• search
हिमाचल प्रदेश न्यूज़ के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  

Dussehra 2017: अमेरिका और रूस दोनों करेंगे सहयोग, भारतीय मेला होगा इंटरनेशनल

By Gaurav Dwivedi
|

शिमला। हिमाचल प्रदेश आज रफ्तार से प्रगति की ओर अग्रसर है। प्रगति के इस सफर में प्रदेश ने अपनी समृद्ध संस्कृति सभ्यता की अनमोल धरोहर को बखूबी से संजोए रखा है, जिसका उदाहरण हमें प्रदेश में आयोजित होने वाले विभिन्न मेलों और उत्सवों में देखने को मिलता है। प्रदेश में ग्रामीण स्तर से राष्ट्रीय स्तर पर मनाए जाने वाले उत्सवों में कुल्लू दशहरा उत्सव ने जो ख्याति अर्जित की है वो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है। ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में विजय दशमी से लेकर अगले सात दिनों तक मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय लोकनृत्य उत्सव कुल्लू दशहरा की धार्मिक मान्यताओं, आरंभिक पंरपराओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, पर्यटन, व्यापार व मनोरंजन की दृष्टि से अद्वितीय पहचान है। दशहरा उत्सव स्थानीय लोगों में विजय दशमी के नाम से प्रचलित है। जब पूरा देश विजय दशमी मना चुका होता है तो यहां दशहरा शुरू होता है। दशहरा उत्सव के मुख्यत: तीन भाग 'ठाकुर' निकालना 'मौहल्ला' और 'लंका दहन' है। इस उत्सव के आयोजन में देवी हिडिंबा की उपस्थिति अनिवार्य है। देवी हिडिंबा के बिना रघुनाथ जी की रथयात्रा नहीं निकल पाती है।

यही है 'ठाकुर' निकालना

यही है 'ठाकुर' निकालना

रघुनाथ जी की इस रथयात्रा को ‘ठाकुर' निकालना कहते हैं। रथयात्रा के साथ कुल्लवी परंपराओं, मान्यताओं, देवसंस्कृति, पारंपरिक वेशभूशा, वाद्य यंत्रों की धुनों, देवी-देवताओं में आस्था, श्रद्धा व उल्लास का एक अनूठा संगम होता है। ‘मौहल्ले' के नाम से प्रख्यात दशहरे के छठे दिन सभी देवी-देवता रघुनाथ जी के शिविर में शीश नवाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं। इस दौरान देवी-देवता आपस में इस कदर मिलते हैं कि मानो मानव को आपसी प्रेम का संदेश दे रहे हों। इस दृश्य को देखने के लिए हजारों की संख्या में एकत्रित हुए लोगों में देश-प्रदेश ही नहीं अपितु विदेशी पर्यटक भी शामिल होते हैं। ‘मौहल्ले' के दिन रात्रि में रघुनाथ शिविर के सामने शक्ति पूजन किया जाता है। दशहरा उत्सव के अंतिम दिन शिविर में से रघुनाथ जी की मूर्ति को निकालकर रथ में रखा जाता है और इस रथ को खींचकर मैदान के अंतिम छोर तक लाया जाता है।

रथ खींचने की है परंपरा

रथ खींचने की है परंपरा

दशहरे में उपस्थित देवी-देवता इस यात्रा में शरीक होते हैं। देवी-देवताओं की पालकियों के साथ ग्रामवासी वाद्य यंत्र बजाते हुए चलते हैं। ब्यास नदी के तट पर एकत्रित घास व लकड़ियों को आग लगाने के पश्चात पांच बलियां दी जाती हैं तथा रथ को पुन: खींचकर रथ मैदान तक लाया जाता है। इसी के साथ लंका दहन की समाप्ति हो जाती है तथा रघुनाथ जी की पालकी को वापस मंदिर लाया जाता है। देवी-देवता भी अपने-अपने गांव के लिए प्रस्थान करते हैं। ‘ठाकुर' निकलने से लंका दहन तक की अवधि में पर्यटकों के लिए एक विषेश आकर्षण रहता है। इस दौरान उन्हें यहां की भाषा, वेशभूशा, देव परंपराओं और सभ्यता से रूबरू होने का मौका मिलता है, स्थानीय उत्पाद विषेश रूप से कुल्लू की शॉल, टोपियां आदि खरीदने का अवसर भी प्राप्त होता है। इन दिनों का माहौल बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक स्थानीय लोगों से लेकर विदेशियों तक के लिए खुशगवार पसंदीदा होता है। छोटे बच्चों के मनोरंजन के लिए जहां ढेरों आकर्शण होते हैं, वहीं महिलाओं को खरीदारी करने हेतु एक विशेश अवसर प्राप्त होता है, जिसमें अहम बात यह रहती है कि कम से कम मूल्य से लेकर अधिक से अधिक कीमत तक की वस्तुओं उपलब्ध होती हैं।

