हिमाचल चुनाव 2017 : चंबा विधानसभा क्षेत्र के बारे में जानिये
चंबा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र हिमाचल प्रदेश विधानसभा में तीन नंबर सीट है। चंबा जिले में स्थित यह निर्वाचन क्षेत्र अनारक्षित है। 2012 में इस क्षेत्र में कुल 68,283 मतदाता थे। 2012 के विधानसभा चुनाव में बीके चौहान इस क्षेत्र के विधायक चुने गए। चंबा कांगड़ा संसदीय चुनाव क्षेत्र में जिला चंबा में आता है।

पूर्व नौकरशाह जब बन गया विधायक
चंबा के विधायक बाल कृष्ण चौहान 70 साल के हो चुके हैं। वह लीड्स यूनिवर्सिटी के छात्र रहे हैं। उनका एक बेटा व बेटी है। 1974 में वह आईएएस बने तो बिहार के पूर्णिया के डीएम बने। उसके बाद बिहार सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में महत्वपूर्ण पदों पर रहे। उसके बाद हिमाचल में मंडी व लाहौल स्पिती के डीएम रहे। हिमाचल सरकार में भी कई पदों पर रहे। उसके बाद एलएन मिथिला यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बने। चौहान ने 2003 में सक्रिय तौर पर राजनिति में हाथ आजमाने का फैसला लिया तो उस समय वह झारखंड सरकार में अतिरिक्त चीफ सेक्रेटरी थे। उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ने के लिये वीआरएस लिया व राजनिति के मैदान में आ गये। इलाके में उनका कोई खास विरोध भी नहीं हुआ व पहली बार 2007 के चुनावों में चंबा से विधायक चुने गये। इस समय प्रदेश भाजपा कार्यकारिणी के सदस्य हैं। 2012 के चुनावों में चौहान दूसरी बार विधायक चुने गये।
चंबा विधानसभा क्षेत्र के बारे में
जिला : चंबा
लोकसभा चुनाव क्षेत्र : कांगड़ा
जनसंख्या (2011) : 1,24,820
साक्षरता : 72.17
क्षेत्रफल (वर्ग किमी) : 6528
शहरीकरण: आधा इलाका ग्रामीण
चंबा से अब तक चुने गये विधायक
चंबा का इतिहास
वर्ष 920 में राजा शैल वर्मन ने रावी घाटी के निचले हिस्सों पर विजय प्राप्त की तथा विजय के उपरांत उसने ब्रह्मपुर के स्थान पर चम्पा अथवा चम्बा को नयी राजधानी बनाया। सदियों तक चम्बा राज्य कश्मीर का आधिपत्य स्वीकार करता रहा है तथा ऐसा माना जाता है कि 12वीं शताब्दी के करीब चम्बा राज्य फिर से स्वायत्त हो गया। चम्बा पहाड़ी रियासतों में से एक प्राचीन रियासत रही है। शैल वर्मन राजा के दस पुत्र तथा एक पुत्री हुई जिस का नाम चम्पावती रखा गया।
चम्बा के संस्थापक राजा साहिल वर्मा ने इस शहर का नामकरण अपनी बेटी चंपा के नाम पर क्यों किया, इस बारे में एक बहुत ही रोचक किंवदंती प्रचलित है। कहा जाता है कि राजकुमारी चंपावती बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की थीं और नित्य स्वाध्याय के लिए एक साधु के पास जाया करती थीं। एक दिन राजा को किसी कारणवश अपनी बेटी पर संदेह हो गया। शाम को जब साधु के आश्रम में बेटी जाने लगी तो राजा भी चुपके से उसके पीछे हो लिया। बेटी के आश्रम में प्रवेश करते ही जब राजा भी अंदर गया तो उसे वहाँ कोई दिखाई नहीं दिया। लेकिन तभी आश्रम से एक आवाज गूँजी कि उसका संदेह निराधार है और अपनी बेटी पर शक करने की सजा के रूप में उसकी निष्कलंक बेटी छीन ली जाती है। साथ ही राजा को इस स्थान पर एक मंदिर बनाने का आदेश भी प्राप्त हुआ। चंबा नगर के ऐतिहासिक चौगान के पास स्थित इस मंदिर को लोग चमेसनी देवी के नाम से पुकारते हैं। वास्तुकला की दृष्टि से यह मंदिर अद्वितीय है। इस घटना के बाद राजा साहिल वर्मा ने नगर का नामकरण राजकुमारी चंपा के नाम कर दिया, जो बाद में चम्बा कहलाने लगा।
बदलते युग में कलकल बहती रावी नदी के किनारे बसा चंबा भी अब बदल रहा है। मशहूर मिंजर मेला व मणिमहेश यात्रा का पहला पड़ाव चंबा में ही होता है। यहां चौगान व भूरी सिंह संग्राहलय और मंदिरों की यहां अपनी अलग पहचान है। पंजाब के पठानकोट व जम्मू कश्मीर से इलाका सटा होने के कारण यहां सिक्ख व मुस्लिम मतदाता भी हैं। चंबा में एक जमाने में विधायक किशोरी लाल की तूती बोलती थी। उनके निधन के बाद हर्ष महाजन उभरे लेकिन उन्होंने बाद में चंबा छोड़ दिया। उसके बाद आज तक कांग्रेस यहां पैर नहीं जमा पाई। इस कमी का फायदा बी के चौहान को मिला, जो नये नये राजनिति में आये तो पहले ही चुनावों में विधायक चुन लिये गये। मौजूदा विधायक चौहान हलांकि राजनैतिक पृष्ठभूमि से नहीं आये हैं लेकिन पूर्व नौकरशाह चौहान दो बार विधायक चुने जा चुके हैं। चंबा में साक्षरता दर बेहतर होने की वजह से ज्यादातर लोग नौकरीपेशा हैं व बाकी अपने पुश्तैनी धंधें कर रहे हैं। चमेरा हाईडल प्रोजेक्ट भी चंबा के लिये वरदान साबित हुआ है। यहां के लोग साधन संपन्न हैं व पर्यटन लोगों की अजिविका का प्रमुख साधन है। चंबा में 46 पंचायतें हैं।












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