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'सिंघम' के ट्रांसफर पर लोगों में मायूसी, उनकी मुहिमों के मुरीद हैं लोग

चुनावी साल में बाली का ये दबाव बनाना काम कर गया और गांधी का तबादला हो गया। दोनों में कभी नहीं बनी, हमेशा ये एक दूसरे के आमने-सामने रहे।

शिमला। प्रदेश के सबसे बड़े जिले कांगड़ा के पुलिस कप्तान संजीव गांधी का तबादला प्रदेश की राजनीति में विवाद का केन्द्र बन गया है। मात्र डेढ़ साल में अपनी पोस्टिंग के दौरान संजीव गांधी ने जिला कांगड़ा में नशा व खनन माफिया को नाकों चने चबाने के लिए मजबूर कर दिया। वहीं लोगों ने उन्हें सिंघम का नाम दे दिया। लेकिन छोटी सी अवधि के बाद उनका तबादला किसी को भी रास नहीं आ रहा।

'सिंघम' के ट्रांसफर पर लोगों में मायूसी, उनकी मुहिमों के मुरीद हैं लोग

कांगड़ा जिला के एसपी संजीव गांधी के इस तबादले को नशा माफिया के खिलाफ छेड़ी गई मुहिम का हिस्सा माना जा रहा है। ये भी एक संयोग ही है कि उनका तबादला ठीक उसके दूसरे ही दिन हो गया जब परिवहन मंत्री जीएस बाली की शिमला के रिज में बागी कांग्रेस नेता मेजर विजय सिंह मनकोटिया से मुलाकात हुई। उसके बाद बाली ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्यमंत्री को चुनौती दी। चुनावी साल में बाली का ये दबाव बनाना काम कर गया और गांधी का तबादला हो गया। दरअसल जिले के मंत्री होने के बावजूद संजीव गांधी और जीएस बाली में कभी नहीं पटी।

'सिंघम' के ट्रांसफर पर लोगों में मायूसी, उनकी मुहिमों के मुरीद हैं लोग
'सिंघम' के ट्रांसफर पर लोगों में मायूसी, उनकी मुहिमों के मुरीद हैं लोग

मंत्री जीएस बाली ने कुछ महीने पहले भी उनके तबादले को लेकर सरकार पर दवाब बनाया था। मुख्यमंत्री के कांगड़ा दौरे के दौरान वो सीएम से दूर रहे थे। लेकिन इस बार मनकोटिया के साथ बाली का कदमताल सरकार के लिए खतरे का संकेत बन गई और तबादले की भूमिका एकाएक तैयार हो गई। यूं तो पुलिस कप्तान का तबादला तीन साल बाद होने के नियम हैं लेकिन उन्हें दो साल भी पूरे नहीं करने दिए गए।

'सिंघम' के ट्रांसफर पर लोगों में मायूसी, उनकी मुहिमों के मुरीद हैं लोग

स्पष्ट हो गया है कि गांधी के कांगड़ा से तबादले को लेकर कुछ सियासतदान और रसूख वाले सरकार पर दबाव बना रहे थे। हालांकि संजीव गांधी की कार्यप्रणाली से सरकार भी खुश थी लेकिन जिस तरह उनका तबादला किया गया, उससे एक बात तो साफ है कि कहीं न कहीं सरकार को अवश्य झुकना पड़ा है। ये तबादला हजारों ऐसे परिवारों की उम्मीदों का टूटना है जो पिछले दो साल से चैन की सांस ले रहे थे। जिनकी बेटियां निडर होकर घरों से निकल रही थीं और जिनके जवान बेटे पथभ्रष्ट होने लगे थे।
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जिला में रोड एक्सीडेंट और ड्रग माफिया के खिलाफ जिस तरह उन्होंने मुहिम छेड़ी, वो पूरे प्रदेश में रोल मॉडल बन गई। बता दें कि बतौर डीएसपी प्रदेश पुलिस में अपनी सेवाएं शुरू करने वाले संजीव गांधी का व्यक्तित्व हमेशा निडर अधिकारी का रहा। साल में दो-दो तबादले पर भी वो कभी नहीं बदले। फरवरी, 2016 में कांगड़ा जैसे बड़े जिले में बतौर एसपी शुरू की गई उनकी सेवाएं हमेशा याद रहेंगी। एक ईमानदार व कर्मठ पुलिस अधिकारी को कांगड़ा जैसे जिला में दो साल भी पूरे नहीं करने दिए गए। 'हेलमेट नहीं तो पेट्रोल नहीं' जैसी मुहिम गांधी ने अपने ऑनड्यूटी चलाई थीं।

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