मौसम भी देता है कुल्लू का साथ

मौसम भी देता है कुल्लू का साथ

प्रत्येक वर्ग अपनी पहुंच और सुविधानुसार खरीददारी कर सकता है। गर्मियों के मौसम में जहां सूर्य की किरणों के स्पर्श से कुल्लू घाटी गर्माहट महसूस कर चुकी होती है, वहां अक्तूबर माह से सर्दियों की दस्तक पडते ही लोग बर्फानी मौसम में ठंड से बचने के लिए गर्म कपड़े कंबल आदि विशेश रूप से खरीदते हैं। ढालपुर के प्रदर्शनी मैदान में विभिन्न विभागों, गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा आयोजित प्रदर्शिनयां अपने आप में दशहरा उत्सव का एक विशेश आकर्शण है। ये प्रदर्शिनयां जहां बड़ों को संतुश्ट करती हैं, वहीं छोटे मासूम बच्चों के लिए आश्चर्य से भरे कई सवाल छोड़ जाती हैं।

लोगों को रहता है इसका बेसब्री से इंतजार

लोगों को रहता है इसका बेसब्री से इंतजार

इस महापर्व के दौरान ढालपुर का मैदान एक नई नवेली दुल्हन की तरह सजा होता है। इसका मुख्य और सबसे आकर्शक गहना है, यहां आई असंख्य देवी-देवताओं की पालकियां जो मैदान में बने शिविरों में रखी जाती हैं। प्रात: व संध्या के समय जब देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना होती है तो वातावरण भक्तिभाव से भर जाता है और लगता है कि जैसे अगर कहीं जन्नत है तो बस यहीं। इस समय कुल्लू घाटी में देव परंपराओं के जीवित होने का प्रत्यक्ष प्रमाण देखने को मिलता है। लोगों में अपने अराध्य देव के प्रति विश्वास व श्रद्धा सागर में उठने वाली लहरों के मानिंद साफ दिखाई देता है। कहते हैं कि संगीत व मानव का अटूट व गहरा रिश्ता है। दशहरा उत्सव में गीत-संगीत यानि सांस्कृतिक कार्यक्रमों का पक्ष इतना मजबूत और आकर्षक होता है कि लोग उत्सुकता, बेसब्री व तन्मयता से सांस्कृतिक कार्यक्रमों का इंतजार करते हैं।

प्रतियोगिताएं भी हैं इस परंपरा में शामिल

प्रतियोगिताएं भी हैं इस परंपरा में शामिल

सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सर्वप्रथम तो वो कार्यक्रम है जो दिन के समय ऐतिहासिक लाल चंद प्रार्थी कला केंद्र में आयोजित किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से वाद्य यंत्रों, लोक नृत्यों की प्रतियोगिताएं शामिल हैं। यह कार्य पूर्ण रूप से स्थानीय लोक संस्कृति पर आधारित होता है जो वर्तमान को अतीत से जोड़े रखने में अहम भूमिका निभा रहा है। इस दौरान रंग-बिरंगे परिधानों में सजे लोग कला केंद्र की शोभा को चार चांद लगाते है। इसके अतिरिक्त लाल चंद प्रार्थी कला केंद्र में रात्रि के समय आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने दशहरा उत्सव को विशेश पहचान दी है। इन कार्यक्रमों के माध्यम से अंतर्राश्ट्रीय स्तर पर सभ्यता व संस्कृति के दर्शन होते हैं। इस आयोजन में हिमाचल प्रदेश के विभिन्न जिलों ही नहीं, देश के विभिन्न राज्यों की वेशभूशा, भाशा, लोकसंस्कृति से भी रूबरू होने का अवसर प्राप्त होता है। इस मंच से समूचे देश के साथ-साथ अंतर्राश्ट्रीय पर सांस्कृतिक कार्यक्रामें का दर्शक भरपूर आनंद लेते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम दशहरा उत्सव का अहम भाग है।

कई देवी देवताओं की एक साथ होती है पूजा

कई देवी देवताओं की एक साथ होती है पूजा

दशहरा उत्सव स्थानीय लोगों का ही नहीं, अपितु समूचे राष्ठ्र का पर्व है, जिसे हर्शोल्लास व पारंपरिक रीति-रिवाजों से मनाया जाता है। दशहरे का शुभारंभ महामहिम राज्यपाल द्वारा तथा समापन मुख्यमंत्री हिमाचल प्रदेश द्वारा किया जाता है। यह उत्सव व्यापार, पर्यटन, मनोरंजन, आरंभिक मान्यताओं के प्रदर्शन व संरक्षण अहम भूमिका अदा करता रहा है। इस बार 30 सितंबर से शुरू हो दशहरा का समापन 7 अक्तूबर को होगा। कुल्लू के उपायुक्त युनूस खान ने कहा कि सप्ताह भर चलने वाले दशहरा महोत्सव में भाग लेने के लिए लगभग 305 स्थानीय देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया है। उन्होंने कहा कि दशहरा समिति के आग्रह पर रूस से सांस्कृतिक दल ने उत्सव में भाग लेने के अलावा आईसीसीआर नई दिल्ली तीन अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक दलों के लिए सहमत हुई है। उन्होंने कहा कि समिति ने श्रीलंका, मध्यपूर्व तथा लेटिन अमेरिका से सांस्कृतिक दलों के लिए आग्रह किया है।

Read more: नवरात्रि में जन्मे बेटे की छठी भी नहीं पूज पाई मां, ताई के हाथ से फिसली जिंदगी

जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
Dussehra, Navmi, Navratri, Durga puja all in one in Shimla of SriLanka Style
For Daily Alerts

Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X
We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more