डॉ. भद्रा रेड्डी एवं अन्य शामिल हुए।

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    यह ग्रेनाइट पत्थर से बना सबसे बड़ा मंदिर है

    बता दिया जाए कि, भगवान विष्णु के अवतार नृसिंह का यह मंदिर, ग्रेनाइट पत्थर से बना देश का सबसे बड़ा मंदिर है। इस मंदिर में ऐसा ग्रेनाइट पत्थर इस्तेमाल किया गया, जिसका मूल स्वरूप हजार साल तक नहीं बदलेगा। इसके सभी द्वार और दीवारें चांदी जड़ित हैं। इसके लिए करीब 1,753 टन चांदी इस्तेमाल की गई। यह मंदिर लगभग 9 एकड़ भूमि में फैला है। इस मंदिर के विस्तार के लिए सरकार द्वारा 2016 में 300 करोड़ में 1900 एकड़ भूमि अधिग्रहित की गई।

    यह हैं पौराणिक मान्यताएं

    यह माना जाता है कि, दुनिया में एकमात्र ध्यानस्थ पौराणिक नृसिंह प्रतिमा इसी मंदिर में है। मान्यता हैं कि, महर्षि ऋयश्रृंग के पुत्र यद ऋषि ने यहां भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। उनके तप से प्रसन्न विष्णु ने नृसिंह रूप में दर्शन दिए। महर्षि यद की प्रार्थना पर भगवान नृसिंह यहीं 3 रूपों में विराजित हो गए।

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